1. प्रस्तावना एवं वर्तमान संदर्भ (Introduction & Current Context)

भारत में प्रशासनिक और नीतिगत सुधारों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, तमिलनाडु राज्य में आगामी राष्ट्रीय जनगणना के लिए ‘स्व-गणना’ (Self-Enumeration) की प्रक्रिया 17 जुलाई से शुरू होने जा रही है। डिजिटल इंडिया पहल और प्रशासनिक सुगमता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई यह प्रक्रिया नागरिकों को अपनी जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक जानकारी स्वयं ऑनलाइन दर्ज करने की सुविधा प्रदान करती है। इस पहल के तहत, जो भी नागरिक स्व-गणना की प्रक्रिया को ऑनलाइन माध्यम से पूरा करेंगे, उन्हें एक विशिष्ट स्व-गणना संदर्भ पहचान संख्या (Unique Self-Enumeration ID) प्राप्त होगी। इसके बाद, जब 1 अगस्त से जनगणना प्रगणक (Enumerators) गृह सूचीकरण (House Listing) और आवास जनगणना के चरण के लिए घर-घर जाएंगे, तो संबंधित नागरिकों को केवल अपनी यह विशिष्ट आईडी उनके साथ साझा करनी होगी। प्रगणक इस आईडी को अपने मोबाइल या टैबलेट डिवाइस पर सत्यापित करेंगे, जिससे भौतिक रूप से लंबे प्रश्नावली प्रपत्रों को भरने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। यह पहल न केवल समय की बचत करेगी, बल्कि डेटा प्रविष्टि में होने वाली त्रुटियों को भी न्यूनतम करेगी।

2. पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)

यह विषय संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे TNPSC, MPSC, UPPSC) की परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे निम्नलिखित शीर्षकों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है:

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (GS Paper II): शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय और ई-गवर्नेंस (e-Governance) के अनुप्रयोग। इसके अतिरिक्त, केंद्र-राज्य संबंध और संघीय ढांचा, क्योंकि जनगणना संघ सूची का विषय है, लेकिन इसका निष्पादन राज्य के प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से किया जाता है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (GS Paper III): भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित मुद्दे। जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का इष्टतम उपयोग और समावेशी विकास के लिए नीति निर्माण।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं विकास (Historical Background & Evolution of Census)

भारत में जनगणना का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। प्राचीन काल में, कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ और मुगल काल के ‘आईन-ए-अकबरी’ में जनसंख्या और आर्थिक आंकड़ों के संग्रह के प्रमाण मिलते हैं। आधुनिक काल में, भारत की पहली गैर-समकालिक (Non-synchronous) जनगणना वर्ष 1872 में लॉर्ड मेयो (Lord Mayo) के कार्यकाल में आयोजित की गई थी। इसके पश्चात, वर्ष 1881 में लॉर्ड रिपन (Lord Ripon) के कार्यकाल में पहली बार संपूर्ण देश में एक साथ समकालिक (Synchronous) जनगणना का आयोजन किया गया, जिसके बाद से प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर नियमित रूप से जनगणना की जा रही है। स्वतंत्रता के बाद, वर्ष 1951 की जनगणना स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना थी। वर्तमान में आयोजित होने वाली जनगणना देश की 16वीं और डिजिटल प्रारूप में होने वाली पहली जनगणना होगी, जिसमें स्व-गणना का यह नवीन विकल्प जोड़ा गया है।

4. मुख्य बिंदु, अवसर और संरचनात्मक मुद्दे (Key Highlights, Opportunities & Structural Issues)

स्व-गणना की इस प्रक्रिया के विभिन्न आयाम निम्नलिखित हैं:

अ) प्रशासनिक दक्षता और संसाधन अनुकूलन:

पारंपरिक रूप से, जनगणना के लिए लाखों प्रगणकों को प्रशिक्षित करना, भारी मात्रा में कागजी प्रपत्रों का मुद्रण और उनका भौतिक वितरण करना एक विशाल और खर्चीली प्रक्रिया थी। स्व-गणना के माध्यम से सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ काफी कम होगा। इसके अतिरिक्त, डेटा को भौतिक कागजों से कंप्यूटर पर फीड करने में लगने वाले महीनों का समय बचेगा, जिससे जनगणना के अनंतिम और अंतिम आंकड़े बहुत जल्दी सार्वजनिक किए जा सकेंगे।

ब) डेटा सटीकता और मानवीय त्रुटियों में कमी:

जब प्रगणक किसी परिवार से मौखिक रूप से प्रश्न पूछते हैं, तो भाषा की समझ, उच्चारण या जल्दबाजी के कारण गलत डेटा दर्ज होने की संभावना रहती है। स्व-गणना के तहत, नागरिक शांत वातावरण में स्वयं अपनी सटीक जानकारी दर्ज कर सकते हैं, जिससे डेटा की विश्वसनीयता और गुणवत्ता में सुधार होगा।

स) डिजिटल विभाजन (Digital Divide) की चुनौती:

तमिलनाडु भले ही भारत के तकनीकी रूप से उन्नत राज्यों में से एक है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सीमित गति, स्मार्टफोन की कमी और डिजिटल साक्षरता का निम्न स्तर एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यह आशंका बनी रहती है कि इस सुविधा का लाभ केवल शहरी और शिक्षित वर्ग तक ही सीमित न रह जाए, जिससे सामाजिक प्रतिनिधित्व का असंतुलन पैदा हो सकता है।

द) डेटा सुरक्षा और निजता की चिंताएं:

आज के डिजिटल युग में डेटा ही नया तेल है। नागरिकों द्वारा अपनी जाति, धर्म, आय, संपत्ति और पारिवारिक स्थिति जैसे संवेदनशील आंकड़े ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करते समय सुरक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण चिंता है। किसी भी संभावित डेटा उल्लंघन (Data Breach) या साइबर हमले से नागरिकों की निजता का उल्लंघन हो सकता है। सरकार को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के कड़े प्रावधानों के अनुरूप इस डेटाबेस को सुरक्षित रखना होगा।

5. संवैधानिक एवं कानूनी ढांचा (Constitutional & Legal Framework)

भारत में जनगणना की वैधानिक और संवैधानिक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ है:

अ) संवैधानिक प्रावधान (Article 246 & 7th Schedule):

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत, जनगणना संघ का विषय है। यह संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) की सूची-I (संघ सूची) की प्रविष्टि संख्या 69 (Entry 69) के अंतर्गत आती है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि केवल भारत की संसद को ही जनगणना के विषय पर कानून बनाने का अधिकार है, और राज्य सरकारें केंद्र के निर्देशों के अधीन इसे लागू करने में सहयोग करती हैं।

ब) जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948):

यह अधिनियम जनगणना के संचालन के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इस कानून के तहत नियुक्त किए गए जनगणना अधिकारियों को प्रत्येक नागरिक से जानकारी मांगने का कानूनी अधिकार प्राप्त है, और नागरिकों के लिए सही जानकारी देना अनिवार्य है। इस अधिनियम की धारा 15 सबसे महत्वपूर्ण है, जो एकत्र किए गए आंकड़ों की पूर्ण गोपनीयता की गारंटी देती है। इन आंकड़ों को किसी भी अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है और न ही इनका उपयोग किसी अन्य सरकारी जांच के लिए किया जा सकता है।

स) जनगणना नियम, 1990 में संशोधन (Amendment in Census Rules):

वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने ‘जनगणना नियम, 1990’ में संशोधन किया ताकि डिजिटल उपकरणों और स्व-गणना की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता दी जा सके। इस संशोधन के तहत ‘इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म’ और ‘स्व-गणना’ जैसे शब्दों को कानूनी परिभाषाओं में शामिल किया गया, जिसने वर्तमान में तमिलनाडु जैसे राज्यों में शुरू हो रही इस प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त किया।

6. आर्थिक, जनसांख्यिकीय एवं पर्यावरणीय अंतर्संबंध (Economic, Demographic & Environmental Connection)

तमिलनाडु में स्व-गणना और डिजिटल जनगणना का यह चरण कई अन्य नीतिगत और पर्यावरणीय क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है:

अ) आर्थिक और वित्तीय आवंटन (Economic & Fiscal Devolution):

भारत में वित्त आयोग (Finance Commission) राज्यों के बीच करों के बंटवारे के लिए जनसंख्या को एक प्रमुख आधार मानता है। तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है, जिसके कारण उनकी जनसंख्या वृद्धि दर उत्तरी राज्यों की तुलना में कम रही है। ऐसे में, यदि 2011 या आगामी जनगणना के नवीनतम आंकड़ों का उपयोग बिना किसी सुरक्षा उपाय के किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों को वित्तीय नुकसान होने की आशंका रहती है। सटीक जनगणना डेटा यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि विकासशील और जनसांख्यिकीय संक्रमण से गुजर रहे राज्यों को उनके योगदान के लिए पुरस्कृत किया जाए और उनके संसाधनों में कटौती न हो।

ब) पर्यावरणीय स्थिरता और शहरी नियोजन (Environmental Stability & Urban Planning):

तमिलनाडु भारत के सर्वाधिक शहरीकृत राज्यों में से एक है। तीव्र शहरीकरण के कारण चेन्नई, कोयंबटूर और मदुरै जैसे शहरों पर जल संसाधनों, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और वायु गुणवत्ता को लेकर अत्यधिक पर्यावरणीय दबाव है। स्व-गणना के दौरान पेयजल की उपलब्धता, शौचालय की स्थिति, और उपयोग किए जाने वाले ईंधन (जैसे एलपीजी बनाम पारंपरिक चूल्हा) से संबंधित आंकड़े सीधे एकत्र होंगे। यह पर्यावरण नीतियों, जैसे कि ‘उज्ज्वला योजना’ के प्रभाव का आकलन करने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए हरित ऊर्जा योजनाओं को डिजाइन करने में मदद करेगा।

स) सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी विज्ञान (Public Health & Epidemic Resilience):

