दैनिक समसामयिकी (31 जुलाई 2026): राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और आयुष्मान भारत विस्तार – परीक्षा विशेष विश्लेषण
चर्चा में क्यों? नीति आयोग ने 31 जुलाई 2026 को ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage – UHC) 2030’ पर अपनी बहुप्रतीक्षित समीक्षा रिपोर्ट जारी की। आयोग ने इस समीक्षा में भारत की प्रमुख स्वास्थ्य योजनाओं के प्रदर्शन को परखा है। साथ ही, ‘आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ (AB-PMJAY) के तहत वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त इलाज देने के लिए बजट जुटाने के नए वित्तीय रास्ते सुझाए हैं। आयोग का सीधा लक्ष्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017 और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG 3.8) को आपस में जोड़ना है। इससे भारत के हर नागरिक को बिना जेब से पैसा खर्च किए बेहतरीन इलाज मिल सकेगा।
ऐतिहासिक संदर्भ और स्वास्थ्य नीतियों का विकास: भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों की शुरुआत आजादी से पहले ही हो चुकी थी। साल 1946 में बनी सर जोसेफ भोर समिति (Bhore Committee) ने हमारे देश के प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे की नींव रखी। समिति ने माना था कि बिना बेहतर स्वास्थ्य के समाज का विकास मुमकिन नहीं है। आजादी मिलने के बाद सरकार ने समय-समय पर स्वास्थ्य नीतियों में कई बड़े बदलाव किए:
1. प्रथम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (1983): सरकार ने साल 2000 तक ‘सभी के लिए स्वास्थ्य’ (Health for All) का लक्ष्य तय किया। इसके लिए गांवों तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का एक मजबूत नेटवर्क बनाने पर जोर दिया गया।
2. द्वितीय राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2002): इस नीति के जरिए सरकार ने सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने, संक्रामक बीमारियों पर नजर रखने और स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण (Decentralization) करने पर ध्यान केंद्रित किया।
3. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017: यह नीति देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लेकर आई। इसने सोचने का नजरिया बदला—हम ‘बीमारी के इलाज’ (Sick-care) से हटकर ‘बेहतर स्वास्थ्य’ (Wellness) की तरफ बढ़े। नीति ने सरकार से स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर जीडीपी का 2.5% करने, मरीजों की जेब से होने वाले खर्च को घटाने और एक डिजिटल हेल्थ सिस्टम बनाने की वकालत की। इसी नीति की वजह से ‘आयुष्मान भारत’ योजना का जन्म हुआ, जिसके दो मुख्य स्तंभ हैं: आयुष्मान आरोग्य मंदिर (पहले हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर) और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY)।
वर्तमान महत्व और आयुष्मान भारत का विस्तार: साल 2024 के आखिरी महीनों में केंद्रीय कैबिनेट ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। सरकार ने 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी बुजुर्गों को आयुष्मान भारत के तहत ₹5 लाख का सालाना मुफ्त इलाज देने की मंजूरी दी। इसमें बुजुर्गों की अमीर-गरीब वाली आर्थिक स्थिति को आड़े नहीं आने दिया गया। साल 2026 में नीति आयोग की यह ताजा रिपोर्ट इसी फैसले के जमीनी असर, बजट की चुनौतियों और भविष्य की राह का लेखा-जोखा पेश करती है। यह विस्तार इसलिए बेहद जरूरी है क्योंकि भारत में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। बुढ़ापे में बीमारी का खर्च पूरे परिवार को आर्थिक रूप से तोड़ देता है। ऐसे में नीति आयोग की यह रिपोर्ट पूरे देश के स्वास्थ्य ढांचे को सुधारने के लिए एक गाइड की तरह काम करेगी।
1. विश्लेषणात्मक वर्गीकरण एवं प्रमुख डेटा बिंदु
अगर आप परीक्षा के लिए इस पूरे विषय को गहराई से समझना चाहते हैं, तो नीति आयोग की रिपोर्ट और देश के स्वास्थ्य परिदृश्य को इन सात महत्वपूर्ण पहलुओं से देखिए:
(i) वृद्धजन स्वास्थ्य सुरक्षा का लोक-जनसांख्यिकीय महत्व (Demographic Importance of Geriatric Healthcare): संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट चेताती है कि साल 2050 तक भारत में बुजुर्गों (60 वर्ष से अधिक) की आबादी कुल जनसंख्या की करीब 20% हो जाएगी। 70 साल से ऊपर की उम्र में कैंसर, हृदय रोग और डायबिटीज जैसी लंबी चलने वाली बीमारियां (Chronic Diseases) आम हो जाती हैं। ऐसे में बिना किसी आय-सीमा के सभी बुजुर्गों को आयुष्मान भारत के दायरे में लाना एक प्रगतिशील कदम है। यह कदम बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा देता है और उन्हें बच्चों पर आर्थिक रूप से निर्भर रहने के मानसिक दबाव से बचाता है। नीति आयोग ने इसके लिए एक विशेष ‘जेरियाट्रिक केयर फंड’ (Geriatric Care Fund) बनाने का सुझाव दिया है ताकि भविष्य में बुजुर्गों के इलाज के लिए पैसों की कमी न हो।
(ii) सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय: 2.5% का लक्ष्य बनाम वर्तमान वास्तविकता: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 ने लक्ष्य रखा था कि सरकार 2025 तक स्वास्थ्य खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5% तक पहुंचाएगी। लेकिन साल 2026 के ताजा बजट आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। भारत का सरकारी स्वास्थ्य खर्च आज भी जीडीपी के 1.9% से 2.0% के बीच ही अटका हुआ है। सरकार ने बजट बढ़ाया तो है, लेकिन यह नीतिगत लक्ष्यों से काफी पीछे है। इस कम निवेश के कारण ही हमारे गांवों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं, डॉक्टरों और जरूरी मशीनों की आज भी कमी खलती है।
(iii) आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) और गरीबी का कुचक्र: इसे एक साधारण उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी मध्यमवर्गीय परिवार का कोई सदस्य गंभीर बीमार हो जाता है। अस्पताल का भारी-भरकम बिल चुकाने के लिए परिवार को अपनी जमीन बेचनी पड़ती है या कर्ज के जाल में फंसना पड़ता है। इसी को आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) यानी जेब से होने वाला खर्च कहते हैं। भारत में यह खर्च साल 2014 के 64.2% से घटकर अब 40% से 42% के बीच आ गया है, लेकिन यह अभी भी दुनिया के औसत (~18%) से बहुत ज्यादा है। आज भी हर साल लगभग 5 से 6 करोड़ लोग सिर्फ अस्पताल के खर्चों के कारण गरीबी के दलदल में धंस जाते हैं। आयुष्मान भारत का दायरा बढ़ाना इसी कुचक्र को तोड़ने के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढाल की तरह काम करता है।
(iv) प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का सुदृढ़ीकरण एवं ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’: स्वास्थ्य प्रणाली को एक सुरक्षा चक्र की तरह समझिए, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सीमा पर तैनात संतरी (Gatekeepers) हैं। सरकार ने देश भर के 1.6 लाख से अधिक उप-केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिरों’ में बदला है। नीति आयोग का मानना है कि अगर हम शुरुआती स्तर पर ही डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और तीन आम कैंसर (स्तन, बच्चेदानी का कैंसर और मुंह का कैंसर) की पहचान कर लें, तो बड़े अस्पतालों (द्वितीयक और तृतीयक) पर मरीजों का बोझ 30 से 40% तक कम हो सकता है। यह न सिर्फ सरकार का पैसा बचाएगा, बल्कि मरीज को समय पर इलाज देकर उसकी जान भी बचाएगा।
(v) “मिसिंग मिडिल” (Missing Middle) की चुनौती: इसे आप परिवार के उस बीच के बच्चे की तरह देख सकते हैं जिसे न तो छोटे बच्चे की तरह लाड़-प्यार (गरीबों के लिए सरकारी योजनाएं) मिलता है और न ही बड़े बच्चे की तरह संसाधन (अमीरों के लिए प्राइवेट इंश्योरेंस)। भारत का यह मध्यम वर्ग न तो इतना गरीब है कि आयुष्मान भारत का कार्ड बनवा सके और न ही इतना अमीर कि महंगे निजी बीमा का प्रीमियम भर सके। इस ‘मिसिंग मिडिल’ में देश की लगभग 30% आबादी (करीब 40 करोड़ लोग) आती है। नीति आयोग ने इस वर्ग के लिए कम प्रीमियम वाली स्वैच्छिक योगदान आधारित बीमा योजनाओं को शुरू करने की सिफारिश की है ताकि UHC 2030 का लक्ष्य हासिल किया जा सके।
