प्रस्तावना एवं समसामयिक संदर्भ

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 के पुनर्मूल्यांकन और री-टेस्ट (re-test) परिणामों ने एक बार फिर देश की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली, शैक्षणिक संघवाद, और राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है। हाल ही में घोषित नीट री-टेस्ट 2026 के परिणामों के अनुसार, तमिलनाडु राज्य से कम से कम 12 छात्रों ने 720 में से 690 से अधिक का असाधारण स्कोर प्राप्त किया है। यह डेटा विशेष रूप से इसलिए चर्चा में है क्योंकि तमिलनाडु ऐतिहासिक रूप से नीट परीक्षा का एक मुखर विरोधी रहा है और वहां की राज्य सरकार लगातार इसे सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताती रही है। इसके साथ ही, इस वर्ष नीट परीक्षा में कट-ऑफ (Cut-off) अंकों में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 30 से 35 अंकों की भारी और अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। यह उछाल न केवल परीक्षा के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी स्वरूप को दर्शाता है, बल्कि यह अंकों की तीव्र स्फीति (Marks Inflation), परीक्षा के दौरान होने वाली कथित विसंगतियों, और देश के लाखों छात्रों पर बढ़ते मानसिक व मनोवैज्ञानिक दबाव की ओर भी इशारा करता है। सिविल सेवा परीक्षा के दृष्टिकोण से, यह मुद्दा प्रशासनिक क्षमता, नीतिगत सुधार, केंद्र-राज्य संबंधों, और देश के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से गहराई से जुड़ा हुआ है।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता

यह विषय सिविल सेवा परीक्षा के विभिन्न सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्रों से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित है:

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (GS Paper II): भारतीय संविधान की ऐतिहासिक रूपरेखा, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना; संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढांचे से संबंधित मुद्दे और चुनौतियां; स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय; शासन व्यवस्था और पारदर्शिता।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (GS Paper III): भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास और रोजमर्रा के जीवन में इसके अनुप्रयोग; पर्यावरण और जैव विविधता से संबंधित चुनौतियां व सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा।

मुख्य विशेषताएं और संरचनात्मक चुनौतियां

नीट री-टेस्ट 2026 के परिणाम और कट-ऑफ में आई ऐतिहासिक वृद्धि ने भारतीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा के बुनियादी ढांचे में निहित कई संरचनात्मक मुद्दों को उजागर किया है:

1. अंकों की अतिस्फीति (Marks Inflation) और कट-ऑफ का संकट: इस वर्ष सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ में लगभग 30 से 35 अंकों की अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इसका अर्थ यह है कि जिन छात्रों ने 650 या 660 जैसे बेहतरीन अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें भी अपने पसंदीदा सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पा रहा है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि परीक्षा प्रणाली में या तो प्रश्न पत्र का स्तर बहुत सरल हो गया था, अथवा किसी अन्य स्तर पर विसंगतियों ने अंकों को कृत्रिम रूप से बढ़ा दिया है। इससे परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।

2. व्यावसायिक कोचिंग संस्थानों का एकाधिकार: वर्तमान नीट परीक्षा पूर्णतः बहुविकल्पीय वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (MCQs) पर आधारित है। यह पैटर्न छात्रों में तार्किक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण या व्यावहारिक समझ का परीक्षण करने के स्थान पर कोचिंग संस्थानों द्वारा विकसित ‘रटने और शॉर्टकट तकनीकों’ को बढ़ावा देता है। राजस्थान के कोटा, तमिलनाडु के नमक्कल और केरल के पाला जैसे कोचिंग हब शिक्षा के अत्यधिक व्यावसायीकरण के प्रतीक बन गए हैं। इसके कारण ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्ग के छात्र, जो इन महंगे संस्थानों की फीस वहन नहीं कर सकते, इस दौड़ में स्वाभाविक रूप से पिछड़ जाते हैं।

