Census: Self-enumeration process in Tamil Nadu to commence on July 17 (July 17, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण

1. प्रस्तावना एवं वर्तमान संदर्भ (Introduction & Current Context)

अगर आप सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो आपको भारतीय प्रशासन में होने वाले इस बड़े बदलाव को बारीकी से समझना होगा। तमिलनाडु सरकार आगामी राष्ट्रीय जनगणना के लिए 17 जुलाई से ‘स्व-गणना’ (Self-Enumeration) की प्रक्रिया शुरू करने जा रही है। डिजिटल इंडिया की दिशा में उठाया गया यह कदम पुरानी और धीमी प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल देगा।

यह नई व्यवस्था बहुत सरल है। इसे आप हवाई यात्रा से पहले किए जाने वाले ‘वेब चेक-इन’ की तरह समझ सकते हैं। आप हवाई अड्डे जाने से पहले ही अपनी जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज कर देते हैं और वहां पहुंचकर सिर्फ बोर्डिंग पास दिखाते हैं। ठीक इसी तरह, अब आप अपनी जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक जानकारी खुद ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज कर सकते हैं। डेटा सबमिट करते ही आपको एक विशिष्ट स्व-गणना संदर्भ पहचान संख्या (Unique Self-Enumeration ID) मिल जाएगी।

जब 1 अगस्त से जनगणना प्रगणक (Enumerators) आपके घर-घर आकर गृह सूचीकरण (House Listing) और आवास जनगणना करेंगे, तब आपको लंबे कागजी फॉर्म भरने की जरूरत नहीं होगी। आपको केवल अपनी यह यूनिक आईडी प्रगणक के साथ साझा करनी होगी। वे अपने टैबलेट या मोबाइल पर इसे सत्यापित करेंगे और काम पूरा हो जाएगा। इससे समय बचेगा और डेटा प्रविष्टि के दौरान होने वाली मानवीय गलतियां भी लगभग समाप्त हो जाएंगी।

2. पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)

मुख्य परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लिए आपको इस विषय को अपने पाठ्यक्रम के अलग-अलग हिस्सों से जोड़ना आना चाहिए। नीचे दी गई तालिका से आप इसे आसानी से समझ सकते हैं:

परीक्षा का चरण / प्रश्नपत्र प्रासंगिक विषय एवं क्षेत्र
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (GS Paper II)
  • शासन व्यवस्था और ई-गवर्नेंस (e-Governance) के अनुप्रयोग
  • संघीय ढांचा और केंद्र-राज्य संबंध (जनगणना संघ सूची का विषय है, लेकिन इसे राज्य का प्रशासनिक तंत्र पूरा करता है)
  • सामाजिक न्याय और जन कल्याणकारी नीतियां
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (GS Paper III)
  • भारतीय अर्थव्यवस्था, नियोजन और संसाधनों को जुटाना
  • जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का कुशल उपयोग
  • समावेशी विकास के लिए सटीक नीति निर्माण

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं विकास (Historical Background & Evolution of Census)

जनगणना का सफरनामा काफी पुराना और दिलचस्प है। अगर आप इतिहास के पन्नों को पलटेंगे, तो पाएंगे कि शासकों को हमेशा से अपनी जनता की गिनती रखने की जरूरत महसूस हुई है। मौर्य काल में कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में और मुगल काल में अबुल फजल ने ‘आईन-ए-अकबरी’ में आबादी और आर्थिक आंकड़ों को जुटाने की व्यवस्था का जिक्र किया था।

आधुनिक भारत में जनगणना के विकासक्रम को आप तीन मुख्य पड़ावों से समझ सकते हैं:

  • 1872 की पहली कोशिश (लॉर्ड मेयो): इस दौरान भारत की पहली गैर-समकालिक (Non-synchronous) जनगणना हुई। यह पूरे देश में एक साथ नहीं कराई गई थी।
  • 1881 का मील का पत्थर (लॉर्ड रिपन): लॉर्ड रिपन ने पहली बार पूरे देश में एक साथ समकालिक (Synchronous) जनगणना आयोजित कराई। इसी के बाद से हर 10 साल में नियमित रूप से जनगणना करने का सिलसिला शुरू हुआ।
  • स्वतंत्रता के बाद का सफर (1951 से आज तक): साल 1951 में आजाद भारत की पहली जनगणना हुई। अब होने वाली यह जनगणना देश की 16वीं जनगणना है। यह पहली बार पूरी तरह से डिजिटल प्रारूप में होगी, जिसमें स्व-गणना का यह नया विकल्प जोड़ा गया है।

4. मुख्य बिंदु, अवसर और संरचनात्मक मुद्दे (Key Highlights, Opportunities & Structural Issues)

डिजिटल स्व-गणना की इस नई पहल को समझने के लिए हमें इसके फायदे और इसके सामने खड़ी चुनौतियों, दोनों का गहराई से विश्लेषण करना होगा:

अ) प्रशासनिक दक्षता और संसाधनों की बचत

पारंपरिक रूप से जनगणना कराना एक बेहद खर्चीली और जटिल प्रक्रिया रही है। टनों कागजी फॉर्म छपवाना, उन्हें देश भर में बांटना और लाखों प्रगणकों को प्रशिक्षित करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। इसे आप किसी बड़ी ऑफलाइन परीक्षा के आयोजन की तरह समझ सकते हैं, जहां पेपर छापने और बांटने में भारी संसाधन लगते हैं। स्व-गणना इस प्रशासनिक बोझ को काफी हद तक हल्का कर देगी। अब सरकारी खजाने पर वित्तीय भार कम होगा और डेटा को कागजों से कंप्यूटर पर टाइप करने में जो महीनों का समय बर्बाद होता था, वह बचेगा। नतीजे बेहद तेजी से सामने आएंगे।

ब) डेटा सटीकता: मानवीय भूलों का अंत

अक्सर जब प्रगणक घर-घर जाकर सवाल पूछते हैं, तो जल्दबाजी, शोर-शराबे या भाषा के स्थानीय लहजे के कारण गलत डेटा दर्ज हो जाता है। स्व-गणना आपको यह मौका देती है कि आप अपने घर के शांत माहौल में बैठकर, खुद अपनी सटीक जानकारी दर्ज करें। इससे आंकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता दोनों में सुधार होगा।

स) डिजिटल विभाजन (Digital Divide) की बड़ी दीवार

अब बात करते हैं चुनौतियों की। हालांकि तमिलनाडु एक तकनीकी रूप से उन्नत राज्य है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की धीमी रफ्तार, स्मार्टफोन की कमी और डिजिटल साक्षरता का निम्न स्तर अभी भी एक कड़वी सच्चाई है। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि एक ही दौड़ में किसी धावक को स्पोर्ट्स कार दे दी जाए और किसी को नंगे पैर दौड़ने के लिए छोड़ दिया जाए। खतरा यह है कि स्व-गणना का लाभ केवल शहरी और पढ़े-लिखे लोगों तक ही सीमित न रह जाए। अगर ऐसा हुआ, तो वंचित और ग्रामीण आबादी का प्रतिनिधित्व डेटा में कम हो सकता है।

द) डेटा सुरक्षा और निजता की चुनौती

आज के दौर में ‘डेटा ही नया तेल’ (Data is the new oil) है। जब कोई नागरिक अपनी जाति, धर्म, आय और संपत्ति जैसी संवेदनशील जानकारियां ऑनलाइन दर्ज करता है, तो सुरक्षा सर्वोपरि हो जाती है। यह जानकारी आपकी निजी संपत्ति है। यदि कोई साइबर हमला या डेटा लीक (Data Breach) होता है, तो नागरिकों की निजता दांव पर लग जाएगी। सरकार को इस डिजिटल डेटाबेस को एक अभेद्य तिजोरी की तरह सुरक्षित रखना होगा, जिसके लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।

