Watch: Tamil Nadu Census 2027 | Why headcount matters (July 17, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण

परिचय एवं वर्तमान संदर्भ

क्या आप जानते हैं कि भारत में जनगणना सिर्फ लोगों को गिनने का काम नहीं है? यह हमारी पूरी प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था की रीढ़ है। यह देश की जनसंख्या, उनकी खूबियों और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का एक ऐसा आईना है, जिससे नीतियां बनती हैं। कोविड-19 महामारी के कारण सरकार ने 2021 की जनगणना को टाल दिया था, लेकिन अब खबर है कि यह बहुप्रतीक्षित प्रक्रिया 2027 में शुरू हो सकती है। इसी बीच, ‘तमिलनाडु जनगणना 2027: क्यों यह हेडकाउंट मायने रखता है’ विषय पर एक गंभीर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। तमिलनाडु सरकार इस जनगणना को लेकर बेहद मुखर है, और आपको इस मुद्दे की गहराई को समझना होगा।

तमिलनाडु ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। उसने अपनी जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया और प्रजनन दर (TFR) को प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) से नीचे ले आया। लेकिन, अब यही सफलता उसके लिए गले की हड्डी बन गई है। यह जनसांख्यिकीय सफलता राजनीतिक प्रतिनिधित्व और केंद्र सरकार से मिलने वाले फंड में तमिलनाडु को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। साल 2026 के बाद होने वाला परिसीमन (Delimitation) और 2027 की जनगणना देश के राजनीतिक शक्ति संतुलन और संसाधनों के बंटवारे को पूरी तरह बदल देंगे। तमिलनाडु जैसे प्रगतिशील राज्यों का तर्क है कि जनगणना सिर्फ सिरों को गिनने का खेल नहीं है। यह राज्य की प्रगति, तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बुजुर्ग होती आबादी की जरूरतों और संसाधनों के सही बंटवारे का पैमाना है। यही कारण है कि आज तमिलनाडु की जनगणना का मुद्दा पूरे देश में गूंज रहा है।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता

एक सिविल सेवा अभ्यर्थी के रूप में, आपको मुख्य परीक्षा (Mains) की तैयारी के लिए इस विषय को अपने पाठ्यक्रम से जोड़कर देखना होगा। यह विषय इन प्रश्नपत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है:

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (GS Paper-II):
    • भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।
    • संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढांचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।
    • केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ।
    • नीतियों के निर्माण एवं कार्यान्वयन के लिए सरकार के विभिन्न अंग।
  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-I (GS Paper-I):
    • जनसंख्या एवं संबंधित मुद्दे।
    • शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

प्रमुख बिंदु / तर्क / संरचनात्मक मुद्दे

तमिलनाडु की आगामी जनगणना सिर्फ आंकड़ों का संग्रह नहीं है। यह हमारे संघीय ढांचे की नींव को हिलाने वाले कई मुद्दों को उजागर करती है। आइए इन संरचनात्मक मुद्दों को गहराई से समझते हैं:

  1. राजनीतिक प्रतिनिधित्व और परिसीमन (Delimitation):
    संविधान का अनुच्छेद 82 कहता है कि हर जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय (परिसीमन) किया जाना चाहिए। 84वें संविधान संशोधन (2001) ने इस प्रक्रिया पर 2026 तक रोक लगा दी थी। अब 2027 की जनगणना के बाद यह रोक हट जाएगी और नया परिसीमन होगा।
    यहीं से समस्या शुरू होती है। तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों ने देश के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को शानदार तरीके से लागू किया है। उनकी कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर (TFR 2.1) से काफी नीचे आ चुकी है। दूसरी तरफ, उत्तर भारत के राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है।
    एक सरल उदाहरण से समझिए: मान लीजिए कि स्कूल के दो सेक्शन हैं। सेक्शन-A के बच्चों ने अनुशासन बनाकर अपनी संख्या नियंत्रित रखी, जबकि सेक्शन-B में बच्चों की भीड़ बढ़ती गई। अब यदि स्कूल का हेडमास्टर बच्चों की संख्या के आधार पर सेक्शन-A के मॉनिटरों (प्रतिनिधियों) की संख्या कम कर दे और सेक्शन-B के मॉनिटर बढ़ा दे, तो क्या यह सेक्शन-A के साथ अन्याय नहीं होगा? दक्षिणी राज्यों को यही डर सता रहा है कि नए परिसीमन से संसद में उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा। इसे ही हम “प्रदर्शन के लिए दंड” (Penalty for Performance) कहते हैं।
  2. राजकोषीय संघवाद और वित्त आयोग का पेंच:
    वित्त आयोग तय करता है कि केंद्र सरकार राज्यों के बीच टैक्स का पैसा कैसे बांटेगी। इस बंटवारे में आबादी हमेशा से एक बड़ा पैमाना रही है। 15वें वित्त आयोग ने 1971 की जनगणना के बजाय 2011 के आंकड़ों को आधार बनाया। इसका परिणाम क्या हुआ? तमिलनाडु जैसे उन राज्यों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा जिन्होंने आबादी पर काबू पा लिया था, और केंद्रीय करों में उनका हिस्सा घट गया।
    इसे एक पारिवारिक बजट के रूप में देखें: यदि एक पिता अपनी संपत्ति का बंटवारा केवल बेटों के बच्चों की संख्या के आधार पर करने लगे, तो छोटे और नियोजित परिवार वाले बेटे को सबसे कम हिस्सा मिलेगा। राज्य सरकारें इसी नीति का विरोध कर रही हैं। वे चाहती हैं कि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों के लिए उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए, न कि आर्थिक सजा दी जानी चाहिए।
  3. बुजुर्ग होती आबादी और जनसांख्यिकीय बदलाव:
    तमिलनाडु अब जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Transition) के एक ऐसे दौर में पहुंच गया है जहां जन्म दर बहुत कम है और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) बढ़ रही है। इसके कारण राज्य में बच्चों और युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है।
    आगामी जनगणना से सरकार को इस बदलाव के सटीक आंकड़े मिलेंगे। इससे राज्य सरकार बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य योजनाएं, सामाजिक सुरक्षा और पेंशन नीतियां बेहतर ढंग से तैयार कर पाएगी। यह डेटा हमें श्रम बल (Workforce) में आ रही कमी और दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासियों (Migrants) के प्रभाव को समझने में भी मदद करेगा।
  4. शहरीकरण की तेज रफ्तार और बुनियादी ढांचा:
    तमिलनाडु देश के सबसे अधिक शहरीकृत राज्यों में गिना जाता है। उसकी लगभग आधी आबादी शहरों में रहती है। सड़कों, साफ पानी, सीवरेज, आवास और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं को योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने के लिए सटीक जनगणना डेटा की जरूरत है। यह डेटा ही शहर और गांवों के बीच के अंतर को पाटने में मददगार साबित होगा।
  5. कल्याणकारी योजनाओं का सही निशाना:
    गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ हकदार लोगों तक पहुंचना चाहिए। पुरानी आबादी के आंकड़ों पर काम करने से योजनाएं भटक जाती हैं। नए और सटीक आंकड़े सरकार को सीधे उन लोगों को लक्षित करने में मदद करेंगे जिन्हें सरकारी मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है।
  6. सामाजिक-आर्थिक डेटा का खजाना:
    देशभर में जातिगत जनगणना की मांग तेज हो रही है। ऐसे में यह जनगणना सिर्फ लोगों के सिर गिनने का काम नहीं करेगी, बल्कि लोगों की आर्थिक स्थिति, शिक्षा के स्तर, उनके काम-धंधे और रहन-सहन की स्थिति को भी सामने लाएगी। इस डेटा की मदद से सरकार अधिक समावेशी और न्यायसंगत नीतियां बना पाएगी।

प्रमुख पदों और संवैधानिक/कानूनी पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण

परीक्षा में सीधे पूछे जाने वाले संवैधानिक अनुच्छेदों और कानूनी बारीकियों को आपको ठीक से याद रखना होगा। आइए इन्हें सरल भाषा में समझते हैं:

जनगणना (Census)

सरल शब्दों में, जनगणना देश की आबादी का एक आधिकारिक और व्यवस्थित सर्वेक्षण है। इसमें हम सिर्फ लोगों की संख्या नहीं गिनते, बल्कि उनकी उम्र, काम, शिक्षा और आर्थिक स्थिति का पूरा ब्यौरा दर्ज करते हैं। भारत में हर दस साल में गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाला महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त का कार्यालय (Office of the Registrar General and Census Commissioner) इस बड़ी जिम्मेदारी को निभाता है।

संवैधानिक और कानूनी प्रावधान

  1. अनुच्छेद 82 (लोकसभा के लिए सीटों का पुनर्समायोजन): यह अनुच्छेद संसद को शक्ति देता है कि वह हर नई जनगणना के बाद लोकसभा में राज्यों की सीटों के आवंटन और उनके चुनावी क्षेत्रों (Territorial Constituencies) की सीमाओं को फिर से तय करे।
  2. अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं के लिए सीटों का पुनर्समायोजन): जैसे अनुच्छेद 82 देश की लोकसभा के लिए है, ठीक वैसे ही यह अनुच्छेद राज्यों की विधानसभाओं के लिए सीटों के पुनर्निर्धारण का नियम बनाता है।
  3. परिसीमन आयोग अधिनियम (Delimitation Commission Act): अनुच्छेद 82 के तहत संसद हर जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम पारित करती है। इसके तहत एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग बनता है। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज इसके अध्यक्ष होते हैं। इनका काम चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से खींचना होता है।
  4. 84वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2001: इस संशोधन ने लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर साल 2026 तक के लिए फ्रीज (स्थिर) कर दिया था। सरकार ने ऐसा इसलिए किया ताकि परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को अपनी कम आबादी के कारण राजनीतिक ताकत न गंवानी पड़े। अब जब 2026 की समय सीमा खत्म हो रही है, तो 2027 की जनगणना के बाद सीटों का नया बंटवारा होना तय है।
  5. जनगणना अधिनियम, 1948: यह वह मुख्य कानून है जो भारत में जनगणना कराने का कानूनी आधार देता है। यह अधिकारियों को अधिकार देता है और नागरिकों के लिए सही जानकारी देना अनिवार्य बनाता है।
  6. संघ सूची (Union List) का विषय: हमारे संविधान की 7वीं अनुसूची की प्रविष्टि 69 (Entry 69) के अनुसार जनगणना पूरी तरह से संघ सूची का विषय है। इसका मतलब है कि जनगणना कराने की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है, राज्य सरकारों की नहीं।

राजकोषीय संघवाद और वित्त आयोग का प्रभाव

राष्ट्रपति हर पांच साल में संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन करते हैं। इस आयोग का मुख्य काम केंद्र सरकार द्वारा वसूले गए टैक्स के पैसे को राज्यों के बीच बांटने का फॉर्मूला तय करना है।

  • जनसंख्या मानदंड: वित्त आयोग टैक्स का पैसा बांटते समय आबादी को बहुत महत्व देता है। माना जाता है कि जितनी ज्यादा आबादी होगी, राज्य को अपने नागरिकों को स्कूल, अस्पताल और सड़कें देने के लिए उतने ही ज्यादा पैसों की जरूरत होगी।
  • 1971 बनाम 2011 की जनगणना: 10वें से लेकर 14वें वित्त आयोग तक, सरकार ने टैक्स के बंटवारे में 1971 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि जनसंख्या नियंत्रित करने वाले दक्षिणी राज्यों का बजट न बिगड़े। लेकिन 15वें वित्त आयोग ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बना दिया। इसका सीधा असर यह हुआ कि ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को तो बड़ा हिस्सा मिल गया, लेकिन तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का हिस्सा घट गया।
  • “प्रदर्शन पर दंड” की बहस: तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने देशहित में जनसंख्या को काबू में किया। अब इसके बदले उनका बजट काटना बिल्कुल गलत है। वे मांग कर रहे हैं कि वित्त आयोग को केवल कुल आबादी देखने के बजाय ‘स्थिर जनसंख्या’ या ‘जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों’ को अंक देने चाहिए। साथ ही राज्यों की वास्तविक बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।