कोविड-19 जैसी महामारियों ने यह साबित कर दिया है कि किसी क्षेत्र की जनसंख्या घनत्व और जनसांख्यिकीय बनावट (जैसे बुजुर्गों और बच्चों की संख्या) का स्वास्थ्य प्रबंधन पर सीधा असर पड़ता है। सटीक डिजिटल डेटा होने से सरकारें स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे (जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल बेड और एम्बुलेंस सेवाएं) को अधिक आवश्यकता वाले क्षेत्रों में तुरंत तैनात कर सकती हैं।

7. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Prelims MCQ)

प्रश्न: भारत में जनगणना (Census) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. भारत में जनगणना का दायित्व भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत समवर्ती सूची (Concurrent List) में शामिल है।

2. भारत की पहली समकालिक (Synchronous) जनगणना वर्ष 1881 में लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में आयोजित की गई थी।

3. जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत एकत्र किए गए व्यक्तिगत डेटा को किसी भी सिविल न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2

B) केवल 2 और 3

C) केवल 1 और 3

D) 1, 2 और 3

उत्तर: B

स्पष्टीकरण:

कथन 1 गलत है, क्योंकि जनगणना भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत संघ सूची (Union List) की प्रविष्टि 69 का हिस्सा है, न कि समवर्ती सूची का।

कथन 2 सही है, भारत में प्रथम नियमित और समकालिक जनगणना 1881 में लॉर्ड रिपन के समय शुरू की गई थी, जबकि पहली गैर-समकालिक जनगणना 1872 में लॉर्ड मेयो के काल में हुई थी।

कथन 3 सही है, जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 के अनुसार, व्यक्तिगत जनगणना रिकॉर्ड पूरी तरह से गोपनीय होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति नहीं होती है।

अतः सही विकल्प B है।

8. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)

प्रश्न: “डिजिटल जनगणना और स्व-गणना (Self-Enumeration) की दिशा में कदम बढ़ाना प्रशासनिक सुधार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, लेकिन यह भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में गंभीर नीतिगत और सुरक्षात्मक चुनौतियां भी प्रस्तुत करता है।” चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

मॉडल उत्तर हेतु मुख्य बिंदु (Model Answer Outline):

भूमिका:

तमिलनाडु में 17 जुलाई से शुरू हो रही स्व-गणना (Self-Enumeration) प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत करें। यह स्पष्ट करें कि कैसे यह कदम भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना का आधार तैयार कर रहा है।

स्व-गणना के प्रमुख लाभ:

1. दक्षता और गति: डेटा के संग्रह और उसके प्रसंस्करण की समय सीमा में भारी कमी आएगी।

2. लागत प्रभावशीलता: मुद्रण, परिवहन और प्रगणकों के भौतिक श्रम की लागत में भारी बचत होगी।

3. डेटा की शुद्धता: स्वयं नागरिकों द्वारा डेटा भरने से प्रगणकों की ओर से होने वाली गलतियाँ समाप्त हो जाएंगी।

4. ई-गवर्नेंस को बढ़ावा: यह नागरिकों को डिजिटल साक्षरता की ओर प्रेरित करेगा और सरकारी डेटाबेस के सुरक्षित एकीकरण में मदद करेगा।

प्रमुख चुनौतियां:

1. डिजिटल विभाजन: ग्रामीण और हाशिए पर खड़े समुदायों में इंटरनेट और साक्षरता की कमी के कारण इस प्रक्रिया से बाहर होने (Exclusion) का खतरा।

2. डेटा सुरक्षा और निजता: केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस होने के कारण साइबर हमलों और डेटा लीक होने का भय।

3. नागरिकों का विश्वास: एनपीआर (NPR) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसी अन्य पहचान पहलों के साथ इसके संभावित जुड़ाव को लेकर नागरिकों में संशय और अविश्वास।

4. तकनीकी त्रुटियाँ: सर्वर पर लोड बढ़ने से पोर्टल का धीमा होना या क्रैश होना और स्थानीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली की अस्पष्टता।

आगे की राह (Way Forward):

1. हाइब्रिड दृष्टिकोण: स्व-गणना के साथ-साथ प्रगणक-आधारित भौतिक जनगणना की प्रणाली को पूरक के रूप में जारी रखना आवश्यक है ताकि कोई भी नागरिक छूटने न पाए।

2. जागरूकता अभियान: स्थानीय भाषाओं में व्यापक प्रचार-प्रसार करना और नागरिकों को आश्वस्त करना कि उनका डेटा कानूनी रूप से सुरक्षित और पूरी तरह से गोपनीय है।

3. सुरक्षा उपाय: डीपीडीपी अधिनियम, 2023 के तहत डेटा प्रबंधन के उच्चतम मानकों को लागू करना।

4. प्रशिक्षण: प्रगणकों को तकनीकी रूप से कुशल बनाना ताकि वे विशिष्ट स्व-गणना आईडी का सुगमता से सत्यापन कर सकें।

निष्कर्ष:

डिजिटल जनगणना और स्व-गणना का निर्णय ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। डिजिटल अंतराल को पाटकर और डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करके भारत एक समावेशी और पारदर्शी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली स्थापित कर सकता है।


यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।

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