5. संवैधानिक एवं कानूनी ढांचा (Constitutional & Legal Framework)

एक सिविल सेवा अभ्यर्थी के रूप में, आपको जनगणना के संवैधानिक और कानूनी आधारों की गहरी समझ होनी चाहिए। भारत में इस प्रक्रिया को बहुत मजबूत कानूनी कवच मिला हुआ है:

अ) संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 246 और 7वीं अनुसूची)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 246 जनगणना को संघ सूची का विषय बनाता है। यह संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) की संघ सूची (सूची-I) की प्रविष्टि संख्या 69 (Entry 69) के अंतर्गत आती है। इसका सीधा मतलब यह है कि केवल भारत की संसद को ही जनगणना पर कानून बनाने का अधिकार है। राज्य सरकारें केंद्र के दिशा-निर्देशों के तहत इसे जमीन पर उतारने में प्रशासनिक सहयोग देती हैं।

ब) जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948)

यह कानून पूरी जनगणना प्रक्रिया की रीढ़ है। यह कानून प्रगणकों को नागरिकों से जानकारी मांगने का कानूनी अधिकार देता है, और नागरिकों के लिए सही जानकारी देना अनिवार्य बनाता है। इस अधिनियम की धारा 15 सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे आपको अपने उत्तरों में जरूर लिखना चाहिए। यह धारा नागरिकों के व्यक्तिगत आंकड़ों की पूर्ण गोपनीयता सुनिश्चित करती है। इन आंकड़ों को किसी भी अदालत में सबूत (Evidence) के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और न ही किसी दूसरी सरकारी जांच के लिए साझा किया जा सकता है।

स) जनगणना नियम, 1990 में संशोधन

बदलते डिजिटल युग के साथ तालमेल बिठाने के लिए, केंद्र सरकार ने साल 2022 में जनगणना नियम, 1990 में बदलाव किए। सरकार ने इस संशोधन के जरिए ‘इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म’ और ‘स्व-गणना’ जैसे डिजिटल विकल्पों को कानूनी मान्यता दी। इसी संशोधन ने आज तमिलनाडु में शुरू हो रही ऑनलाइन जनगणना का रास्ता साफ किया है।

6. आर्थिक, जनसांख्यिकीय एवं पर्यावरणीय अंतर्संबंध (Economic, Demographic & Environmental Connection)

तमिलनाडु में शुरू हो रही यह डिजिटल जनगणना केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। इसका सीधा संबंध आपके जीवन, पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था से है। आइए इस अंतर्संबंध को विस्तार से समझते हैं:

अ) आर्थिक और वित्तीय आवंटन (आसान शब्दों में समझें)

इस पूरे मुद्दे को आप एक पारिवारिक बजट के उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए, एक भाई परिवार की भलाई के लिए समझदारी दिखाता है और अपने संसाधनों को नियंत्रित रखता है। लेकिन जब घर का मुखिया बजट बांटता है, तो वह उस भाई को केवल इसलिए कम हिस्सा देता है क्योंकि उसके बच्चे कम हैं और उसकी जरूरतें सीमित हैं। यह उस भाई के लिए नाइंसाफी होगी।

राज्यों के साथ भी यही हो रहा है। भारत का वित्त आयोग (Finance Commission) करों के बंटवारे के लिए जनसंख्या को एक बड़ा पैमाना मानता है। तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी कार्यक्रमों को पूरी निष्ठा से लागू किया, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम रही। यदि बिना किसी सुरक्षात्मक नियम के आगामी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर करों का बंटवारा किया गया, तो दक्षिणी राज्यों को भारी वित्तीय नुकसान होगा। सटीक डेटा यह तय करेगा कि जनसंख्या नियंत्रित करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए, न कि उन्हें नुकसान पहुंचाया जाए।

