तेलंगाना आरोग्यश्री नेटवर्क अस्पतालों का नए कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS) से बाहर होने का अल्टीमेटम: एक व्यापक विश्लेषण
1. परिचय और वर्तमान संदर्भ (Introduction & Current Context)
हाल ही में, तेलंगाना आरोग्यश्री नेटवर्क हॉस्पिटल्स एसोसिएशन (AHNA) ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित नई कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (Employees Health Scheme – EHS) से बाहर होने (Opt-out) की कड़ी चेतावनी दी है। यह विवाद मुख्य रूप से राज्य सरकार द्वारा निजी सूचीबद्ध अस्पतालों पर संशोधित केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (Central Government Health Scheme – CGHS) शुल्कों (Tariffs) और पैकेज दरों को लागू करने के प्रस्ताव से उत्पन्न हुआ है। निजी अस्पतालों का तर्क है कि संशोधित CGHS दरें उनके परिचालन घाटे को अत्यधिक बढ़ाएंगी, जिससे गुणवत्तापूर्ण तृतीयक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगा। यह गतिरोध न केवल तेलंगाना में लगभग 4 लाख से अधिक सेवारत सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के कैशलेस स्वास्थ्य उपचार को गंभीर संकट में डालता है, बल्कि भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में राज्य-निजी भागीदारी (PPP) के अंतर्निहित ढांचागत अंतर्विरोधों को भी उजागर करता है। वर्तमान में, आरोग्यश्री और EHS के तहत निजी अस्पतालों के बकाया भुगतान में होने वाला महीनों का विलंब पहले से ही एक गंभीर चिंता का विषय रहा है, और नए नियमों के तहत कम दरों पर दबाव बनाने से यह संकट और गहरा गया है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करना नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
2. पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)
यह मुद्दा संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे TSPSC, MPSC, UPPSC) की सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के निम्नलिखित प्रश्नपत्रों और विषयों से सीधे संबंधित है:
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II (GS Paper II): शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय। विशेष रूप से: ‘स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय’, ‘सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न होने वाले मुद्दे’।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III (GS Paper III): आर्थिक विकास। विशेष रूप से: ‘बुनियादी ढांचा: ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि (इसमें सामाजिक बुनियादी ढांचे के रूप में स्वास्थ्य अवसंरचना भी शामिल है)’ तथा ‘लोक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल और उसकी चुनौतियां’ और ‘स्वास्थ्य अर्थशास्त्र (Health Economics)’।
3. मुख्य बिंदु और विवाद के संरचनात्मक मुद्दे (Key Highlights & Structural Issues)
इस संकट के मूल में निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, सरकारी खजाने और लाभार्थियों (सरकारी कर्मचारियों) के बीच एक त्रिकोणीय संघर्ष है। इस विवाद के प्रमुख ऐतिहासिक और संरचनात्मक आयाम निम्नलिखित हैं:
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: तेलंगाना (और अविभाजित आंध्र प्रदेश) में आरोग्यश्री योजना को समाज के गरीब वर्गों के लिए एक क्रांतिकारी स्वास्थ्य बीमा मॉडल के रूप में शुरू किया गया था। बाद में, सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए EHS की शुरुआत की गई ताकि उन्हें चिकित्सा प्रतिपूर्ति (Medical Reimbursement) की जटिल कागजी कार्रवाई से मुक्ति दिलाकर निजी अस्पतालों में कैशलेस उपचार प्रदान किया जा सके। हालांकि, प्रारंभ से ही यह योजना समय पर बजट जारी न होने और निजी अस्पतालों के दावों के भुगतान में देरी के कारण विवादों में घिरी रही है।
निजी अस्पतालों के तर्क और वित्तीय अव्यवहार्यता: नेटवर्क अस्पतालों के संघ (AHNA) का कहना है कि CGHS की वर्तमान पैकेज दरें वैज्ञानिक लागत विश्लेषण (Scientific Cost Analysis) पर आधारित नहीं हैं। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में चिकित्सा उपकरणों के आयात शुल्क, उपभोज्य सामग्रियों (Consumables) के दाम, नर्सिंग और तकनीकी स्टाफ के वेतन तथा बिजली व जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन (Biomedical Waste Management) के खर्चों में 30% से 40% तक की वृद्धि हुई है। ऐसे में, यदि सरकार उन्हें नई कम दरों पर उपचार करने के लिए बाध्य करती है, तो अस्पतालों का अस्तित्व बचाना कठिन हो जाएगा और वे वित्तीय दिवालियापन की कगार पर पहुंच जाएंगे।
