पुलिस बल द्वारा पैलेट गन और इलेक्ट्रिक शॉक बैटन के उपयोग पर प्रतिबंध: दिव्यांग अधिकार संगठनों की मांग

हाल ही में ‘प्रोग्रेसिव मेडिकोज एंड साइंटिफिक फोरम’ (PMSF) और ‘नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसएबल्ड’ (NPRD) के नेतृत्व में विभिन्न दिव्यांग अधिकार संगठनों ने देश भर में पुलिस बलों द्वारा पैलेट गन (Pellet guns) और इलेक्ट्रिक शॉक बैटन (Electric shock batons) के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। यह मुद्दा 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इन हथियारों के कथित इस्तेमाल के बाद चर्चा में आया है। संगठनों ने इस घटना की एक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग करते हुए तर्क दिया है कि ये उपकरण ‘गैर-घातक’ (non-lethal) माने जाने के बावजूद गंभीर और स्थायी विकलांगता का कारण बन सकते हैं।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)

जीएस पेपर II: शासन, संविधान, राजनीति, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध। (विषय: मानवाधिकार, पुलिस सुधार, कानून और व्यवस्था, और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार)।

जीएस पेपर III: सुरक्षा और आंतरिक चुनौतियां। (विषय: दंगों का नियंत्रण, पुलिस के हथियार और तकनीकी-कानूनी मानक)।

प्रमुख बिंदु और तर्क

  • मानवाधिकारों का उल्लंघन: संगठनों का तर्क है कि पैलेट गन का इस्तेमाल, जिसे अक्सर भीड़ नियंत्रण के लिए ‘कम घातक’ विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वास्तव में नागरिकों के शारीरिक अखंडता और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का गंभीर उल्लंघन है।
  • स्थायी विकलांगता का खतरा: पैलेट गन से निकलने वाले धातु के छर्रे आंखों की रोशनी जाने और अन्य अंगों को स्थायी रूप से क्षति पहुंचाने में सक्षम हैं। इलेक्ट्रिक शॉक बैटन का उपयोग तंत्रिका तंत्र और हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, जो विशेष रूप से दिव्यांगों और कमजोर समूहों के लिए खतरनाक है।
  • न्यायिक जांच की आवश्यकता: 20 जुलाई की घटना पर स्वतंत्र जांच की मांग यह सुनिश्चित करने के लिए है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंडों का पालन कर रही हैं या नहीं।
  • अत्यधिक बल का प्रयोग: प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इन हथियारों का उपयोग ‘न्यूनतम बल’ के सिद्धांत का उल्लंघन माना जा रहा है, जो पुलिस प्रक्रियाओं का आधार होना चाहिए।

गहन विश्लेषण: संवैधानिक और कानूनी पहलू

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रदान करता है। पुलिस द्वारा बल का प्रयोग ‘कानून और व्यवस्था’ बनाए रखने के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी सीमाएं ‘पुलिस अधिनियम’ और ‘दंड प्रक्रिया संहिता’ (CrPC) द्वारा निर्धारित की गई हैं।

तकनीकी-कानूनी अस्पष्टता: भारत में पुलिस बलों के लिए भीड़ नियंत्रण हथियारों का कोई एकीकृत, केंद्रीय मानक नहीं है। पैलेट गन को कश्मीर जैसे क्षेत्रों में प्रदर्शनों को रोकने के लिए पेश किया गया था, लेकिन इसके परिणामों ने इसे एक विवादास्पद उपकरण बना दिया है। ‘संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांतों’ (UN Basic Principles) के अनुसार, पुलिस को बल का उपयोग करते समय संयम बरतना चाहिए और केवल तभी घातक या कम घातक हथियारों का उपयोग करना चाहिए जब अन्य साधन अपर्याप्त साबित हों।

दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016: यह अधिनियम भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और सुरक्षा प्रदान करता है। अधिकार संगठनों का कहना है कि पुलिस की हिंसा अक्सर दिव्यांगों को हाशिए पर और असुरक्षित स्थिति में डाल देती है, जो इस कानून के मूल भावना के विपरीत है।

पर्यावरणीय और सामाजिक स्वास्थ्य संबंध

हालांकि ये हथियार सीधे तौर पर पर्यावरणीय नहीं हैं, लेकिन इनका उपयोग सामाजिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा के वातावरण को प्रभावित करता है। अनियंत्रित पुलिस हिंसा से उपजी सामाजिक अस्थिरता और डर का माहौल नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसके अलावा, पैलेट गन के कारण होने वाली स्थायी विकलांगता का आर्थिक बोझ भी समाज और राज्य पर पड़ता है, क्योंकि प्रभावित व्यक्तियों को पुनर्वास और जीवन भर की चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा (Prelims MCQ)

प्रश्न: पुलिस द्वारा भीड़ नियंत्रण के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘कम घातक हथियारों’ (Less-lethal weapons) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. पैलेट गन का उपयोग अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के तहत पूरी तरह प्रतिबंधित है।
  2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 पुलिस को किसी भी स्तर पर बल का उपयोग करने की असीमित शक्ति प्रदान करता है।

उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: D (न तो 1 और न ही 2)

व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानून में पैलेट गन पर पूर्ण वैश्विक प्रतिबंध नहीं है, हालांकि मानवाधिकार संगठनों द्वारा इनकी कड़ी आलोचना की जाती है। कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 21 ‘जीवन का अधिकार’ देता है और पुलिस को ‘असीमित’ नहीं, बल्कि ‘कानून द्वारा निर्धारित’ न्यूनतम बल उपयोग की शक्ति प्राप्त है।

मुख्य परीक्षा वर्णनात्मक प्रश्न (Mains Descriptive Question)

प्रश्न: “भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस द्वारा आधुनिक गैर-घातक हथियारों का उपयोग, सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच एक नाजुक संतुलन की मांग करता है।” इस कथन के आलोक में, पैलेट गन और इलेक्ट्रिक शॉक बैटन के उपयोग से संबंधित चिंताओं का विश्लेषण करें और पुलिस सुधारों हेतु सुझाव दें।

मॉडल उत्तर के बिंदु:

  • परिचय: भीड़ नियंत्रण और नागरिक सुरक्षा में संघर्ष के बीच संतुलन की आवश्यकता पर चर्चा करें।
  • मुख्य भाग:
    • पैलेट गन और इलेक्ट्रिक बैटन से होने वाले शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान का उल्लेख करें।
    • पुलिस बल द्वारा ‘न्यूनतम बल’ के सिद्धांत के उल्लंघन पर चर्चा करें।
    • कानूनी ढांचे (CrPC, पुलिस एक्ट) की कमियों पर प्रकाश डालें।
  • सुझाव:
    • पुलिस बलों के लिए भीड़ नियंत्रण के लिए ‘समान मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) तैयार करना।
    • पुलिस कार्मिकों के लिए मानवाधिकार प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रमों का आयोजन।
    • हथियारों की जगह वैकल्पिक तकनीक जैसे जल तोप (water cannons), ध्वनि तरंगों (sonic weapons) या अन्य गैर-हिंसक विधियों को प्राथमिकता देना।
    • पुलिस और जनता के बीच विश्वास बहाली हेतु स्वतंत्र जवाबदेही तंत्र की स्थापना।
  • निष्कर्ष: एक समावेशी लोकतंत्र में, सुरक्षा का उद्देश्य नागरिकों को डराना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। पुलिस सुधारों को तकनीक के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को भी समाहित करना चाहिए।

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