जनसांख्यिकीय संक्रमण

भारत के सभी राज्य जनसांख्यिकी के एक ही पड़ाव पर नहीं हैं। तमिलनाडु जनसांख्यिकीय संक्रमण के उस आखिरी पड़ाव पर है जहां जन्म दर और मृत्यु दर दोनों न्यूनतम स्तर पर आ जाती हैं। इसके कारण राज्य में बच्चों और युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है।

  • कुल प्रजनन दर (TFR): राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, तमिलनाडु की प्रजनन दर घटकर 1.6 हो गई है। यह राष्ट्रीय औसत (2.0) और आबादी को स्थिर रखने वाले प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी नीचे है। सीधे शब्दों में कहें तो अब तमिलनाडु की आबादी आगे जाकर घटने या पूरी तरह स्थिर होने वाली है।
  • जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend): उत्तर भारत में युवाओं की बड़ी आबादी के रूप में अभी भी ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ का फायदा मिल रहा है, लेकिन तमिलनाडु में यह लाभांश अब खत्म होने की कगार पर है। वहां काम करने वाले लोगों (Workforce) की औसत उम्र बढ़ रही है। इससे कारखानों में कामगारों की कमी होगी और राज्य सरकार पर वृद्धावस्था पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च तेजी से बढ़ेगा।
  • शहरीकरण: तमिलनाडु देश के सबसे ज्यादा शहरी आबादी वाले राज्यों में से एक है। इसकी करीब आधी आबादी शहरों में बस चुकी है। शहरों में यह अनियंत्रित भीड़ पीने के पानी, सीवर, सड़कों और अस्पतालों जैसी बुनियादी सेवाओं पर भारी दबाव बना रही है।

एक आर्थिक/पर्यावरण/पशुजन्य रोग संबंध

आर्थिक संबंध

जनगणना के आंकड़े किसी भी राज्य की पूरी अर्थव्यवस्था को दिशा देते हैं। तमिलनाडु के लिए इसके तीन मुख्य आर्थिक प्रभाव होने वाले हैं:

  • श्रम बाजार और प्रवासन: जैसे-जैसे राज्य में युवाओं की संख्या कम होगी और बुजुर्ग बढ़ेंगे, उद्योगों को काम करने वाले लोगों की कमी खलेगी। इस कमी को पूरा करने के लिए उत्तर भारत के राज्यों से बड़ी संख्या में श्रमिक तमिलनाडु आएंगे। जनगणना के आंकड़े सरकार को इस प्रवासी आबादी के पैटर्न और उनसे जुड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने की तैयारी में मदद करेंगे।
  • सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल: जब बुजुर्गों की तादाद बढ़ेगी, तो पेंशन, मुफ्त इलाज और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर राज्य का खर्च अपने आप बढ़ जाएगा। जनगणना का सटीक डेटा राज्य सरकार को भविष्य की वित्तीय योजनाओं को तैयार करने और बजट आवंटित करने में मदद करेगा।
  • निवेश और व्यापार: कोई भी बड़ी कंपनी निवेश करने से पहले वहां के जनसांख्यिकीय आंकड़ों को देखती है। जहां युवा और कामकाजी आबादी होती है, वहां कंपनियां ज्यादा आकर्षित होती हैं। यह डेटा कंपनियों को अपना बाजार समझने और कुशल श्रमिकों की उपलब्धता का अनुमान लगाने में मदद करता है।

पर्यावरण संबंध

जनसंख्या का आकार और उसका घनत्व हमारे पर्यावरण को सीधे प्रभावित करता है:

  • संसाधनों पर दबाव: तमिलनाडु की लगभग आधी आबादी शहरों में संकेंद्रित है। इससे पानी, जमीन और स्वच्छ हवा जैसे संसाधनों पर जबरदस्त बोझ बढ़ रहा है। जनगणना का डेटा हमें सतत शहरी नियोजन (Sustainable Urban Planning) और संसाधन प्रबंधन के तरीके खोजने में मदद करेगा।
  • प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन: जिन इलाकों में आबादी घनी होती है, वहां प्रदूषण और कचरे की समस्या विकराल हो जाती है। यह डेटा नगर निगमों को ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) और प्रदूषण नियंत्रण की सही रणनीतियां बनाने में मदद करेगा।
  • जलवायु परिवर्तन अनुकूलन: बाढ़, लू (Heatwaves) और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा घनी आबादी वाले इलाकों में सबसे ज्यादा होता है। जनगणना से मिलने वाले आंकड़ों के जरिए सरकार संवेदनशील इलाकों की पहचान करके बेहतर आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार कर पाएगी।

पशुजन्य रोग संबंध

तेजी से बढ़ता शहरीकरण और इंसानों का जंगलों व पशुओं के करीब आना संक्रामक और पशुजन्य बीमारियों (जैसे डेंगू, चिकनगुनिया या स्वाइन फ्लू) के खतरे को बढ़ाता है। जब लोग घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में रहते हैं, तो ऐसी बीमारियां बहुत तेजी से फैलती हैं। जनगणना के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग को यह समझने में मदद करते हैं कि किन क्षेत्रों में आबादी का घनत्व अधिक है, ताकि वहां महामारी फैलने से पहले ही स्वास्थ्य सेवाओं और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा सके।

1 अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा बहुविषयक प्रश्न (MCQ)

अपनी तैयारी को परखने के लिए नीचे दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्न को हल करने का प्रयास करें:

प्रश्न: भारत में परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
  2. 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन पर 2026 तक रोक लगा दी।
  3. वर्तमान परिसीमन 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1
B) केवल 1 और 2
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3

उत्तर: B

स्पष्टीकरण:

  • कथन 1 सही है: संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। इस अधिनियम के तहत एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
  • कथन 2 सही है: 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन पर 2026 तक रोक लगा दी है, जिसका अर्थ है कि 2026 के बाद ही सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्समायोजन होगा।
  • कथन 3 गलत है: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का वर्तमान आवंटन 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है, क्योंकि 2026 तक परिसीमन पर रोक है। हालांकि, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए सीटों का पुनर्समायोजन और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण 2001 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया गया है (और 2008 में किए गए अंतिम परिसीमन में 2001 की जनगणना का उपयोग किया गया था), लेकिन कुल सीटों की संख्या 1971 के स्तर पर जमी हुई है।

1 अभ्यास मुख्य परीक्षा वर्णनात्मक प्रश्न

मुख्य परीक्षा (Mains) में अच्छे अंक पाने के लिए उत्तर लेखन (Answer Writing) का अभ्यास बहुत जरूरी है। नीचे दिए गए प्रश्न को लिखने का प्रयास करें:

प्रश्न: “आगामी जनगणना (2027 में अपेक्षित) भारत के संघीय ढांचे के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां और अवसर प्रस्तुत करती है।” इस कथन के आलोक में, तमिलनाडु जैसे राज्यों के लिए संभावित निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए, विशेष रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राजकोषीय संघवाद के संदर्भ में।

मॉडल उत्तर बिंदु:

संरचना:

  • परिचय: जनगणना के महत्व और 2027 में अपेक्षित राष्ट्रीय जनगणना के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालना। बताना कि यह भारत के संघीय ढांचे के लिए महत्वपूर्ण क्यों है।
  • मुख्य भाग:
    • आगामी जनगणना की चुनौतियां और अवसर:
      • चुनौतियां:
        • जनसांख्यिकीय असमानता: राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर।
        • राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन: दक्षिणी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में संभावित कमी, जिससे “प्रदर्शन के लिए दंड” का मुद्दा उत्पन्न होगा।
        • राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव: वित्त आयोग के आवंटन में बदलाव, जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को वित्तीय नुकसान।
        • डेटा संग्रह की जटिलता: बढ़ती शहरीकरण, प्रवासन, और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों के कारण सटीक डेटा एकत्र करने की चुनौती।
      • अवसर:
        • नीति निर्माण: अद्यतन और सटीक डेटा के आधार पर अधिक प्रभावी और लक्षित नीतियां।
        • संसाधन आवंटन: वास्तविक आवश्यकताओं के आधार पर संसाधनों का न्यायसंगत वितरण।
        • जनसांख्यिकीय लाभांश का प्रबंधन: क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को समझकर युवा और वृद्ध आबादी के लिए विशिष्ट रणनीतियाँ।
        • समावेशी विकास: जाति, शिक्षा, आय आदि के अधिक विस्तृत डेटा के माध्यम से सामाजिक समावेशन।
    • तमिलनाडु के लिए संभावित निहितार्थ:
      • राजनीतिक प्रतिनिधित्व:
        • जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण तमिलनाडु की TFR प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।
        • 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में, तमिलनाडु को लोकसभा में अपनी सीटों में कमी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों को लाभ होगा।
        • इससे राष्ट्रीय नीति निर्धारण में दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर पड़ सकती है।
        • राज्य इस मुद्दे को “एक व्यक्ति, एक vote” के सिद्धांत पर आधारित नहीं बल्कि “एक राज्य, एक vote” या “समान प्रतिनिधित्व” के रूप में देखते हैं।
      • राजकोषीय संघवाद:
        • वित्त आयोग द्वारा जनसंख्या को दिए जाने वाले भार के कारण केंद्रीय करों में तमिलनाडु की हिस्सेदारी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
        • राज्य अपनी सफल जनसंख्या नियंत्रण नीतियों के लिए वित्तीय रूप से दंडित किए जाने का विरोध कर रहा है और वैकल्पिक मानदंड (जैसे आवश्यकता, दक्षता) अपनाने की वकालत कर रहा है।
        • बढ़ती वृद्ध आबादी के कारण स्वास्थ्य देखभाल, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता खर्च।
        • शहरीकरण और प्रवासन से उत्पन्न अवसंरचनात्मक आवश्यकताओं के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन।
      • अन्य सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ:
        • कार्यबल की कमी और अंतर-राज्यीय प्रवासन पर निर्भरता।
        • वृद्ध आबादी की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष योजनाओं की आवश्यकता।
        • शहरी नियोजन और सेवाओं पर बढ़ता दबाव।
  • निष्कर्ष:
    • जनगणना के महत्व को दोहराना और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर देना कि यह राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा दे, न कि विभाजन को।
    • एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव देना, जहां जनसंख्या नियंत्रण के लिए राज्यों के प्रयासों को मान्यता दी जाए और संघीय भावना को बनाए रखा जाए।
    • राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वित्तीय आवंटन के लिए नए, अधिक न्यायसंगत फॉर्मूलों की खोज की आवश्यकता पर बल देना।

यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी (Daily Current Affairs) पहल का एक हिस्सा है। सिविल सेवा परीक्षा की ऐसी ही अन्य अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।


🎓

लेखक के बारे में: भाग्यश्री

भाग्यश्री एक वरिष्ठ सिविल सेवा मेंटर और शिक्षिका हैं, जिन्हें UPSC और MPSC उम्मीदवारों का मार्गदर्शन करने का 8 से अधिक वर्षों का समृद्ध अनुभव है। उन्होंने कई बार सिविल सेवा मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण की है और सैकड़ों सफल प्रशासनिक अधिकारियों को कोचिंग दी है। वह जटिल सामान्य अध्ययन (GS) पाठ्यक्रम और CSAT पद्धतियों को व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख अध्ययन रूपरेखाओं में विभाजित करने में विशेषज्ञता रखती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

© 2026 iaseasyway.com. All Rights Reserved.