One Health Approach & Zoonotic Diseases (July 07, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण

दिनांक: 07 जुलाई, 2026

1. चर्चा में क्यों? (Why in News)

क्या आप जानते हैं कि आने वाले समय की सबसे बड़ी महामारी किसी इंसानी वायरस से नहीं, बल्कि किसी जानवर या हमारे बदलते पर्यावरण के कारण फैल सकती है? हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), खाद्य और कृषि संगठन (FAO) तथा विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) के ‘चतुष्पक्षीय गठबंधन’ (Quadripartite Alliance) ने वैश्विक स्तर पर बढ़ती ज़ूनोटिक स्पिलओवर (Zoonotic Spillover) की घटनाओं पर एक संयुक्त रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट ने सीधे तौर पर सचेत किया है कि यदि हमने समय रहते ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण को अपनी मुख्य नीतियों में शामिल नहीं किया, तो आने वाले दशकों में मानवता को एक और विनाशकारी महामारी का सामना करना पड़ सकता है।

भारत सरकार भी इस मोर्चे पर सक्रिय हो गई है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के ‘नेशनल वन हेल्थ मिशन’ (National One Health Mission) ने अलग-अलग राज्यों में इंसानों, पशुओं और पर्यावरण की सेहत पर एक साथ नजर रखने वाले एकीकृत निगरानी केंद्रों की स्थापना का काम तेज कर दिया है। इसी वजह से यह विषय आजकल नीतिगत चर्चाओं के केंद्र में है।

2. पाठ्यक्रम के लिए इसकी प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)

यदि आप UPSC या MPSC की मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो आपके लिए इस विषय को समझना बेहद आवश्यक है। यह आपके पाठ्यक्रम के निम्नलिखित प्रश्नपत्रों से सीधे जुड़ता है:

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (GS Paper II): शासन व्यवस्था, जन स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक क्षेत्रों/सेवाओं का विकास और प्रबंधन।
  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (GS Paper III): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (दैनिक जीवन में इसके अनुप्रयोग), पर्यावरण, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां।

3. ‘वन हेल्थ’ का अर्थ और कुछ जरूरी शब्द

इस विषय को अच्छे से समझने के लिए आपको इन तीन प्रमुख शब्दों का अर्थ पता होना चाहिए:

  • वन हेल्थ (One Health): इसे आप तीन पैरों वाली एक स्टूल (त्रिपाई) की तरह समझ सकते हैं। इसमें पहला पैर इंसानी स्वास्थ्य है, दूसरा पशु स्वास्थ्य और तीसरा पर्यावरण। यदि इनमें से कोई भी एक पैर कमजोर हुआ, तो पूरी स्टूल गिर जाएगी। वन हेल्थ यही एकीकृत और सहयोगात्मक दृष्टिकोण है जो स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर पर इंसानों, पशुओं और हमारे साझा पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ बेहतर बनाने के लिए काम करता है।
  • ज़ूनोटिक रोग (Zoonotic Diseases): ये वे संक्रामक रोग हैं जो कशेरुकी जीवों (रीढ़ वाले जानवरों) से इंसानों में और इंसानों से जानवरों में (जिसे रिवर्स ज़ूनोसिस कहते हैं) प्राकृतिक रूप से फैलते हैं। उदाहरण के लिए, रेबीज, निपाह वायरस, इबोला, कोविड-19, बर्ड फ्लू (H5N1) और ब्रुसलोसिस इसके बड़े उदाहरण हैं।
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance – AMR): जब बैक्टीरिया, वायरस या कवक समय के साथ खुद को बदल लेते हैं और उन पर दवाएं बेअसर हो जाती हैं, तो इसे AMR कहते हैं। पशुपालन में जब हम बिना जरूरत एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं, तो ये रोगाणु और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं। इससे इंसानों और पशुओं दोनों के लिए खतरा बहुत बढ़ जाता है।

4. बीमारी, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का अटूट रिश्ता (The Triad Connection)

ज़ूनोटिक रोगों का फैलना केवल एक चिकित्सीय समस्या नहीं है। यह सीधे तौर पर हमारी प्रकृति को हो रहे नुकसान और आर्थिक प्रणालियों से जुड़ा हुआ है:

  • पर्यावरणीय पहलू: जब हम जंगलों को काटते हैं, अंधाधुंध शहरीकरण करते हैं या खेती का दायरा बढ़ाते हैं, तो हम वन्यजीवों के प्राकृतिक घरों को तबाह कर देते हैं। ऐसे में जंगली जानवर इंसानी बस्तियों के नजदीक आने को मजबूर हो जाते हैं। इससे उनके भीतर मौजूद वायरस और बैक्टीरिया बहुत आसानी से इंसानों में प्रवेश (स्पिलओवर) कर जाते हैं। बढ़ती गर्मी (जलवायु परिवर्तन) के कारण मच्छर और किलनी (Ticks) जैसे रोगवाहक अब उन नए इलाकों में भी पहुंच रहे हैं जहाँ वे पहले कभी नहीं पाए जाते थे।
  • आर्थिक प्रभाव: महामारियां केवल लोगों की जान नहीं लेतीं, बल्कि देशों की अर्थव्यवस्था को भी भारी चोट पहुंचाती हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि ज़ूनोटिक महामारियों के कारण दुनिया को खरबों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है। जब पशुओं में बीमारियां फैलती हैं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है, खाद्य सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार ठप हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब बर्ड फ्लू फैलता है, तो पोल्ट्री उद्योग को बचाने के लिए लाखों मुर्गियों को मारना पड़ता है, जिससे छोटे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

5. भारत में इसके रास्ते की बड़ी रुकावटें (Structural Issues in India)

यदि भारत में वन हेल्थ दृष्टिकोण को लागू करना है, तो हमें कई प्रशासनिक और ढांचागत चुनौतियों का सामना करना होगा:

  • विभागों के बीच की दीवारें (Silos): हमारे देश में इंसानी स्वास्थ्य की देखभाल स्वास्थ्य मंत्रालय करता है, पशुओं की सेहत का जिम्मा पशुपालन विभाग के पास है और पर्यावरण की सुरक्षा वन मंत्रालय देखता है। ये सभी विभाग आपस में तालमेल बिठाए बिना अलग-अलग द्वीपों की तरह काम करते हैं। इनके पास डेटा साझा करने या किसी महामारी से मिलकर निपटने के लिए कोई स्थायी साझा मंच नहीं है।
  • कमजोर निगरानी प्रणाली (Weak Surveillance): इंसानों में बीमारियों पर नजर रखने के लिए हमारे पास एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) तो है, लेकिन वन्यजीवों और घरेलू पशुओं की बीमारियों की समय पर पहचान करने के लिए हमारे पास कोई मजबूत तंत्र नहीं है। जब तक हम पशुओं में पनप रहे संक्रमण को शुरुआत में ही नहीं पकड़ेंगे, तब तक हम इंसानी आबादी को सुरक्षित नहीं रख सकते।
  • विशेषज्ञों की कमी: हमारे यहाँ ऐसे विशेषज्ञों की भारी कमी है जो इंसानी डॉक्टरों, पशु चिकित्सकों और पर्यावरण वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम कर सकें। साथ ही, ग्रामीण इलाकों में बुनियादी पशु चिकित्सा सेवाएं भी बहुत लचर स्थिति में हैं।

6. हमारा संविधान और कानूनी ढांचा क्या कहता है? (Constitutional & Legal Dimensions)

भारतीय संविधान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों, पशुओं और पर्यावरण के स्वास्थ्य की रक्षा की वकालत करता है। मुख्य परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लिए आपको इन प्रावधानों का उल्लेख जरूर करना चाहिए:

  • अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार): सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार के भीतर प्रदूषण मुक्त पर्यावरण और अच्छे स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP): अनुच्छेद 47 राज्यों को निर्देश देता है कि वे लोगों के पोषण और जीवन स्तर को ऊंचा उठाएं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करें। वहीं, अनुच्छेद 48ए निर्देश देता है कि राज्य पर्यावरण की रक्षा करेगा और देश के जंगलों व वन्यजीवों को सुरक्षित रखेगा।
  • मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties): अनुच्छेद 51ए (जी) के तहत प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह जंगलों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।
  • शक्तियों का विभाजन (सातवीं अनुसूची): हमारे संविधान में जनस्वास्थ्य और स्वच्छता को राज्य सूची (प्रविष्टि 6) में रखा गया है। वहीं, पशुओं में महामारियों को रोकने तथा वन और वन्यजीवों के संरक्षण से जुड़े विषयों को समवर्ती सूची (प्रविष्टि 17, 17ए, 17बी) में शामिल किया गया है। यह कानूनी विभाजन अक्सर केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत तालमेल में मुश्किलें पैदा करता है।

7. आगे की राह (Way Forward)

हम इन चुनौतियों को कैसे दूर कर सकते हैं? इसके लिए हमें निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:

  • संस्थागत तालमेल: हमें राष्ट्रीय स्तर पर एक शक्तिशाली ‘वन हेल्थ राष्ट्रीय परिषद’ (National One Health Council) का गठन करना चाहिए, जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को रिपोर्ट करे। इससे मंत्रालयों के बीच का आपसी गतिरोध दूर हो सकेगा।
  • डिजिटल एकीकरण: इंसानों, पालतू पशुओं और वन्यजीवों की बीमारियों के लक्षणों पर वास्तविक समय (Real-time) में नजर रखने के लिए एक साझा डिजिटल डेटाबेस विकसित किया जाना चाहिए। यदि हम इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करें, तो बीमारी के फैलने से पहले ही उसका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
  • स्थानीय लोगों की भागीदारी: हमें जमीनी स्तर पर आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और ग्रामीण पशु चिकित्सा सहायकों को प्रशिक्षित करना होगा। ये लोग पशुओं में दिखने वाले किसी भी संदिग्ध लक्षण की पहचान करके तुरंत ब्लॉक स्तर पर इसकी रिपोर्ट कर सकेंगे।

8. अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न (Practice Prelims MCQ)

प्रश्न: ‘वन हेल्थ ज्वाइंट प्लान ऑफ Action (2022-2026)’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह योजना केवल विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) ने मिलकर शुरू की है।
  2. इसका मुख्य उद्देश्य रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) और ज़ूनोटिक महामारियों के खतरों को कम करने के लिए क्षमता निर्माण करना है।
  3. भारत ने इस योजना के तहत अपने राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन को पूरी तरह से संरेखित किया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (B) केवल 2 और 3

स्पष्टीकरण: पहला कथन गलत है क्योंकि ‘वन हेल्थ ज्वाइंट प्लान ऑफ Action’ को किसी दो संस्थाओं ने नहीं, बल्कि ‘चतुष्पक्षीय गठबंधन’ (जिसमें WHO और WOAH के अलावा FAO और UNEP भी शामिल हैं) ने मिलकर शुरू किया है। दूसरा और तीसरा कथन बिल्कुल सही हैं। यह योजना वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य प्रणालियों को आपस में जोड़ने पर केंद्रित है और भारत का राष्ट्रीय मिशन भी इसके लक्ष्यों के अनुरूप ही काम कर रहा है।

9. अभ्यास मुख्य परीक्षा प्रश्न (Practice Mains Question)

प्रश्न: “कोविड-19 महामारी के बाद के दौर में ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण कोई विकल्प नहीं बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।” भारत में ज़ूनोटिक संक्रमणों की संवेदनशीलता के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए तथा इसके क्रियान्वयन में आने वाली प्रशासनिक चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

मॉडल उत्तर के मुख्य बिंदु:

भूमिका: वैश्विक स्तर पर सामने आने वाले नए संक्रामक रोगों का लगभग 75% हिस्सा ज़ूनोटिक (जानवरों से इंसानों में फैलने वाला) होता है। भारत अपनी घनी आबादी, विविध वन्यजीवों और इंसानों व जानवरों के बीच के करीबी संपर्क के कारण इस खतरे के प्रति बेहद संवेदनशील है। इसलिए, ‘वन हेल्थ’ को लागू करना अब हमारे लिए कोई विकल्प नहीं बल्कि एक जरूरत बन गया है।

भारत की संवेदनशीलता के कारण: हम जंगलों को तेजी से काट रहे हैं और अनियंत्रित तरीके से मवेशियों का पालन कर रहे हैं। हमारे गीले बाजारों (Wet Markets) में साफ-सफाई की भारी कमी है। इसके अलावा, हमारी सीमाओं पर होने वाले अवैध और असुरक्षित पशु व्यापार से भी नई बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है।

‘वन हेल्थ’ की आवश्यकता क्यों है? यह हमें बीमारियों के प्रकोप से पहले ही चेतावनी देने वाला एक मजबूत तंत्र प्रदान करेगा। इससे हम एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने (AMR) की समस्या पर लगाम लगा सकेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भविष्य में आने वाली महामारियों के इलाज पर होने वाले भारी बजटीय खर्च को बचाकर हम “बचाव ही इलाज है” (Prevention is better than cure) के मूलमंत्र को सच साबित कर सकेंगे।

प्रशासनिक चुनौतियाँ: हमारे प्रमुख मंत्रालयों (स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण) के बीच तालमेल की बड़ी कमी है। हमारा स्वास्थ्य बजट भी केवल इंसानी बीमारियों के इलाज पर केंद्रित रहता है, जबकि पशुओं और पर्यावरण के स्वास्थ्य पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा, राज्य स्तर पर हमारे पास पंचायतों और ब्लॉकों तक ऐसा कोई एकीकृत ढांचा मौजूद नहीं है।

निष्कर्ष: यदि हम ‘नेशनल वन हेल्थ मिशन’ को कानूनी मजबूती देते हैं और बजट आवंटन को संतुलित करते हैं, तो भारत न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकेगा, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा के मामले में दुनिया का नेतृत्व भी कर सकेगा।


यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है।


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लेखिका के बारे में: भाग्यश्री

भाग्यश्री एक वरिष्ठ सिविल सेवा मेंटर और शिक्षिका हैं, जिन्हें UPSC और MPSC उम्मीदवारों का मार्गदर्शन करने का 8 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उन्होंने कई बार सिविल सेवा मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण की है और सैकड़ों सफल प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है। वे जटिल जीएस पाठ्यक्रम और CSAT रणनीतियों को व्यावहारिक अध्ययन प्रणालियों में बदलने में माहिर हैं।

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