Telangana Aarogyasri network hospitals warn of opting out of new EHS over revised CGHS tariffs (July 17, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण

तेलंगाना आरोग्यश्री नेटवर्क अस्पतालों का नए कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS) से बाहर होने का अल्टीमेटम: एक व्यापक विश्लेषण

1. परिचय और वर्तमान संदर्भ (Introduction & Current Context)

तेलंगाना आरोग्यश्री नेटवर्क हॉस्पिटल्स एसोसिएशन (AHNA) ने राज्य सरकार को एक बड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कह दिया है कि वे नई कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS) से बाहर हो जाएंगे। सारा विवाद तब शुरू हुआ जब सरकार ने इन निजी अस्पतालों पर केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) की नई दरों और पैकेजों को थोपने का फैसला किया। अस्पतालों का दावा है कि ये नई दरें उनके खर्चे भी पूरे नहीं कर पाएंगी। अगर ऐसा हुआ, तो वे मरीजों को बेहतर इलाज नहीं दे पाएंगे।

इस टकराव का सीधा असर राज्य के 4 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों पर पड़ेगा। उनका मुफ्त (कैशलेस) इलाज रुक सकता है। यह मामला दिखाता है कि कैसे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और निजी अस्पतालों की कमाई के बीच हमेशा एक खींचतान बनी रहती है। वैसे भी, निजी अस्पताल काफी समय से आरोग्यश्री और EHS के पुराने भुगतानों में हो रही देरी से परेशान हैं। अब कम दरों के इस नए नियम ने आग में घी डालने का काम किया है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब लोगों की सेहत की सुरक्षा और इलाज के खर्च के बीच तालमेल बिठाना नीति निर्माताओं के लिए सिरदर्द बन गया है।

2. पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)

अपनी सिविल सेवा मुख्य परीक्षा की तैयारी के दौरान इस विषय पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए, आपको अपने पाठ्यक्रम के इन हिस्सों पर ध्यान देना चाहिए:

पेपर (Paper) महत्वपूर्ण विषय (Syllabus Topics)
सामान्य अध्ययन II (GS Paper II) शासन व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधन से जुड़ी सामाजिक कल्याणकारी नीतियां। सरकारी योजनाओं के डिजाइन और उनके अमल में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियां।
सामान्य अध्ययन III (GS Paper III) आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचा (स्वास्थ्य अवसंरचना) और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल की सीमाएं और चुनौतियां।

3. मुख्य बिंदु और विवाद के संरचनात्मक मुद्दे (Key Highlights & Structural Issues)

इस संकट को समझने के लिए आपको एक त्रिकोणीय रिश्ते को देखना होगा—एक तरफ सरकार है, दूसरी तरफ निजी अस्पताल और तीसरी तरफ इलाज चाहने वाले सरकारी कर्मचारी। आइए इस विवाद के मुख्य कारणों को आसान भाषा में समझते हैं:

  • योजनाओं की शुरुआत की कहानी: सरकार ने पहले गरीबों के इलाज के लिए आरोग्यश्री योजना शुरू की थी। इसके बाद कर्मचारियों के लिए EHS को लाया गया। मकसद साफ था—कर्मचारियों को फाइलों के चक्करों और कागजी कार्रवाई से मुक्ति दिलाकर निजी अस्पतालों में सीधे कैशलेस इलाज देना। लेकिन शुरुआत से ही यह सिस्टम बजट की कमी और अस्पतालों के लटके हुए भुगतानों के कारण हांफता रहा है।
  • निजी अस्पतालों का गणित: अस्पतालों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन (AHNA) का कहना है कि सरकार ने CGHS दरों को बिना किसी वैज्ञानिक तरीके के तय किया है। इसे एक उदाहरण से समझिए: मान लीजिए आपकी दुकान का किराया, बिजली का बिल और स्टाफ की सैलरी 40% बढ़ गई हो, लेकिन आपका मुख्य खरीदार आपसे 5 साल पुरानी कीमतों पर सामान बेचने की जिद करे। यही हाल निजी अस्पतालों का है। उपकरणों के आयात शुल्क, दवाइयों, नर्सों की सैलरी और कचरा प्रबंधन (बायोमेडिकल वेस्ट) का खर्च 30% से 40% तक बढ़ चुका है। ऐसे में कम दरों पर काम करना अस्पतालों को घाटे के गड्ढे में धकेल देगा।
  • सरकार की अपनी मजबूरियां: लोकतांत्रिक सरकार होने के नाते राज्य सरकार अपने कर्मचारियों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन सरकार का खजाना भी असीमित नहीं है। सरकार पर राजकोषीय घाटा कम करने का भारी दबाव है। सरकार चाहती है कि टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल सोच-समझकर हो, इसलिए वह CGHS दरों को एक मानक मानकर स्वास्थ्य खर्चों पर लगाम लगाना चाहती है।
  • सालों-साल का बकाया: आरोग्यश्री और EHS के तहत इलाज करने के बाद अस्पतालों को सरकारी पैसा मिलने में 6 से 12 महीने तक लग जाते हैं। इस सुस्त रवैये ने अस्पतालों की दैनिक नकदी (वर्किंग कैपिटल) को सुखा दिया है। छोटे और मध्यम स्तर के अस्पताल डॉक्टरों और दवा विक्रेताओं का समय पर भुगतान नहीं कर पा रहे हैं।

4. प्रमुख शब्दावली और संवैधानिक/कानूनी पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis of Key Terms and Constitutional/Legal Aspects)

परीक्षा की तैयारी के नजरिए से आपको इन महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दों और संवैधानिक धाराओं को अच्छे से समझ लेना चाहिए:

  • आरोग्यश्री योजना (Aarogyasri Scheme): तेलंगाना की यह एक बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है। इसका मुख्य लक्ष्य गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले परिवारों को जानलेवा बीमारियों के इलाज के लिए सुरक्षा देना है। आरोग्यश्री हेल्थ केयर ट्रस्ट इसे चलाता है और इसके तहत मरीजों को बड़े अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिलता है।
  • कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS): यह योजना सरकारी कर्मचारियों, रिटायर्ड पेंशनभोगियों और उनके परिवारों के लिए है। इलाज का पूरा खर्च कैशलेस होता है, जिसमें से कुछ हिस्सा कर्मचारी की सैलरी से कटता है और बाकी पैसा सरकार मिलाती है।
  • संशोधित CGHS दरें: केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों के लिए केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) चलाती है। इसकी दरें पूरे देश में इलाज की मानक दरें मानी जाती हैं। हालांकि, दिल्ली की तुलना में तेलंगाना के किसी शहर में जमीन का किराया या अस्पताल चलाने का खर्च अलग हो सकता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली के बड़े मॉल की दुकान का किराया और गाँव की छोटी दुकान का किराया अलग-अलग होता है। दोनों पर एक जैसी वित्तीय नीतियां नहीं थोपी जा सकतीं। इसलिए निजी अस्पताल पूरे देश में एक समान दरों को थोपने का विरोध कर रहे हैं।

संविधान और कोर्ट के बड़े फैसले:

  • अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार): सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि स्वस्थ जीवन के बिना जीने के अधिकार का कोई मतलब नहीं है। पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) मामले में कोर्ट ने साफ किया था कि सरकार पैसों की कमी का बहाना बनाकर किसी नागरिक को आपातकालीन इलाज से मना नहीं कर सकती। एक लोक कल्याणकारी राज्य के लिए स्वास्थ्य सेवाएं देना सर्वोच्च प्राथमिकता है।
  • पंजाब राज्य बनाम राम लुभाया बग्गा (1998): इस फैसले में कोर्ट ने सरकार को भी थोड़ी राहत दी। कोर्ट ने माना कि स्वास्थ्य का अधिकार मौलिक तो है, लेकिन सरकार के पास भी असीमित बजट नहीं है। सरकार अपनी वित्तीय सीमाओं को ध्यान में रखकर इलाज की दरें तय कर सकती है, बशर्ते वे दरें तार्किक हों।
  • अनुच्छेद 47 (नीति निदेशक तत्व): यह अनुच्छेद राज्य सरकारों को निर्देश देता है कि वे लोगों के खान-पान, पोषण और स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने को अपना प्राथमिक कर्तव्य मानें।
  • सातवीं अनुसूची (स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय): हमारे संविधान में स्वास्थ्य (प्रविष्टि 6) को राज्य सूची में रखा गया है। इसका मतलब है कि स्वास्थ्य सेवाएं कैसे चलेंगी और इसके लिए बजट कहां से आएगा, यह तय करने का पूरा अधिकार राज्य सरकार का है। इसी वजह से राज्यों के पास वित्तीय दबाव ज्यादा रहता है।