ब) पर्यावरणीय स्थिरता और शहरी नियोजन

तमिलनाडु देश के सबसे तेजी से बढ़ते शहरीकृत राज्यों में से एक है। इस तीव्र शहरीकरण ने चेन्नई, मदुरै और कोयंबटूर जैसे महानगरों के संसाधनों पर भारी बोझ डाल दिया है। पानी की किल्लत और कचरा निपटान आज की बड़ी चुनौतियां हैं। स्व-गणना के जरिए नागरिकों से सीधे पेयजल की उपलब्धता, शौचालय की स्थिति और रसोई ईंधन (जैसे एलपीजी बनाम पारंपरिक चूल्हा) से जुड़े आंकड़े मिलेंगे। यह डेटा ‘उज्ज्वला योजना’ जैसी नीतियों के वास्तविक प्रभाव को जानने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने वाली नई योजनाओं को तैयार करने में मददगार साबित होगा।

स) सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी विज्ञान (Epidemic Resilience)

कोविड-19 जैसी महामारियों ने हमें सिखाया कि किस क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व और वहां बुजुर्गों व बच्चों की संख्या का सटीक पता होना स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए कितना जरूरी है। वास्तविक समय (Real-time) का डिजिटल डेटा सरकारों को यह बताएगा कि किस इलाके में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल बेड या एम्बुलेंस सेवाओं की तत्काल आवश्यकता है।

7. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Prelims MCQ)

अपनी प्रारंभिक परीक्षा की तैयारी को परखने के लिए नीचे दिए गए प्रश्न को हल करने का प्रयास करें:

प्रश्न: भारत में जनगणना (Census) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत में जनगणना का दायित्व भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत समवर्ती सूची (Concurrent List) में शामिल है।
  2. भारत की पहली समकालिक (Synchronous) जनगणना वर्ष 1881 में लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में आयोजित की गई थी।
  3. जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत एकत्र किए गए व्यक्तिगत डेटा को किसी भी सिविल न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 and 3
D) 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

विस्तृत स्पष्टीकरण (Detailed Explanation):

  • कथन 1 गलत है: संविधान निर्माता जानते थे कि जनगणना राष्ट्रीय स्तर पर एक समान होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने इसे भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत संघ सूची (Union List) की प्रविष्टि 69 का हिस्सा बनाया, न कि समवर्ती सूची का। इस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है।
  • कथन 2 सही है: भारत में प्रथम नियमित और समकालिक जनगणना साल 1881 में लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में शुरू हुई थी। हालांकि पहली गैर-समकालिक जनगणना साल 1872 में लॉर्ड मेयो के समय हुई थी।
  • कथन 3 सही है: डेटा निजता को सुरक्षित रखने के लिए जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 यह स्पष्ट निर्देश देती है कि व्यक्तिगत जनगणना रिकॉर्ड पूरी तरह से गोपनीय रहेंगे। इन्हें किसी भी न्यायालय में साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अतः सही विकल्प B है।

8. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)

मुख्य परीक्षा (Mains) में विश्लेषणात्मक उत्तर लिखने की अपनी कला को निखारने के लिए इस प्रश्न का अभ्यास करें:

प्रश्न: “डिजिटल जनगणना और स्व-गणना (Self-Enumeration) की दिशा में कदम बढ़ाना प्रशासनिक सुधार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, लेकिन यह भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में गंभीर नीतिगत और सुरक्षात्मक चुनौतियां भी प्रस्तुत करता है।” चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

मॉडल उत्तर लिखने के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Model Answer Structure):

प्रभावशाली भूमिका (Introduction):

अपने उत्तर की शुरुआत तमिलनाडु में 17 जुलाई से शुरू हो रही स्व-गणना (Self-Enumeration) प्रक्रिया के व्यावहारिक उदाहरण से करें। यह दर्शाएं कि यह कदम भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना के लिए किस प्रकार आधार तैयार कर रहा है।

