11 अगस्त, 2026 दैनिक समसामयिकी विश्लेषण: यूपीआई जीरो एमडीआर सुधार, 300 GW स्वच्छ ऊर्जा मील का पत्थर, और मक्का संयुक्त रक्षा समझौता

प्रस्तावना और संदर्भ

सिविल सेवा परीक्षा (UPSC/MPSC) की तैयारी कर रहे छात्रों के रूप में, आपको समसामयिकी के मुख्य मुद्दों पर पैनी नजर रखनी होगी। 11 अगस्त, 2026 के दैनिक समसामयिकी विश्लेषण में हम तीन ऐसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को समझेंगे जो आपकी परीक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहला बदलाव देश के वित्तीय कानून से जुड़ा है। संसद ने 10 अगस्त, 2026 को कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया। इस विधेयक ने हमारे डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI), खासकर यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और शून्य व्यापारी छूट दर (Zero MDR) के भविष्य को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी है। दूसरा बड़ा मील का पत्थर स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में है। भारत ने हरित ऊर्जा परिवर्तन में एक ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए 300.50 GW स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का आंकड़ा पार कर लिया है, जिसमें सौर ऊर्जा का दबदबा सबसे अधिक है। तीसरा घटनाक्रम भू-राजनीतिक है। 7 अगस्त, 2026 को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) साइन किया। यह समझौता पश्चिम एशिया में सुरक्षा की एक नई तस्वीर पेश करता है, जो भारत के सामने समुद्री और कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकता है। आइए, इन तीनों विषयों को आपके पाठ्यक्रम के अनुसार गहराई से समझते हैं।

I. पाठ्यक्रम प्रासंगिकता और जुड़ाव (UPSC और MPSC)

विषय UPSC पाठ्यक्रम संबंध MPSC पाठ्यक्रम संबंध परीक्षा केंद्रित दृष्टिकोण
1. कराधान विधेयक 2026 और यूपीआई जीरो एमडीआर सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III: भारतीय अर्थव्यवस्था, संसाधनों का संग्रहण, विकास, डिजिटल अवसंरचना और बजटिंग। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II: वैधानिक निकाय और सरकारी नीतियां। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV: अर्थव्यवस्था और योजना, बुनियादी ढांचा, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II: संवैधानिक और वैधानिक कानून। आपको समझना होगा कि डिजिटल भुगतान का मुद्रीकरण (Monetization) कैसे काम करता है। वित्तीय समावेशन और फिनटेक स्थिरता में संतुलन कैसे बनाएं, और भुगतान व निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधनों का क्या महत्व है।
2. 300 GW गैर-जीवाश्म क्षमता और सौर विकास सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III: बुनियादी ढांचा (ऊर्जा), पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन को कम करना और विज्ञान व प्रौद्योगिकी (प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण)। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV: ऊर्जा क्षेत्र व सौर ऊर्जा, पर्यावरण पारिस्थितिकी और विज्ञान व प्रौद्योगिकी का विकास। आपको COP26 के पंचामृत लक्ष्यों का मूल्यांकन करना होगा। साथ ही घरेलू विनिर्माण नीतियों (PLI, ALMM), ग्रिड से जुड़ी चुनौतियों, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला के खतरों को समझना होगा।
3. मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II: अंतरराष्ट्रीय संबंध, द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समूह, पश्चिम एशिया की भू-राजनीति, भारतीय हित और भारतीय प्रवासी। सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II: अंतरराष्ट्रीय संबंध, भारत की विदेश नीति, क्षेत्रीय गठबंधन और समुद्री सुरक्षा। इस त्रिपक्षीय गठबंधन और इसके ‘सामूहिक रक्षा’ क्लॉज का गहराई से आकलन करें। साथ ही हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा, भारत की ‘लिंक वेस्ट’ नीति और IMEC कॉरिडोर पर इसके प्रभावों को समझें।

II. विषय 1: कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 – यूपीआई और जीरो एमडीआर सुधार

1. विस्तृत परिचय और संदर्भ

संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा ने हाल ही में कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 को अपनी मंजूरी दे दी। इस नए कानून ने जून 2026 में जारी अध्यादेश की जगह ली है। विधेयक का मुख्य विधायी उद्देश्य भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 (Payment and Settlement Systems Act, 2007) में सुधार करना है, जो डिजिटल भुगतान पर लगने वाले शुल्क ढांचे से संबंधित है।