5. आर्थिक एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति संयोजन (Economic & Public Health Policy Connection)

यह विवाद केवल तेलंगाना का नहीं है, बल्कि यह देश के पूरे हेल्थकेयर सिस्टम की आर्थिक कमजोरियों को दिखाता है। मुख्य परीक्षा के उत्तर लिखते समय आपको इन महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल करना चाहिए:

स्वास्थ्य बाजार में एकक्रेताधिकार (Monopsony in Healthcare Market)
इसे एक साधारण उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपके गांव में गन्ने की फसल खरीदने वाला केवल एक ही मिल मालिक है। अब वह जो भी कीमत तय करेगा, किसानों को उसी पर गन्ना बेचना पड़ेगा क्योंकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अर्थशास्त्र में इसे मोनोप्सॉनी (एकक्रेताधिकार) कहते हैं।
जब सरकार आरोग्यश्री और EHS जैसी योजनाओं के जरिए बाजार में स्वास्थ्य सेवाओं की अकेली सबसे बड़ी खरीदार बन जाती है, तो वह अस्पतालों को बहुत कम कीमतों पर इलाज करने के लिए मजबूर कर सकती है। लेकिन अगर कीमतें अस्पताल की लागत से भी नीचे चली जाएं, तो अस्पताल हाथ खड़े कर देते हैं। इससे बाजार फेल हो जाता है और मरीजों को इलाज मिलना बंद हो जाता है।

जेब से होने वाला खर्च (Out-of-Pocket Expenditure – OOPE) का दुष्चक्र
भारत में आज भी इलाज के कुल खर्च का लगभग 48% हिस्सा लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता है। अचानक कोई बड़ी बीमारी आने पर मध्यमवर्ग और गरीब परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं, जैसे किसी परिवार की सालों की जमा-पूंजी एक ही बार अस्पताल में भर्ती होने पर स्वाहा हो जाए। EHS इस झटके को रोकने के लिए एक ढाल है। लेकिन जब निजी अस्पताल इन योजनाओं से बाहर हो जाते हैं, तो कर्मचारियों को मजबूरन अपनी जेब से मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। इससे उनकी सालों की बचत खत्म हो जाती है और बाजार में उनकी खरीदारी करने की क्षमता घट जाती है।

महामारियों और पर्यावरणीय संकटों से जुड़ाव
कोरोना महामारी के दिनों को याद कीजिए। सरकारी अस्पताल मरीजों की भीड़ से पटे पड़े थे और निजी अस्पतालों के बिना स्थिति को संभालना नामुमकिन था। भविष्य में आने वाली किसी भी नई महामारी (जैसे बर्ड फ्लू या अन्य जूनोटिक रोग) से निपटने के लिए सरकार और निजी अस्पतालों का मिलकर काम करना बेहद जरूरी है। यदि निजी अस्पताल पहले ही सरकारी योजनाओं से नाता तोड़ लेंगे, तो संकट के समय हमारी स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली पूरी तरह चरमरा जाएगी।

6. निष्कर्ष और आगे की राह (Conclusion & Way Forward)

इस गतिरोध को सुलझाने और व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार को तुरंत इन व्यावहारिक कदमों को उठाना चाहिए:

  • स्वतंत्र मूल्य नियामक आयोग बनाना: जिस तरह बिजली दरों के लिए नियामक होते हैं, उसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भी एक स्वतंत्र संस्था बननी चाहिए। यह संस्था शहरों की श्रेणी (टीयर-1, टीयर-2) और महंगाई दर के हिसाब से इलाज का वैज्ञानिक खर्च तय करे, ताकि अस्पतालों को भी नुकसान न हो।
  • पेमेंट के लिए एस्क्रो खाता और गारंटी: अस्पतालों के भुगतान की देरी को खत्म करने के लिए सरकार को एक सुरक्षित एस्क्रो खाता (Escrow Account) बनाना चाहिए। नियम ऐसा होना चाहिए कि अगर 30 दिनों में भुगतान नहीं हुआ, तो सरकार अस्पतालों को ब्याज देगी। इससे अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी।
  • सह-भुगतान (Co-payment) का विकल्प: ज्यादा वेतन पाने वाले अधिकारियों के लिए सरकार आंशिक सह-भुगतान का नियम ला सकती है। यानी इलाज के खर्च का 10-20% हिस्सा खुद कर्मचारी दे और बाकी सरकार दे। इससे सरकारी खजाने पर लोड कम होगा और अस्पतालों को सही दर मिल सकेगी।
  • सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना: सबसे पक्का इलाज यही है कि सरकार निजी अस्पतालों पर अपनी निर्भरता कम करे। इसके लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्य के मुताबिक स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर जीडीपी का 2.5% करना होगा और जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों को आधुनिक बनाना होगा।

7. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Prelims MCQ)

प्रश्न: भारत में स्वास्थ्य नीति, संवैधानिक प्रावधानों और संबंधित योजनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल’ समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आते हैं।
  2. सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के एक हिस्से के रूप में स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है।
  3. केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) देश के सभी नागरिकों के लिए एक स्वैच्छिक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजना है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3

उत्तर: B) केवल 2

स्पष्टीकरण:
कथन 1 गलत है: ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता; अस्पताल और औषधालय’ भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 6 का विषय हैं, न कि समवर्ती सूची का।
कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996)’ के ऐतिहासिक मामले में यह स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किए गए जीवन के अधिकार में स्वास्थ्य का अधिकार और समय पर चिकित्सा उपचार प्राप्त करने का अधिकार शामिल है।
कथन 3 गलत है: केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) सभी नागरिकों के लिए नहीं है, बल्कि यह केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनभोगियों, सांसदों, पूर्व सांसदों और उनके आश्रितों जैसे विशिष्ट लाभार्थियों के लिए एक स्वास्थ्य सेवा योजना है। आम नागरिकों के लिए केंद्र सरकार की प्रमुख योजना ‘आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ (PM-JAY) है। अतः केवल कथन 2 सही है।

8. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)

प्रश्न: “भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) प्राप्त करने में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल एक महत्वपूर्ण उपकरण रहा है, लेकिन हाल के नीतिगत गतिरोध निजी मुनाफे और सार्वजनिक कल्याण के बीच बढ़ते अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हैं।” तेलंगाना के कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS) विवाद के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर के मॉडल बिंदु (Model Answer Points):

भूमिका (Introduction):
– उत्तर की शुरुआत हाल ही में तेलंगाना आरोग्यश्री नेटवर्क अस्पतालों द्वारा EHS की संशोधित दरों के विरोध में योजना से बाहर होने की दी गई चेतावनी के संदर्भ से करें।
– यह स्पष्ट करें कि कैसे भारत में सीमित सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट (जीडीपी का लगभग 2.1%) के कारण माध्यमिक और तृतीयक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति के लिए निजी क्षेत्र पर राज्य की निर्भरता अत्यधिक बढ़ गई है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में PPP मॉडल की आवश्यकता और भूमिका:
अवसंरचना की कमी को पाटना: सरकारी अस्पतालों पर अत्यधिक भार और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की कमी के कारण, निजी अस्पतालों का नेटवर्क गंभीर बीमारियों (कैंसर, हृदय रोग, न्यूरोलॉजी) के त्वरित इलाज में मदद करता है।
वित्तीय सुरक्षा: आयुष्मान भारत, आरोग्यश्री और EHS जैसी योजनाएं गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को ‘आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय’ (OOPE) के कारण ऋण के कुचक्र में फंसने से बचाती हैं।
सेवा की गुणवत्ता: निजी प्रदाताओं के माध्यम से मरीजों को बेहतर तकनीक और त्वरित चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होती हैं।