सरकार का राजकोषीय दबाव और बजटीय सीमाएं: राज्य सरकार अपने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को कल्याणकारी योजनाएं प्रदान करने के लिए संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध है, लेकिन साथ ही वह बढ़ते राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) और बजटीय सीमाओं से भी बंधी है। सरकार का उद्देश्य चिकित्सा उपचार की लागत को नियंत्रित करना और करदाताओं के पैसे का तर्कसंगत उपयोग करना है। यही कारण है कि सरकार CGHS दरों को एक राष्ट्रीय मानक के रूप में अपनाना चाहती है ताकि स्वास्थ्य सेवा पर होने वाले सार्वजनिक व्यय को एक निश्चित और प्रबंधनीय सीमा में रखा जा सके।
भुगतान चक्र में अत्यधिक देरी (Delayed Reimbursements): अतीत में, आरोग्यश्री और EHS के तहत दावों के निपटान में 6 से 12 महीनों तक की देरी हुई है। इस विलंबित भुगतान चक्र ने निजी अस्पतालों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। छोटे और मध्यम दर्जे के निजी अस्पतालों का कहना है कि कम दरों पर काम करने के साथ-साथ यदि भुगतान भी समय पर न मिले, तो उनके लिए डॉक्टरों की फीस और दवा विक्रेताओं का भुगतान करना असंभव हो जाता है।
4. प्रमुख शब्दावली और संवैधानिक/कानूनी पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis of Key Terms and Constitutional/Legal Aspects)
इस विषय को व्यापक रूप से समझने के लिए इससे जुड़ी विभिन्न योजनाओं, तकनीकी शब्दावलियों और संवैधानिक प्रावधानों का विश्लेषण आवश्यक है:
आरोग्यश्री योजना (Aarogyasri Scheme): यह तेलंगाना में लागू एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना है। इसका मुख्य उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों को गंभीर और जीवन-घातक बीमारियों के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है। इसके तहत लाभार्थियों को सूचीबद्ध निजी और सरकारी अस्पतालों में कैशलेस तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल (Tertiary Healthcare) प्रदान की जाती है। इसका संचालन आरोग्यश्री हेल्थ केयर ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।
कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS): यह योजना राज्य सरकार के वर्तमान कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और उनके आश्रित परिवार के सदस्यों के लिए डिज़ाइन की गई है। यह पुरानी प्रतिपूर्ति प्रणाली की जगह कैशलेस उपचार की सुविधा देती है। इसके अंतर्गत प्रीमियम का भुगतान आंशिक रूप से कर्मचारी के वेतन से अंशदान के रूप में और आंशिक रूप से राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।
संशोधित CGHS दरें: केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) भारत सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए स्वास्थ्य योजना है। इसकी दरों को पूरे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की प्रति-प्रक्रिया लागत के निर्धारण के लिए एक बेंचमार्क माना जाता है। हालांकि, राज्यों की स्थानीय आर्थिक परिस्थितियां, रियल एस्टेट की लागत और अस्पताल संचालन लागत अलग-अलग होती हैं, इसलिए राज्य स्तर पर केंद्रीय दरों को सीधे लागू करने का निजी अस्पताल कड़ा विरोध करते रहे हैं।
संवैधानिक परिप्रेक्ष्य और न्यायिक व्याख्याएं:
अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार): माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक मामलों में यह स्पष्ट किया है कि जीवन के अधिकार में स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health) भी शामिल है। ‘पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996)’ के मामले में न्यायालय ने कहा था कि एक कल्याणकारी राज्य में सरकार का प्राथमिक कर्तव्य लोगों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करना है। किसी भी आपातकालीन स्थिति में वित्तीय संसाधनों की कमी का हवाला देकर किसी नागरिक को इलाज से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार, ‘पंजाब राज्य बनाम राम लुभाया बग्गा (1998)’ के मामले में न्यायालय ने माना कि यद्यपि स्वास्थ्य का अधिकार मौलिक है, लेकिन सरकार वित्तीय सीमाओं के भीतर चिकित्सा प्रतिपूर्ति की दरें निर्धारित करने का अधिकार रखती है। यह निर्णय सरकार को दरों को विनियमित करने की शक्ति देता है, लेकिन यह विनियमन तार्किक और व्यवहार्य होना चाहिए।
अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्व): यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि राज्य अपने लोगों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाने तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में से एक मानेगा। इस प्रकार, EHS और आरोग्यश्री जैसी योजनाएं इस संवैधानिक अधिदेश को पूरा करने का सरकारी प्रयास हैं।
सातवीं अनुसूची (स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय): भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता; अस्पताल और औषधालय’ राज्य सूची (प्रविष्टि 6) का विषय हैं। इसलिए, स्वास्थ्य योजनाओं का निर्माण, वित्तीय प्रबंधन और कार्यान्वयन पूरी तरह से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह विवाद दर्शाता है कि कैसे राज्यों को अपनी सीमित वित्तीय क्षमताओं के भीतर स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने की बड़ी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, जिससे संघवाद और नीतिगत विविधता के आयाम भी प्रभावित होते हैं।
5. आर्थिक एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति संयोजन (Economic & Public Health Policy Connection)
यह विवाद केवल तेलंगाना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के संपूर्ण स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के समष्टि-आर्थिक (Macroeconomic) मुद्दों और बाजार विफलताओं को दर्शाता है।
स्वास्थ्य सेवा बाजार में एकक्रेताधिकार (Monopsony in Healthcare Market): जब सरकार आरोग्यश्री और EHS जैसी बड़ी योजनाओं के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सबसे बड़ी खरीदार (Sole Buyer या Monopsony) बन जाती है, तो उसके पास दरों को दबाने की अत्यधिक शक्ति आ जाती है। यदि सरकार इस शक्ति का उपयोग करके दरों को निजी प्रदाताओं की औसत लागत (Average Cost) से नीचे ले जाती है, तो यह बाजार की विफलता का कारण बनता है। इसके परिणामस्वरूप निजी अस्पताल योजनाओं से बाहर (Exit) होने लगते हैं, जिससे अंततः आपूर्ति पक्ष (Supply Side) संकुचित हो जाता है और मरीजों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता घट जाती है।
आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE) का चक्र: भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 48% हिस्सा अभी भी लोगों को अपनी जेब से (Out-of-Pocket) खर्च करना पड़ता है। यह खर्च निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों को ऋण जाल और गरीबी में धकेलने का एक प्रमुख कारण है। EHS जैसी योजनाएं इस आर्थिक झटके को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। लेकिन जब निजी अस्पताल ऐसी योजनाओं से हाथ खींच लेते हैं, तो लाभार्थियों का ‘आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय’ तत्काल बढ़ जाता है, जिससे उनकी घरेलू बचत समाप्त हो जाती है और अर्थव्यवस्था में कुल उपभोक्ता मांग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पर्यावरणीय और जूनोटिक (Zoonoses) संकटों से जुड़ाव: एक मजबूत और एकीकृत सार्वजनिक-निजी स्वास्थ्य नेटवर्क केवल सामान्य दिनों में ही नहीं, बल्कि महामारी (जैसे कोविड-19, बर्ड फ्लू, डेंगू या अन्य जूनोटिक रोग) और जलवायु परिवर्तन से जनित स्वास्थ्य संकटों के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया के लिए भी आवश्यक होता है। यदि निजी अस्पताल सरकारी योजनाओं से अलग हो जाते हैं, तो किसी भी बड़े जूनोटिक प्रकोप के समय राज्य की समन्वित स्वास्थ्य निगरानी और आपातकालीन उपचार क्षमता गंभीर रूप से पंगु हो जाएगी। निजी क्षेत्र के सहयोग के बिना राज्य अकेले महामारी जनित भारी स्वास्थ्य भार को संभालने में सक्षम नहीं है, जैसा कि कोविड-19 की लहरों के दौरान स्पष्ट रूप से देखा गया था।
