Why residents are opposing data centres in Andhra Pradesh and Maharashtra? | Explained (July 25, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में विशाल डेटा सेंटर पार्कों की स्थापना को लेकर स्थानीय निवासियों और किसान समुदायों ने मोर्चा खोल दिया है। सरकार और बड़ी टेक कंपनियां डिजिटल इंडिया और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश में डेटा सेंटर बुनियादी ढांचे को तेजी से बढ़ा रही हैं। हालांकि, इस तेज विकास ने अब ‘विकास बनाम पर्यावरण’ और ‘विकास बनाम जल सुरक्षा’ की एक नई बहस छेड़ दी है। अपनी परीक्षाओं (UPSC/MPSC) की तैयारी को पुख्ता करने के लिए आपको इस मुद्दे को गहराई से समझना होगा। आइए, इस विरोध के पीछे के असली कारणों, प्राकृतिक संसाधनों पर इसके असर और इसके नीतिगत समाधानों का विश्लेषण करते हैं।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Connection)

अपनी मुख्य परीक्षा (Mains) में बेहतर अंक सुनिश्चित करने के लिए, आप इस विषय को पाठ्यक्रम के इन प्रमुख हिस्सों से जोड़कर देखें:

पेपर (Paper) महत्वपूर्ण विषय (Key Topics)
सामान्य अध्ययन पेपर-III (GS-3) बुनियादी ढांचा (Infrastructure) – डेटा सेंटर, जल संरक्षण, आर्थिक विकास और पर्यावरण का तालमेल।
सामान्य अध्ययन पेपर-II (GS-2) शासन और नीतियां (Governance & Policies), जनहित याचिकाएं (PILs), नागरिक समाज की भूमिका (Role of Civil Society) और विकास परियोजनाओं का सामाजिक प्रभाव।

आखिर लोग डेटा सेंटर्स का विरोध क्यों कर रहे हैं? मुख्य चिंताओं को समझें

यहाँ एक बात साफ तौर पर समझें: स्थानीय निवासी किसी आधुनिक तकनीक या इंटरनेट के खिलाफ नहीं हैं। वे तो केवल संसाधनों के गलत और एकतरफा बंटवारे के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इन आंदोलनकारी किसानों और निवासियों की चिंताओं को आप इन तीन मुख्य बिंदुओं में देख सकते हैं:

1. पानी की बेलगाम खपत (डेटा सेंटर्स की ‘प्यास’)

इसे एक सीधे उदाहरण से समझिए। जैसे कड़ी धूप में खड़ी एक बंद कार बहुत गर्म हो जाती है, वैसे ही डेटा सेंटर के भीतर रखे हजारों कंप्यूटर सर्वर चौबीसों घंटे चलने के कारण भीषण गर्मी पैदा करते हैं। इस गर्मी से सर्वर को पिघलने से बचाने के लिए वाटर कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल होता है। यह व्यवस्था इंसानी शरीर के पसीने की तरह काम करती है, जो गर्मी सोखकर हवा में उड़ जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में रोजाना लाखों लीटर साफ पानी भाप बनकर उड़ जाता है। जिन इलाकों में पहले से ही कुएं सूख रहे हैं और भूजल स्तर रसातल में जा रहा है, वहाँ यह तकनीक स्थानीय लोगों के पीने के पानी और खेती की सिंचाई के हक पर सीधा हमला करती है।

2. भूजल का अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण को नुकसान

विशालकाय डेटा सेंटर की इमारतें एकड़ में फैली होती हैं। जब आप इतनी बड़ी जमीन पर कंक्रीट की मोटी चादर बिछा देते हैं, तो वह स्पंज की तरह पानी सोखने वाली धरती को पूरी तरह बंद कर देती है। नतीजा यह होता है कि बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्राकृतिक प्रक्रिया थम जाती है। एक तरफ कुओं से पानी खींचा जा रहा है और दूसरी तरफ पानी वापस जमीन में जाने का रास्ता बंद हो चुका है—यह दोहरा नुकसान पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ देता है।