(vi) आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) का महत्व: डिजिटल तकनीक अब इलाज को भी आसान बना रही है। ABDM के तहत हर नागरिक के लिए एक यूनीक ‘आभा आईडी’ (ABHA ID) बनाई जा रही है। यह आपकी डिजिटल मेडिकल फाइल की तरह है। इससे डॉक्टर आपके पुराने इलाज का इतिहास सुरक्षित रूप से देख सकते हैं। इससे मरीजों को बार-बार एक ही टेस्ट कराने की जरूरत नहीं पड़ती और फिजूलखर्ची रुकती है। साथ ही, ई-संजीवनी (e-Sanjeevani) के जरिए गांवों में रहने वाले लोग भी बड़े शहरों के विशेषज्ञ डॉक्टरों से फोन या वीडियो कॉल पर सीधे इलाज की सलाह ले सकते हैं।
(vii) राज्य-स्तरीय कार्यान्वयन चुनौतियाँ और सहकारी संघवाद: हमारे संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘स्वास्थ्य’ को राज्य सूची (State List) में रखा गया है। इसका मतलब है कि केंद्र योजना चाहे कितनी भी अच्छी बना ले, उसे जमीन पर उतारने का दारोमदार राज्यों पर ही होता है। कुछ राज्यों ने आपसी राजनीतिक या प्रशासनिक कारणों से आयुष्मान भारत को लागू नहीं किया है और अपनी अलग योजनाएं चला रहे हैं। वहीं, महाराष्ट्र जैसी सरकारों ने आयुष्मान भारत को अपनी राज्य योजना ‘महात्मा ज्योतिबा फुले जन आरोग्य योजना’ के साथ मिलाकर एक बेहतरीन मिसाल पेश की है। नीति आयोग की स्पष्ट सिफारिश है कि पूरे देश में एक समान स्वास्थ्य सेवा देने के लिए केंद्र और राज्यों को अपनी योजनाओं में बेहतर तालमेल बनाना होगा.
स्वास्थ्य क्षेत्र के महत्वपूर्ण डेटा और प्रगति का तुलनात्मक विश्लेषण:
| संकेतक / सूचकांक | वर्ष 2014-15 की स्थिति | वर्ष 2025-26 की स्थिति | NHP 2017 का लक्ष्य |
|---|---|---|---|
| सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च (GDP का %) | ~1.15% | ~1.9% – 2.0% | 2.5% (2025 तक) |
| जेब से होने वाला खर्च (OOPE) (कुल स्वास्थ्य व्यय का %) | ~64.2% | ~40% – 42% | 50% से कम करना |
| प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का बदलाव | असंगठित उप-केंद्र | 1,60,000+ आयुष्मान आरोग्य मंदिर सक्रिय | सभी उप-केंद्रों को आरोग्य मंदिरों में बदलना |
| बुजुर्गों (70+) का स्वास्थ्य बीमा | सीमित और केवल गरीब परिवारों तक | 70 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों के लिए सार्वभौमिक कवरेज | सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करना |
| शिशु मृत्यु दर (IMR) (प्रति 1000 जीवित जन्म पर) | 37 | ~26 | 23 (2025 तक) |
2. पाठ्यक्रम संबद्धता तालिका (Syllabus Linkage Table)
यदि आप UPSC या MPSC परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि यह विषय आपके पाठ्यक्रम में कहां फिट होता है। नीचे दी गई तालिका से आप इसे आसानी से समझ सकते हैं:
| परीक्षा का स्तर | प्रश्नपत्र (Paper) | संबद्ध पाठ्यक्रम टॉपिक (Syllabus Topics) |
|---|---|---|
| UPSC Mains | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2 (GS Paper II) | स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधनों से जुड़े सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय; गरीबी और भुखमरी से संबंधित मुद्दे; कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं और उनका प्रदर्शन। |
| UPSC Mains | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 (GS Paper III) | भारतीय अर्थव्यवस्था, योजना, संसाधनों को जुटाना, प्रगति, विकास और रोजगार; समावेशी विकास (Inclusive Growth) और इससे जुड़े प्रमुख आर्थिक मुद्दे। |
| MPSC Mains | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 (GS III – HRD & Human Rights) | मानव संसाधन विकास: भारत और महाराष्ट्र में शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली की स्थिति; राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियां; आयुष्मान भारत योजना; बुजुर्गों का कल्याण और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं; जनसांख्यिकी और मानव विकास संकेतक। |
| MPSC Mains | सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 4 (GS IV – Economy & Development) | गरीबी और बेरोजगारी उन्मूलन कार्यक्रम; सामाजिक सुरक्षा नीतियां; सार्वजनिक वित्त: स्वास्थ्य और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर सरकारी सार्वजनिक खर्च का स्वरूप और सीमा। |