6. निष्कर्ष और आगे की राह (Conclusion & Way Forward)
तेलंगाना का यह संकट स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। इस गतिरोध को दूर करने और एक दीर्घकालिक, टिकाऊ समाधान खोजने के लिए निम्नलिखित बहु-आयामी कदम उठाए जाने चाहिए:
स्वतंत्र मूल्य नियामक आयोग का गठन: स्वास्थ्य सेवाओं की दरों का निर्धारण एक स्वतंत्र नियामक संस्था (जैसे ट्राई या डीईआरसी की तर्ज पर) द्वारा किया जाना चाहिए। यह संस्था विभिन्न श्रेणियों के अस्पतालों (जैसे टीयर-1, टीयर-2 और टीयर-3 शहरों के अस्पताल) की वास्तविक परिचालन लागत, मुद्रास्फीति और भौगोलिक परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन करके पारदर्शी टैरिफ निर्धारित करे।
दावों के निपटान के लिए समयबद्ध गारंटी और एस्क्रो खाता: भुगतान में देरी की समस्या को समाप्त करने के लिए सरकार को एक समर्पित ‘एस्क्रो खाता’ (Escrow Account) स्थापित करना चाहिए। इसके तहत नियमों में यह प्रावधान होना चाहिए कि यदि दावों की स्वीकृति के 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो राज्य सरकार को निजी अस्पतालों को निर्धारित दर पर ब्याज देना होगा। इससे प्रशासनिक जवाबदेही तय होगी।
सह-भुगतान (Co-payment) विकल्प की खोज: सरकार उच्च वेतनमान वाले कर्मचारियों के लिए एक आंशिक सह-भुगतान (Co-payment) मॉडल पेश कर सकती है। इसमें अति-विशिष्ट (Super-specialty) उपचारों के लिए लागत का एक छोटा हिस्सा (जैसे 10-20%) लाभार्थी द्वारा वहन किया जा सकता है, जिससे राज्य के खजाने पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ कम होगा और निजी अस्पतालों को भी उनकी उचित दरें मिल सकेंगी।
सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना: दीर्घकालिक समाधान यह है कि सरकार निजी क्षेत्र पर अपनी निर्भरता को कम करे। इसके लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के लक्ष्य के अनुरूप स्वास्थ्य बजट को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाना होगा और जिला स्तर पर सरकारी अस्पतालों के बुनियादी ढांचे व विशिष्ट चिकित्सा सुविधाओं को अपग्रेड करना होगा।
7. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Prelims MCQ)
प्रश्न: भारत में स्वास्थ्य नीति, संवैधानिक प्रावधानों और संबंधित योजनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल’ समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आते हैं।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के एक हिस्से के रूप में स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है।
3. केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) देश के सभी नागरिकों के लिए एक स्वैच्छिक सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3
उत्तर: B) केवल 2
स्पष्टीकरण:
– कथन 1 गलत है: ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता; अस्पताल और औषधालय’ भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 6 का विषय हैं, न कि समवर्ती सूची का।
– कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996)’ के ऐतिहासिक मामले में यह स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किए गए जीवन के अधिकार में स्वास्थ्य का अधिकार और समय पर चिकित्सा उपचार प्राप्त करने का अधिकार शामिल है।
– कथन 3 गलत है: केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) सभी नागरिकों के लिए नहीं है, बल्कि यह केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनभोगियों, सांसदों, पूर्व सांसदों और उनके आश्रितों जैसे विशिष्ट लाभार्थियों के लिए एक स्वास्थ्य सेवा योजना है। आम नागरिकों के लिए केंद्र सरकार की प्रमुख योजना ‘आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ (PM-JAY) है। अतः केवल कथन 2 सही है।
8. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)
प्रश्न: “भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) प्राप्त करने में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल एक महत्वपूर्ण उपकरण रहा है, लेकिन हाल के नीतिगत गतिरोध निजी मुनाफे और सार्वजनिक कल्याण के बीच बढ़ते अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हैं।” तेलंगाना के कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (EHS) विवाद के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