3. ग्रामीण-शहरी और भाषाई असमानता: तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए.के. राजन समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि नीट के लागू होने के बाद से राज्य के सरकारी स्कूलों के छात्रों, ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों और तमिल माध्यम के विद्यार्थियों का चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश अनुपात चिंताजनक रूप से गिरा है। इसके विपरीत, सीबीएसई (CBSE) पाठ्यक्रम से पढ़े और अंग्रेजी माध्यम वाले शहरी छात्रों का वर्चस्व बढ़ा है। यह स्थिति सामाजिक न्याय और समान अवसर के संवैधानिक आदर्शों के विपरीत है।

4. प्रशासनिक विफलता और परीक्षा की शुचिता का ह्रास: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) द्वारा परीक्षा के सुरक्षित संचालन में लगातार आ रही त्रुटियों—जैसे पेपर लीक की घटनाएं, सॉल्वर गैंग की सक्रियता, और मनमाने ढंग से ग्रेस अंक (Grace Marks) प्रदान करना—ने इसकी विश्वसनीयता को गंभीर रूप से ठेस पहुंचाई है। री-टेस्ट का आयोजन स्वयं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मूल परीक्षा प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं, जिससे देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा की साख धूमिल हुई है।

संवैधानिक एवं कानूनी आयामों का विस्तृत विश्लेषण

नीट के मुद्दे ने केंद्र-राज्य संबंधों और शिक्षा पर नियंत्रण को लेकर एक बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस संदर्भ में निम्नलिखित कानूनी पहलुओं का विश्लेषण आवश्यक है:

1. समवर्ती सूची (Concurrent List) और विधायी अधिकार: शिक्षा को मूल संविधान में राज्य सूची के तहत रखा गया था, जो राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियां बनाने की अनुमति देता था। परंतु, वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को समवर्ती सूची (सूची III, प्रविष्टि 25) में शामिल कर दिया गया। इसके तहत संसद को कानून बनाने का व्यापक अधिकार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त, संघ सूची की प्रविष्टि 66 केंद्र सरकार को उच्च शिक्षा संस्थानों में मानकों के समन्वय और निर्धारण का अधिकार देती है। नीट परीक्षा इसी अधिकार के तहत भारतीय चिकित्सा परिषद (अब राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग – NMC) के माध्यम से अनिवार्य की गई।

2. अनुच्छेद 254 (कानूनों में असंगति): यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य का कानून और केंद्र का कानून आपस में टकराते हैं, तो केंद्र का कानून प्रभावी होता है। हालांकि, अनुच्छेद 254(2) के तहत यदि राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हो जाती है, तो वह कानून उस विशेष राज्य में लागू हो सकता है। तमिलनाडु सरकार का नीट विरोधी विधेयक (जिसका उद्देश्य राज्य को नीट से छूट देकर बारहवीं के अंकों के आधार पर प्रवेश देना है) इसी संवैधानिक प्रावधान का उपयोग करने का प्रयास कर रहा है, जो वर्तमान में राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित है।

3. न्यायिक दृष्टिकोण और महत्वपूर्ण निर्णय: उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में नीट की वैधता की पुष्टि की है। ‘क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2020)’ मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नीट एक राष्ट्रीय मानक स्थापित करता है जो कुप्रबंधन को रोकता है, योग्यता (merit) सुनिश्चित करता है, और छात्रों को कई प्रवेश परीक्षाओं के मानसिक व आर्थिक शोषण से बचाता है। न्यायालय के अनुसार, यह अनुच्छेद 19(1)(g) (पेशा अपनाने की स्वतंत्रता) और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों (अनुच्छेद 30) का उल्लंघन नहीं करता है।

4. समानता का सिद्धांत (Article 14 & 15): तमिलनाडु जैसे राज्यों का तर्क है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति और स्कूली शिक्षा प्रणालियों वाले छात्रों के लिए एक एकल परीक्षा का आयोजन करना ‘औपचारिक समानता’ (Formal Equality) तो हो सकता है, लेकिन यह ‘सकारात्मक समानता’ (Substantive Equality) नहीं है। एक पिछड़े ग्रामीण परिवेश के छात्र और दिल्ली या चेन्नई के किसी प्रतिष्ठित स्कूल के छात्र के बीच समान परीक्षा कराना असमानों के बीच समानता थोपने जैसा है, जो अनुच्छेद 14 के मूल भाव के विपरीत है।