3. प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Practice Prelims MCQ)
अपनी तैयारी को परखने के लिए इस अभ्यास प्रश्न को हल करने का प्रयास करें:
प्रश्न: आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. हाल ही में हुए विस्तार के तहत 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति या आय कुछ भी हो, प्रति परिवार ₹5辅助 तक का अलग वार्षिक स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान किया गया है।
- 2. इस योजना के तहत केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय भागीदारी का पैटर्न सभी राज्यों के लिए अनिवार्य रूप से 60:40 के अनुपात में है, जबकि बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों में यह 100% केंद्र द्वारा पोषित है।
- 3. ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ (पहले आयुष्मान भारत-स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र) मुख्य रूप से गंभीर संक्रामक रोगों के इलाज और बड़े अस्पतालों की तरह विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं देने पर केंद्रित हैं।
- 4. यह योजना अस्पताल में भर्ती होने से 3 दिन पहले तक के जांच खर्च और अस्पताल से छुट्टी मिलने के 15 दिनों बाद तक की दवाओं के खर्च को कवर करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 4
(D) केवल 1, 2 और 4
सही उत्तर: (C) केवल 1 और 4
विस्तृत स्पष्टीकरण (Detailed Explanation):
कथन 1 सत्य है: सरकार ने 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी बुजुर्गों के लिए आयुष्मान भारत का दरवाजा खोल दिया है, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। यह सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की तरफ एक बड़ा कदम है। अगर किसी परिवार के पास पहले से ही आयुष्मान कार्ड है, तो उस परिवार के 70+ उम्र के बुजुर्ग सदस्य को ₹5 लाख का एक अतिरिक्त (Top-up) कवर मिलेगा, जो मूल कार्ड से अलग होगा। जो परिवार योजना में शामिल नहीं हैं, उन्हें भी अपने बुजुर्गों के लिए ₹5 लाख का कवर मिलेगा।
कथन 2 असत्य है: योजना का बजट केंद्र और राज्य मिलकर उठाते हैं, लेकिन यह सभी राज्यों के लिए 60:40 नहीं है। सामान्य राज्यों के लिए यह अनुपात 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों (जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश) और जम्मू-कश्मीर के लिए यह 90:10 है। बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए पूरा 100% पैसा केंद्र सरकार देती है। इसलिए कथन 2 गलत है।
कथन 3 असत्य है: आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं (Primary Healthcare) देना है, न कि बड़े अस्पतालों की तरह जटिल या विशेषज्ञ इलाज करना। ये मंदिर लोगों को बीमारियों से बचाने (Preventive Care), शुरुआती जांच (जैसे डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, कैंसर) और बुनियादी दवाएं देने के लिए बनाए गए हैं। विशेषज्ञ इलाज के लिए मरीजों को योजना से जुड़े बड़े अस्पतालों में रेफर किया जाता है। इसलिए कथन 3 गलत है।
कथन 4 सत्य है: यह योजना मरीज को अस्पताल के खर्चों से बड़ी राहत देती है। इसके तहत अस्पताल में भर्ती होने से 3 दिन पहले तक की जांचों का खर्च और छुट्टी मिलने के 15 दिनों बाद तक की दवाओं व डॉक्टर की फीस का खर्च योजना में शामिल है। यह मरीजों की जेब का खर्च घटाने में बहुत मददगार साबित हुआ है। इसलिए कथन 4 बिल्कुल सत्य है।
4. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Question)
अपनी मुख्य परीक्षा (Mains) के उत्तर लेखन को मजबूत करने के लिए इस प्रश्न का अभ्यास करें:
प्रश्न: “भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) की प्राप्ति में प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे का सुदृढ़ीकरण और आयुष्मान भारत (AB-PMJAY) का विस्तार पूरक भूमिका निभाते हैं।” इस कथन के आलोक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में आ रही चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए और नीति आयोग की हालिया सिफारिशों के आधार पर व्यावहारिक समाधान सुझाइए। (250 शब्द, 15 अंक)