तैयारी के लिहाज से, आपको यहाँ यह समझना होगा कि क्या अब यूपीआई लेन-देन पर आपकी जेब से कोई अतिरिक्त शुल्क कटेगा? संसद में बहस के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस डर को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने साफ किया कि आम उपभोक्ताओं को यूपीआई लेन-देन के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा। सरकार चाहती है कि आम नागरिकों के लिए यह सेवा पूरी तरह मुफ्त बनी रहे ताकि देश के हर हिस्से तक बैंकिंग पहुंच बनी रहे। लेकिन सरकार ने इस कानून के जरिए एक कानूनी रास्ता जरूर तैयार कर लिया है। अब केंद्र सरकार आरबीआई के साथ सलाह-मशविरा करके भविष्य में शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Zero MDR) की नीति को बदल सकती है या इसे कुछ खास व्यापारियों तक सीमित कर सकती है। यह भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है।

2. विश्लेषणात्मक विवरण: एमडीआर की समस्या, बुनियादी ढांचागत चुनौतियां और नीतिगत प्रभाव

क. शून्य एमडीआर (Zero MDR) ढांचा और इसका असर:
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को आप एक डिजिटल ‘टोल टैक्स’ की तरह समझ सकते हैं। जब कोई ग्राहक किसी दुकानदार को डिजिटल भुगतान करता है, तो इस लेन-देन को सुरक्षित ढंग से पूरा करने के बदले बैंक या फिनटेक कंपनियां उस दुकानदार से एक मामूली शुल्क वसूलती हैं। इसे ही एमडीआर कहते हैं। सरकार ने जनवरी 2020 में डिजिटल लेन-देन को तेजी से बढ़ाने के लिए यूपीआई और रुपे (RuPay) डेबिट कार्ड पर इस शुल्क को पूरी तरह से हटाकर Zero MDR कर दिया। इस कदम ने छोटे दुकानदारों को डिजिटल भुगतान से जोड़ने में क्रांति ला दी और भारत में यूपीआई लेन-देन ने दुनिया में नया मुकाम हासिल किया।

परंतु इस व्यवस्था ने बैंकों और फिनटेक कंपनियों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया। चौबीसों घंटे चलने वाले सर्वर्स, सुरक्षा प्रणालियों और डेटा केंद्रों के रखरखाव का भारी खर्च वे बिना किसी सीधी कमाई के उठा रही थीं। सरकार ने आंशिक मदद के लिए हर साल बजट में सब्सिडी देने की शुरुआत तो की, लेकिन पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के अनुसार यह मदद वास्तविक खर्च के आधे से भी कम है। नतीजतन, कंपनियां नए आविष्कारों और साइबर सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों में निवेश करने से कतरा रही हैं।

ख. 2026 के विधेयक के मुख्य प्रावधान:
यह संशोधन भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10A में बदलाव करता है। पुरानी धारा 10A के तहत बैंकों और सेवा प्रदाताओं पर यूपीआई या रुपे लेन-देन पर कोई भी शुल्क लगाने की सख्त मनाही थी। 2026 का कानून इस पाबंदी को हटाकर इसकी जगह कुछ शर्तों को जोड़ता है। नए नियम के तहत, केंद्र सरकार आरबीआई की सलाह पर कुछ विशेष श्रेणी के व्यापारियों, लेन-देन की श्रेणियों या भुगतान सीमाओं को अधिसूचित कर सकती है जहाँ एक सीमित और नियंत्रित एमडीआर लगाया जा सकेगा।

इससे सरकार को एक वर्गीकृत शुल्क प्रणाली (Tiered Pricing) शुरू करने का अधिकार मिल जाता है। उदाहरण के लिए, आम किराना दुकानदारों और 2,000 रुपये तक के छोटे भुगतानों को शून्य शुल्क के दायरे में सुरक्षित रखा जा सकता है, जबकि बड़े कॉर्पोरेट लेन-देन पर एक तय सीमा में शुल्क लगाया जा सकता है।

ग. नीतिगत संतुलन और आगे की राह:
इस नीतिगत बहस का मुख्य बिंदु उपभोक्ता के हितों और वित्तीय कंपनियों के अस्तित्व के बीच संतुलन बनाना है। अगर सरकार आम ग्राहकों पर शुल्क लगाती है, तो वे वापस नकदी का इस्तेमाल करने लगेंगे, जो डिजिटल इंडिया अभियान के लिए एक बड़ा झटका होगा। वहीं दूसरी तरफ, बिना कमाई के कंपनियां सर्वर फेल होने और साइबर हमलों जैसी चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगी। 2026 का यह विधेयक एक व्यावहारिक हल पेश करता है: यह आम जनता के लिए बुनियादी सेवाओं को मुफ्त रखते हुए व्यावसायिक लेन-देन से राजस्व कमाने का रास्ता खोलता है, जिससे हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) लंबे समय तक मजबूत बना रहे।