पारिस्थितिक, वन हेल्थ और आर्थिक अंतर्संबंध

इस विषय को केवल मानव स्वास्थ्य और एमबीबीएस (MBBS) प्रवेश तक सीमित रखना इसकी व्यापकता को कम करना होगा। इसका गहरा जुड़ाव पर्यावरण, पशु चिकित्सा और व्यापक स्वास्थ्य अर्थशास्त्र से है:

1. वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण और पशु चिकित्सा (Veterinary Science) का महत्व: आज दुनिया भर में संक्रामक रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, जिनमें से 70% से अधिक रोग पशुजन्य (Zoonotic Diseases) हैं, जैसे इबोला, रेबीज, निपाह, बर्ड फ्लू और मंकीपॉक्स। इन महामारियों को रोकने के लिए पशु चिकित्सा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पशु चिकित्सा पाठ्यक्रमों (BVSc & AH) में प्रवेश भी नीट के माध्यम से ही होता है। नीट की वर्तमान विसंगतियों और अत्यधिक उच्च कट-ऑफ के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के वे छात्र, जिनका पशुपालन और वन्यजीव पारिस्थितिकी से प्रत्यक्ष जुड़ाव है, इन पाठ्यक्रमों से वंचित हो रहे हैं। शहरी छात्र जो केवल एमबीबीएस न मिलने पर मजबूरी में पशु चिकित्सा चुनते हैं, वे अक्सर इन क्षेत्रों में शोध या ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के प्रति उदासीन होते हैं। यह पारिस्थितिक सुरक्षा और महामारियों के खिलाफ हमारी अग्रिम सुरक्षा पंक्ति (frontline defense) को कमजोर करता है।

2. आर्थिक लागत और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रभाव: नीट की तैयारी के लिए कोचिंग और फिर निजी मेडिकल कॉलेजों की अत्यधिक फीस (जो करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है) चिकित्सा शिक्षा को एक निवेश में बदल देती है। इसके चलते स्नातक होने के बाद डॉक्टरों पर इस पूंजी को जल्द से जल्द वसूलने का दबाव होता है। नतीजतन, वे ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में सेवा देने के बजाय शहरी कॉर्पोरेट अस्पतालों को प्राथमिकता देते हैं। यह देश के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, जिससे स्वास्थ्य असमानता और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर जेब से होने वाले खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) का बोझ बढ़ जाता है।

अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न

प्रश्न: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और भारतीय संविधान के तहत शिक्षा से जुड़े प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की स्थापना केंद्रीय मंत्रिमंडल के प्रस्ताव द्वारा एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) के रूप में की गई है।

2. वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल किया गया था।

3. संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य का कानून केंद्रीय कानून के ऊपर तभी प्रभावी हो सकता है जब उसे राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2

(B) केवल 2 और 3

(C) केवल 1 और 3

(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (B) केवल 2 और 3

स्पष्टीकरण:

कथन 1 गलत है: राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) एक वैधानिक निकाय नहीं है। इसकी स्थापना भारतीय सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत एक स्वायत्त और आत्मनिर्भर सोसायटी (Society) के रूप में की गई है।

कथन 2 सही है: मूल संविधान में शिक्षा राज्य सूची का विषय थी, लेकिन 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इसे समवर्ती सूची (प्रविष्टि 25) में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे केंद्र और राज्य दोनों को इस पर कानून बनाने का अधिकार मिला।

कथन 3 सही है: अनुच्छेद 254(2) के अनुसार, यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य द्वारा बनाया गया कानून केंद्रीय कानून के विपरीत है, तो राष्ट्रपति की पूर्व सहमति और मंजूरी मिलने के बाद ही वह कानून उस राज्य में लागू हो सकता है। अतः सही विकल्प (B) है।