उत्तर के मॉडल बिंदु (Model Answer Points):
भूमिका (Introduction):
– उत्तर की शुरुआत हाल ही में तेलंगाना आरोग्यश्री नेटवर्क अस्पतालों द्वारा EHS की संशोधित दरों के विरोध में योजना से बाहर होने की दी गई चेतावनी के संदर्भ से करें।
– यह स्पष्ट करें कि कैसे भारत में सीमित सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट (जीडीपी का लगभग 2.1%) के कारण माध्यमिक और तृतीयक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति के लिए निजी क्षेत्र पर राज्य की निर्भरता अत्यधिक बढ़ गई है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में PPP मॉडल की आवश्यकता और भूमिका:
– अवसंरचना की कमी को पाटना: सरकारी अस्पतालों पर अत्यधिक भार और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की कमी के कारण, निजी अस्पतालों का नेटवर्क गंभीर बीमारियों (कैंसर, हृदय रोग, न्यूरोलॉजी) के त्वरित इलाज में मदद करता है।
– वित्तीय सुरक्षा: आयुष्मान भारत, आरोग्यश्री और EHS जैसी योजनाएं गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को ‘आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय’ (OOPE) के कारण ऋण के कुचक्र में फंसने से बचाती हैं।
– सेवा की गुणवत्ता: निजी प्रदाताओं के माध्यम से मरीजों को बेहतर तकनीक और त्वरित चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होती हैं।
विवाद के मुख्य कारण और अंतर्निहित संघर्ष (निजी लाभ बनाम सार्वजनिक कल्याण):
– लागत और टैरिफ का विवाद: सरकार लागत को न्यूनतम रखकर अधिकतम कल्याण करना चाहती है (सार्वजनिक कल्याण), जबकि निजी अस्पताल बढ़ती मुद्रास्फीति, कर्मचारियों के वेतन और चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव की उच्च परिचालन लागत के कारण अधिक दरों की मांग करते हैं (व्यावसायिक व्यवहार्यता)।
– एकतरफा मूल्य निर्धारण: सरकारों द्वारा बिना वैज्ञानिक इनपुट और स्थानीय आर्थिक वास्तविकताओं को समझे एकतरफा CGHS जैसी दरों को लागू करने से निजी प्रदाताओं में असंतोष उत्पन्न होता है।
– भुगतान चक्र में अत्यधिक देरी: नौकरशाही की लालफीताशाही के कारण दावों के निपटान में महीनों की देरी होती है, जिससे अस्पतालों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) समाप्त हो जाती है और वे सेवाएं बंद करने पर मजबूर हो जाते हैं।
– गुणवत्ता से समझौता: अत्यधिक कम पैकेज दरों के कारण निजी अस्पतालों में घटिया चिकित्सा सामग्री के उपयोग या योग्य स्टाफ की कमी का जोखिम बढ़ जाता है, जो मरीज की सुरक्षा को खतरे में डालता है।
सुधारात्मक उपाय और आगे की राह (Way Forward):
– स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण: ट्राई (TRAI) या डीईआरसी (DERC) की तर्ज पर स्वास्थ्य दरों के नियमन के लिए एक स्वतंत्र ‘स्वास्थ्य सेवा मूल्य निर्धारण नियामक’ की स्थापना की जाए।
– समयबद्ध दावा निपटान: ‘एस्क्रो खाता’ प्रणाली के माध्यम से 30 दिनों के भीतर स्वचालित भुगतान और देरी होने पर ब्याज का प्रावधान किया जाए।
– सह-भुगतान मॉडल (Co-payment Model): उच्च आय वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए आंशिक अंशदान का मॉडल अपनाया जा सकता है।
– सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में सुदृढ़ीकरण: दीर्घकालिक समाधान यही है कि राज्य स्वयं सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों को विश्वस्तरीय बनाए ताकि निजी क्षेत्र पर निर्भरता कम हो।
निष्कर्ष (Conclusion):
– निष्कर्षतः, भारत में स्वास्थ्य सेवा का लोक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि यह दोनों पक्षों के लिए पारस्परिक रूप से व्यवहार्य न हो। सरकार को निजी क्षेत्र को एक व्यावसायिक भागीदार के रूप में स्वीकार करते हुए तार्किक दरें देनी होंगी, और निजी क्षेत्र को भी सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता देनी होगी। तभी हम सतत विकास लक्ष्य (SDG-3: अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण) और अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त स्वास्थ्य के अधिकार की वास्तविक प्राप्ति सुनिश्चित कर सकते हैं।
यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।