III. विषय 2: 300 GW स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का ऐतिहासिक मील का पत्थर

1. विस्तृत परिचय और संदर्भ

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने अगस्त 2026 में एक ऐतिहासिक घोषणा की। भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित कुल बिजली क्षमता अब 300.50 GW के आंकड़े को पार कर चुकी है। मुख्य परीक्षा के लिहाज से आपको यह आंकड़ा ध्यान रखना चाहिए: यह उपलब्धि हमारी कुल बिजली क्षमता का लगभग 45.2% है। यह प्रगति हमें COP26 ग्लासगो जलवायु शिखर सम्मेलन में घोषित भारत के “पंचामृत” लक्ष्यों की तरफ तेजी से ले जा रही है, जिसमें हमने 2030 तक 500 GW स्वच्छ ऊर्जा स्थापित करने और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन हासिल करने का वादा किया है।

इस बड़ी छलांग के पीछे मुख्य भूमिका सौर ऊर्जा की रही है। जून 2026 तक देश की कुल स्थापित सौर क्षमता 162.15 GW पर पहुंच गई, जिससे भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक बन गया है। चीन पर आयात निर्भरता कम करने के ठोस सरकारी प्रयासों के कारण देश में घरेलू सौर मॉड्यूल बनाने की क्षमता भी 172 GW तक पहुंच गई है। लेकिन ग्रिड के एकीकरण और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी कुछ चुनौतियां अभी भी हमारा रास्ता रोक रही हैं, जिन्हें समझना आपके लिए बेहद जरूरी है।

2. विश्लेषणात्मक विवरण: नीतिगत प्रेरक, ग्रिड एकीकरण और आपूर्ति श्रृंखला की संवेदनशीलता

क. सौर ऊर्जा के विकास के मुख्य नीतिगत कारक:
आखिर सौर ऊर्जा में यह अभूतपूर्व तेजी कैसे आई? इसके पीछे सरकार की कुछ खास रणनीतियां रही हैं। सबसे पहले, सरकार ने उच्च क्षमता वाले सौर मॉड्यूल बनाने के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना शुरू की। इसने घरेलू स्तर पर विनिर्माण इकाइयों को स्थापित करने के लिए निजी क्षेत्र से बड़ा निवेश आकर्षित किया। इसके साथ ही, स्वीकृत मॉडल और निर्माताओं की सूची (ALMM) जैसे गैर-टैरिफ़ उपाय ने चीनी आयात की प्रतिस्पर्धा से हमारे घरेलू उद्योगों को सुरक्षा प्रदान की, क्योंकि सरकारी परियोजनाओं में केवल स्वीकृत सूची में दर्ज कंपनियों के उत्पादों का उपयोग ही अनिवार्य है। खेतों में पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) योजना ने सिंचाई पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़कर डीजल और बिजली पर किसानों की निर्भरता कम कर दी है। इसी तरह, सोलर पार्क योजना ने बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन और बिजली लाइनों की कनेक्टिविटी से जुड़ी बाधाओं को बहुत हद तक दूर कर दिया है।

ख. ग्रिड एकीकरण और रुक-रुक कर होने वाले उत्पादन की चुनौती:
सौर और पवन ऊर्जा लगातार एक जैसी नहीं मिलतीं। जब ग्रिड में इस अनिश्चित (Intermittent) ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ती है, तो ग्रिड के संतुलन को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। बिजली की मांग शाम को सबसे अधिक होती है जब लोग काम से घर लौटते हैं, लेकिन सौर ऊर्जा का उत्पादन दोपहर में चरम पर होता है और शाम को शून्य हो जाता है। इस उतार-चढ़ाव को ऊर्जा क्षेत्र में “डक कर्व” (Duck Curve) की घटना कहा जाता है।

इस उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए हमें बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) और पंप स्टोरेज परियोजनाओं (PSP) में बहुत बड़े निवेश की जरूरत है। यदि हम फालतू उत्पादित बिजली को स्टोर नहीं कर पाए, तो वह बेकार चली जाएगी और सौर ऊर्जा कंपनियों को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा। वर्तमान में बैटरी बनाने के लिए आवश्यक लिथियम और कोबाल्ट जैसे खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का दबदबा है, जिसके कारण भारत के लिए यह क्षमता जुटाना बहुत महंगा पड़ रहा है।