मॉडल उत्तर संरचनात्मक रूपरेखा (Model Answer Blueprint):
1. प्रस्तावना (Introduction):
• उत्तर की शुरुआत सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की परिभाषा और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG 3.8) के साथ करें।
• नीति आयोग की समीक्षा रिपोर्ट (31 जुलाई 2026) का हवाला दें, जिसने बुजुर्गों के लिए योजना के विस्तार और स्वास्थ्य खर्च के लक्ष्यों के बीच की खाई को पाटने की आवश्यकता पर बल दिया है।
• संक्षेप में समझाएं कि प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर बीमारी की रोकथाम (Preventive Care) और बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए वित्तीय सुरक्षा कैसे एक-दूसरे से जुड़े हैं।
2. मुख्य भाग (Key Body Points):
भाग क: प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचा और आयुष्मान भारत (PMJAY) की पूरकता:
• सुरक्षा प्रहरी (Gatekeeping Role): आयुष्मान आरोग्य मंदिर बीमारी की शुरुआती पहचान करते हैं, जिससे बड़े अस्पतालों पर भीड़ और वित्तीय दबाव कम होता है।
• वित्तीय ढाल: अगर बीमारी गंभीर हो जाती है, तो आयुष्मान भारत का ₹5 लाख का कवर मरीज को कर्ज के जाल में फंसने से बचाता है।
• मजबूत रेफरल सिस्टम: दोनों मिलकर शुरुआत से लेकर जटिल सर्जरी तक इलाज की एक अटूट कड़ी बनाते हैं।
भाग ख: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में चुनौतियां:
• बजट की कमी (Underfunding): लक्ष्य 2025 तक जीडीपी का 2.5% खर्च करना था, लेकिन 2026 में भी हम 1.9% – 2.0% पर ही अटके हुए हैं।
• ‘मिसिंग मिडिल’ (Missing Middle) की अनदेखी: देश की लगभग 30% आबादी (करीब 40 करोड़ लोग) किसी भी स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे में नहीं है क्योंकि वे न तो गरीब हैं और न ही निजी बीमा खरीद सकते हैं।
• डॉक्टरों और स्टाफ की कमी: ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 1:1000 के मानक की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति चिंताजनक है।
• प्राइवेट अस्पतालों की बेरुखी: कम पैकेज दरों के कारण बड़े निजी अस्पताल इस योजना से जुड़ने से कतराते हैं।
• राज्यों की अपनी नीतियां: स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय होने के कारण, अलग-अलग राज्यों में इसके क्रियान्वयन की गति और गुणवत्ता अलग है।
3. आगे की राह और नीति आयोग के सुझाव (Way Forward & Recommendations):
(i) नए वित्तीय स्रोत (Innovative Financing):
• हेल्थ सेस (Health Cess) का पैसा सीधे प्राथमिक स्वास्थ्य और बुजुर्गों की देखभाल (Geriatric Care) पर खर्च हो। सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड्स और पीपीपी (PPP) मॉडल को बढ़ावा दें।
(ii) प्राथमिक चिकित्सा का सुदृढ़ीकरण (Strengthening Primary Care):
• आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को पूरी तरह डिजिटल बनाया जाए ताकि टेली-परामर्श (Tele-consultation) की सुविधा मिल सके। आवश्यक दवाओं और उपकरणों की आपूर्ति के लिए केंद्रीय खरीद प्रणाली लागू हो।
(iii) ‘मिसिंग मिडिल’ को जोड़ना (Inclusion of the Missing Middle):
• नीति आयोग के सुझाव के अनुसार, इस वर्ग के लिए कम प्रीमियम वाली बीमा योजनाएं लाई जाएं और IRDAI को इसके नियम आसान बनाने चाहिए।
(iv) डॉक्टरों व स्टाफ की कमी दूर करना (Capacity Building):
• ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने वाले डॉक्टरों के लिए विशेष भत्ते और करियर प्रोन्नति के अवसर सुनिश्चित किए जाएं।
(v) डिजिटल तकनीक का उपयोग (Leveraging ABDM):
• आभा आईडी (ABHA ID) के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड (EHR) को अनिवार्य बनाया जाए ताकि फालतू टेस्ट्स का खर्च बचे।
निष्कर्ष (Conclusion):
स्वस्थ नागरिक ही देश के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) की असली ताकत हैं। स्वास्थ्य पर खर्च करना कोई दान नहीं, बल्कि देश के मानव संसाधन में किया गया एक रणनीतिक आर्थिक निवेश है। नीति आयोग के सुझावों को अपनाकर भारत 2030 तक सभी के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का सपना पूरा कर सकता है और ‘विकसित भारत @ 2047’ की नींव मजबूत कर सकता है।