स्व-गणना के प्रमुख लाभ (प्रशासनिक सुधार के रूप में):

  • कुशलता और गति: डेटा के संग्रह और उसके अंतिम प्रकाशन की समय सीमा में भारी कमी आएगी।
  • लागत में कमी: कागजी प्रपत्रों की छपाई, उनके परिवहन और प्रगणकों के भौतिक श्रम पर होने वाले भारी खर्चों में बड़ी बचत होगी।
  • डेटा की सटीकता: जब नागरिक स्वयं ऑनलाइन जानकारी भरेंगे, तो प्रगणकों की ओर से होने वाली मानवीय गलतियों (जैसे गलत स्पेलिंग या गलत डेटा प्रविष्टि) की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।
  • ई-गवर्नेंस का प्रसार: यह कदम नागरिकों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देगा और सरकारी डेटाबेस के सुरक्षित एकीकरण का मार्ग प्रशस्त करेगा।

प्रमुख चुनौतियां (गंभीर नीतिगत और सुरक्षात्मक मुद्दे):

  • डिजिटल विभाजन (Digital Divide): ग्रामीण क्षेत्रों और हाशिए पर खड़े समुदायों में इंटरनेट और स्मार्टफोन की कमी है। ऐसे में वे डिजिटल स्व-गणना प्रक्रिया से बाहर (Exclusion) हो सकते हैं।
  • डेटा सुरक्षा और निजता: डिजिटल डेटाबेस पर हमेशा साइबर हमलों और डेटा लीक होने का खतरा मंडराता रहता है।
  • विश्वास की कमी: एनपीआर (NPR) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसी अन्य पहचान पहलों के साथ इसके संभावित जुड़ाव को लेकर कुछ समुदायों में अविश्वास की भावना हो सकती है।
  • तकनीकी बाधाएं: पोर्टल पर सर्वर लोड बढ़ने से साइट का क्रैश होना और स्थानीय भाषाओं में तकनीकी शब्दों की जटिलता भी बाधा बन सकती है।

आगे की राह (Way Forward):

  • हाइब्रिड मॉडल अपनाएं: डिजिटल स्व-गणना के साथ-साथ प्रगणकों द्वारा घर-घर जाकर की जाने वाली पारंपरिक जनगणना भी जारी रखें ताकि कोई भी नागरिक छूटने न पाए।
  • व्यापक जन जागरूकता अभियान: नागरिकों को आश्वस्त करें कि उनका डेटा कानूनन सुरक्षित है। स्थानीय भाषाओं में इसके फायदों का प्रचार करें।
  • डेटा सुरक्षा के कड़े मानक: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के मानकों को सख्ती से लागू करें।
  • प्रगणकों का प्रशिक्षण: जमीनी स्तर पर काम करने वाले प्रगणकों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाएं ताकि वे डिजिटल आईडी का तेजी से सत्यापन कर सकें।

संतुलित निष्कर्ष (Conclusion):

निष्कर्ष में लिखें कि स्व-गणना और डिजिटल जनगणना का यह कदम ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ (Minimum Government, Maximum Governance) की दिशा में एक प्रगतिशील प्रयास है। डिजिटल खाई को पाटकर और डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करके भारत एक समावेशी, पारदर्शी और आधुनिक शासन प्रणाली की स्थापना कर सकता है।


यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।


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लेखिका के बारे में: भाग्यश्री

भाग्यश्री सिविल सेवा की एक वरिष्ठ मेंटर और शिक्षिका हैं। उन्हें UPSC और MPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन करने का 8 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उन्होंने स्वयं कई बार सिविल सेवा मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण की है और सैकड़ों सफल प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है। वे सामान्य अध्ययन (GS) के जटिल पाठ्यक्रमों और CSAT रणनीतियों को व्यावहारिक एवं परिणाम-उन्मुख अध्ययन संरचना में बदलने में माहिर हैं।

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