विवाद के मुख्य कारण और अंतर्निहित संघर्ष (निजी लाभ बनाम सार्वजनिक कल्याण):
लागत और टैरिफ का विवाद: सरकार लागत को न्यूनतम रखकर अधिकतम कल्याण करना चाहती है (सार्वजनिक कल्याण), जबकि निजी अस्पताल बढ़ती मुद्रास्फीति, कर्मचारियों के वेतन और चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव की उच्च परिचालन लागत के कारण अधिक दरों की मांग करते हैं (व्यावसायिक व्यवहार्यता)।
एकतरफा मूल्य निर्धारण: सरकारों द्वारा बिना वैज्ञानिक इनपुट और स्थानीय आर्थिक वास्तविकताओं को समझे एकतरफा CGHS जैसी दरों को लागू करने से निजी प्रदाताओं में असंतोष उत्पन्न होता है।
भुगतान चक्र में अत्यधिक देरी: नौकरशाही की लालफीताशाही के कारण दावों के निपटान में महीनों की देरी होती है, जिससे अस्पतालों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) समाप्त हो जाती है और वे सेवाएं बंद करने पर मजबूर हो जाते हैं।
गुणवत्ता से समझौता: अत्यधिक कम पैकेज दरों के कारण निजी अस्पतालों में घटिया चिकित्सा सामग्री के उपयोग या योग्य स्टाफ की कमी का जोखिम बढ़ जाता है, जो मरीज की सुरक्षा को खतरे में डालता है।

सुधारात्मक उपाय और आगे की राह (Way Forward):
स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण: ट्राई (TRAI) या डीईआरसी (DERC) की तर्ज पर स्वास्थ्य दरों के नियमन के लिए एक स्वतंत्र ‘स्वास्थ्य सेवा मूल्य निर्धारण नियामक’ की स्थापना की जाए।
समयबद्ध दावा निपटान: ‘एस्क्रो खाता’ प्रणाली के माध्यम से 30 दिनों के भीतर स्वचालित भुगतान और देरी होने पर ब्याज का प्रावधान किया जाए।
सह-भुगतान मॉडल (Co-payment Model): उच्च आय वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए आंशिक अंशदान का मॉडल अपनाया जा सकता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में सुदृढ़ीकरण: दीर्घकालिक समाधान यही है कि राज्य स्वयं सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों को विश्वस्तरीय बनाए ताकि निजी क्षेत्र पर निर्भरता कम हो।

निष्कर्ष (Conclusion):
– भारत में स्वास्थ्य सेवा का लोक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि यह दोनों पक्षों के लिए पारस्परिक रूप से व्यवहार्य न हो। सरकार को निजी क्षेत्र को एक व्यावसायिक भागीदार के रूप में स्वीकार करते हुए तार्किक दरें देनी होंगी, और निजी क्षेत्र को भी सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता देनी होगी। तभी हम सतत विकास लक्ष्य (SDG-3: अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण) और अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त स्वास्थ्य के अधिकार की वास्तविक प्राप्ति सुनिश्चित कर सकते हैं।


यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।


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लेखिका के बारे में: भाग्यश्री

भाग्यश्री पिछले 8 वर्षों से अधिक समय से UPSC और MPSC उम्मीदवारों का मार्गदर्शन करने वाली एक वरिष्ठ सिविल सेवा मेंटर और शिक्षिका हैं। कई बार सिविल सेवा मुख्य परीक्षा पास करने और सैकड़ों सफल प्रशासनिक अधिकारियों को कोचिंग देने के बाद, वह जटिल सामान्य अध्ययन (GS) पाठ्यक्रम और CSAT पद्धतियों को व्यावहारिक अध्ययन रणनीतियों में तोड़ने की विशेषज्ञ हैं।

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