3. बिजली की भारी खपत और ग्रिड पर मंडराता संकट

डेटा सेंटर को चलाने और ठंडा रखने के लिए हर सेकंड भारी मात्रा में बिजली चाहिए। गाँवों के लोग इस बात से डरे हुए हैं कि उनके यहाँ पहले से ही बिजली का आना-जाना लगा रहता है। अब अगर इन सुपर-कंप्यूटरों को सीधे मुख्य ग्रिड से असीमित बिजली दी जाएगी, तो घरेलू ग्रिड पर लोड असहनीय हो जाएगा। इसका सीधा असर किसानों की पंपिंग और ग्रामीण घरों की बिजली पर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अघोषित बिजली कटौती बढ़ सकती है।

संवैधानिक और कानूनी पहलू: जहाँ अधिकार टकराते हैं

आपको इस विवाद को केवल एक प्रशासनिक समस्या के तौर पर नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी और संवैधानिक संघर्ष के रूप में देखना चाहिए। इसमें दो मुख्य कानूनी मुद्दे सामने आते हैं:

संविधान का अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार बनाम कॉर्पोरेट जरूरतें

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हमें जीने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई फैसलों में साफ किया है कि सम्मान से जीने के लिए ‘साफ और पर्याप्त पानी का अधिकार’ भी इसी मौलिक अधिकार का हिस्सा है। पानी कोई ऐसी व्यावसायिक वस्तु नहीं है जिसे बिना सोचे-समझे किसी कंपनी को दे दिया जाए। स्थानीय निवासी इसी कानूनी हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि निजी मुनाफे के लिए उनके हिस्से के भूजल को बहाना उनके मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

73वां संविधान संशोधन और स्थानीय स्वशासन की उपेक्षा

कल्पना कीजिए कि आपके घर के आंगन में कोई दूसरा व्यक्ति आकर बिना आपकी मर्जी के कोई ढांचा खड़ा कर दे। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने ग्राम पंचायतों को यही ‘आंगन का मालिकाना हक’ दिया है ताकि वे अपने पानी, जमीन और जंगल का फैसला खुद कर सकें। लेकिन इस मामले में एक विरोधाभास दिखता है। राज्य सरकारें इन डेटा सेंटरों को ‘महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा’ (Critical Infrastructure) घोषित कर देती हैं और ग्राम पंचायतों के अधिकारों को दरकिनार कर देती हैं। यह कदम हमारे लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की बुनियादी भावना को ठेस पहुंचाता है।

डिजिटल प्रगति और पर्यावरण का संतुलन: विकास का सही रास्ता

हम 5जी, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ डेटा सेंटर्स को डिजिटल इकोनॉमी की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। इनके बिना हमारा डिजिटल सिस्टम एक पल भी नहीं चल सकता। असली चुनौती इनकी जरूरत पर नहीं, बल्कि इनके स्थान चयन (Location Selection) पर है। अक्सर बड़ी कंपनियां इन डेटा सेंटर्स को बड़े शहरों या औद्योगिक क्षेत्रों के पास बनाना चाहती हैं, जो उपजाऊ कृषि भूमि या पहले से ही पानी की कमी झेल रहे इलाकों (Water-stressed areas) में स्थित होते हैं।

इस संकट से निकलने के तीन व्यावहारिक उपाय जिन्हें नीतिगत स्तर पर लागू किया जा सकता है:

  • जल-तटस्थ डेटा सेंटर (Water-neutral Data Centres): सरकारों को ऐसी तकनीकों का उपयोग अनिवार्य करना होगा जो पानी की खपत को लगभग शून्य कर दें। उदाहरण के लिए, ‘क्लोज्ड-लूप कूलिंग’ (जिसमें एक बार भरा पानी बार-बार घूमता रहता है, उड़ता नहीं) या ‘एयर कूलिंग’ (हवा से ठंडा करने की तकनीक)।
  • स्मार्ट लोकेशन प्लानिंग: इन डेटा सेंटरों को उपजाऊ खेतों की जगह बंजर या कम उपजाऊ जमीनों पर शिफ्ट किया जाना चाहिए। साथ ही, इन्हें समुद्र के किनारे या ऐसे इलाकों में स्थापित किया जा सकता है जहाँ ट्रीटेड सीवेज वाटर (संशोधित अपशिष्ट जल) या पानी के अन्य वैकल्पिक स्रोत आसानी से मिल सकें।
  • आत्मनिर्भर ऊर्जा मॉडल (Renewable Energy): इन केंद्रों को पूरी तरह से ग्रिड पर निर्भर करने के बजाय अपने स्तर पर सौर ऊर्जा (Solar) या पवन ऊर्जा (Wind Energy) के प्लांट लगाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। इससे मुख्य ग्रिड पर बिजली का बोझ नहीं बढ़ेगा।

अपनी तैयारी को परखें: प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: ‘डेटा सेंटर’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. डेटा सेंटर का पूरा संचालन पूरी तरह से पानी के बिना (Water-less) किया जाता है।
  2. वाटर कूलिंग सिस्टम का उपयोग करने वाले डेटा सेंटर भूजल स्तर पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं।
  3. भारत में डेटा सेंटर पार्कों के लिए कोई पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) नियम लागू नहीं होते हैं।

ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3

सही उत्तर: B (केवल 2)

व्याख्या: पहला कथन गलत है क्योंकि ज्यादातर डेटा सेंटर अपने सर्वर को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी इस्तेमाल करते हैं। दूसरा कथन बिल्कुल सही है क्योंकि लगातार पानी खींचने से भूजल स्तर घटता है। तीसरा कथन गलत है क्योंकि बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं की तरह ही डेटा सेंटरों पर भी पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े नियम लागू होते हैं, हालांकि इनके विशिष्ट मानकों पर नीतिगत बदलावों की चर्चा जारी है।

मुख्य परीक्षा (Mains) के लिए अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “डिजिटल इंडिया के युग में डेटा सेंटर बेहद जरूरी हैं, लेकिन इन्हें स्थापित करने की कीमत ‘जल-न्याय’ (Water-justice) से समझौता करके नहीं चुकाई जा सकती।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए, डेटा सेंटर नीतियों में आवश्यक सुधारों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

उत्तर की संरचना (Model Structure):

  • प्रस्तावना (Introduction): डिजिटल क्रांति और बढ़ते डेटा उपयोग को पूरा करने के लिए डेटा सेंटर्स की ज़रूरत और महत्व से उत्तर की शुरुआत करें।
  • मुख्य भाग (Body):
    • संसाधनों का टकराव: समझाएं कि कैसे डेटा सेंटर चलाने के लिए पानी, बिजली और जमीन की जरूरतें स्थानीय लोगों के बुनियादी अधिकारों से टकरा रही हैं।
    • सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव: जल संकट वाले क्षेत्रों में इन सेंटर्स को स्थापित करने के खतरों को रेखांकित करें।
    • संकट के समाधान: पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों (जैसे ग्रीन एनर्जी और जीरो-वाटर डिस्चार्ज) को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दें।
  • निष्कर्ष/आगे की राह (Conclusion / Way Forward): राज्य सरकारों को डेटा सेंटर नीतियों में सख्त जल-दक्षता मानदंड (Water-efficiency standards) शामिल करने चाहिए। स्थानीय समुदायों से संवाद (Consultation process) और विकेंद्रीकृत विकास ही भविष्य का सही मार्ग है।

यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। अपनी तैयारी को और बेहतर बनाने के लिए नियमित रूप से IAS EasyWay पर आते रहें और दैनिक समसामयिकी का लाभ उठाते रहें।

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