अभ्यास मुख्य परीक्षा प्रश्न

प्रश्न: “एक राष्ट्र, एक परीक्षा” (One Nation, One Exam) की अवधारणा भारतीय संघीय ढांचे में निहित क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के साथ किस प्रकार टकराव उत्पन्न करती है? NEET विवाद के विशेष संदर्भ में आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

उत्तर के मुख्य बिंदु:

1. भूमिका:

– ‘एक राष्ट्र, एक परीक्षा’ के पीछे के मूल उद्देश्यों को स्पष्ट करें (समानता स्थापित करना, बहु-परीक्षाओं के वित्तीय व मानसिक बोझ को कम करना, पारदर्शिता लाना)।

– इस वर्ष नीट परीक्षा में देखी गई विसंगतियों और कट-ऑफ में 30-35 अंकों के उछाल का संदर्भ देकर प्रश्न की शुरुआत करें।

2. संघीय ढांचे और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ संघर्ष के बिंदु:

शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण: शिक्षा समवर्ती सूची में होने के बावजूद, नीट के माध्यम से चिकित्सा प्रवेश पर केंद्र का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया है। इससे राज्यों की स्थानीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और चिकित्सा मानव संसाधन प्रबंधन की स्वायत्तता प्रभावित होती है।

विविधता की अनदेखी: देश में विभिन्न राज्य बोर्डों का पाठ्यक्रम और शैक्षणिक स्तर अलग-अलग हैं। सीबीएसई (CBSE) केंद्रित नीट पाठ्यक्रम ग्रामीण और क्षेत्रीय भाषा के छात्रों को नुकसान पहुंचाता है।

तमिलनाडु का दृष्टिकोण: ए.के. राजन समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताएं कि कैसे नीट ने ग्रामीण और समाज के हाशिये पर मौजूद वर्गों के छात्रों के लिए चिकित्सा शिक्षा के द्वार कठिन कर दिए हैं।

3. नीट परीक्षा प्रणाली से जुड़े संरचनात्मक मुद्दे:

अंकों की अतिस्फीति और अनिश्चितता: पेपर के सरलीकरण या अनियमितताओं के कारण कट-ऑफ में अप्रत्याशित वृद्धि, जिससे योग्य छात्र भी सरकारी सीटों से वंचित हो रहे हैं।

शिक्षा का व्यावसायीकरण: परीक्षा का वस्तुनिष्ठ स्वरूप महंगे कोचिंग सेंटरों पर निर्भरता बढ़ाता है, जिससे वित्तीय रूप से सक्षम वर्ग को लाभ मिलता है।

प्रशासनिक खामियां: NTA की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी और पेपर लीक की पुनरावृत्ति ने राष्ट्रीय परीक्षा प्रणाली पर भरोसा कमजोर किया है।

4. आगे की राह:

सहकारी संघवाद को बढ़ावा: केंद्र को राज्यों की विशिष्ट भौगोलिक और सामाजिक आवश्यकताओं को समझते हुए प्रवेश प्रक्रिया में आंशिक स्वायत्तता देनी चाहिए (जैसे राज्य बोर्ड के अंकों को भारांश देना)।

परीक्षा पैटर्न में सुधार: केवल रटने पर आधारित बहुविकल्पीय प्रणाली के बजाय नैदानिक योग्यता और विश्लेषणात्मक क्षमता का परीक्षण करने वाले बहुस्तरीय मूल्यांकन मॉडल को अपनाना।

NTA का सुदृढ़ीकरण: राधाकृष्णन समिति जैसी सुधार समितियों की सिफारिशों के अनुरूप परीक्षा सुरक्षा प्रोटोकॉल को अभेद्य बनाना और एक पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना करना।

5. निष्कर्ष:

– निष्कर्षतः, राष्ट्रीय मानकों और शुचिता को बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इसे सामाजिक न्याय, विविधता और संघीय सहयोग की कीमत पर नहीं थोपा जाना चाहिए। एक संतुलित और समावेशी मार्ग ही भारतीय संघवाद के अनुरूप होगा।


यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

© 2026 iaseasyway.com. All Rights Reserved.