ग. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और कच्चे माल की निर्भरता:
यद्यपि हमने 172 GW की मॉड्यूल असेंबली क्षमता हासिल कर ली है, पर सच्चाई यह है कि सौर मूल्य श्रृंखला के सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती घटकों – पॉलीसिलिकॉन, इंगट्स और सिलिकॉन वेफर्स (Polysilicon, Ingots, Wafers) के लिए हम आज भी काफी हद तक चीनी आयातों पर निर्भर हैं। इस कच्चे माल के 80% से अधिक वैश्विक बाजार पर चीन का कब्जा है। जब तक हम देश के भीतर इन बुनियादी सामानों का उत्पादन नहीं बढ़ाएंगे, तब तक हमारा सौर उद्योग अंतरराष्ट्रीय तनावों और वैश्विक कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना रहेगा। सिलिकॉन से वेफर बनाने का काम भारी पूंजी और बहुत अधिक बिजली की मांग करता है, जिसके लिए सस्ती बिजली और उन्नत तकनीक का होना अनिवार्य है।

IV. विषय 3: मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) – पश्चिम एशिया में नई भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का उदय

1. विस्तृत परिचय और संदर्भ

7 अगस्त, 2026 को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने पवित्र शहर मक्का में एक ऐतिहासिक सुरक्षा और सैन्य सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसे मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) का नाम दिया गया है। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान आपको इस तरह के भू-राजनीतिक संरेखण को गहराई से समझना होगा, क्योंकि यह पश्चिम और दक्षिण एशिया के पुराने सुरक्षा समीकरणों में एक नया मोड़ है।

इस समझौते के तहत ये तीनों देश मिलकर सैन्य हथियार बनाएंगे, संयुक्त सैन्य अभ्यास करेंगे, आपस में खुफिया जानकारियां साझा करेंगे और पश्चिमी हिंद महासागर में गश्त लगाएंगे। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका सामूहिक रक्षा (Collective-Defence) क्लॉज है। इसका अर्थ यह है कि अगर इनमें से किसी भी एक देश पर बाहरी हमला होता है, तो अन्य देश आपसी सलाह से सैन्य मदद के लिए आगे आएंगे। यह समझौता सऊदी अरब द्वारा अपने रक्षा सहयोगियों का दायरा बढ़ाने, तुर्की द्वारा अपना क्षेत्रीय दबदबा मजबूत करने और पाकिस्तान द्वारा आर्थिक स्थिरता व आधुनिक सैन्य तकनीक पाने की कोशिशों का सीधा परिणाम है। यह नई सुरक्षा संरचना भारत के पश्चिमी पड़ोस में रणनीतिक चुनौतियां बढ़ा रही है।

2. विश्लेषणात्मक विवरण: त्रिपक्षीय गठबंधन के रणनीतिक निहितार्थ और भारत के लिए चुनौतियाँ

क. मक्का गठबंधन (MJDA) की रणनीतिक रूपरेखा:
यह समझौता तीन मुस्लिम बहुल देशों की अलग-अलग शक्तियों को एक मंच पर लाता है: सऊदी अरब के पास अकूत पैसा है, तुर्की के पास उन्नत सैन्य तकनीक (विशेष रूप से ड्रोन और युद्धपोत बनाने में) है, जबकि पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता से लैस एक बड़ी और अनुभवी सेना है। ये तीनों देश मिलकर रक्षा उत्पादन और सुरक्षा गश्त में सहयोग का रास्ता साफ कर रहे हैं। इसकी सामूहिक रक्षा धारा यह स्पष्ट संकेत देती है कि भविष्य में अरब सागर और फारस की खाड़ी के नौसैनिक इलाकों में एक नया गठबंधन अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश करेगा।

ख. भारत की ‘लिंक वेस्ट’ नीति और आईएमईसी (IMEC) पर प्रभाव:
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ‘लिंक वेस्ट’ (Link West) नीति के तहत सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ गहरे रणनीतिक व व्यापारिक रिश्ते बनाए हैं। हम इन देशों के साथ मिलकर ऊर्जा सुरक्षा और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। मक्का समझौता इस नीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। पाकिस्तान और तुर्की, जो हमेशा कश्मीर जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ बोलते रहे हैं, अब हमारे करीबी रणनीतिक साथी सऊदी अरब के साथ सीधे सैन्य गठबंधन में शामिल हो गए हैं। भारत को अपनी मजबूत द्विपक्षीय कूटनीति के बल पर यह सुनिश्चित करना होगा कि सऊदी अरब के साथ उसके आर्थिक संबंध इस नए सैन्य गठबंधन से प्रभावित न हों।

ग. समुद्री सुरक्षा और पश्चिमी हिंद महासागर की चुनौतियां:
पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और बाब-अल-मंदेब (Bab-el-Mandeb) जलमार्ग भारत के वैश्विक व्यापार और तेल आयात के लिए जीवन रेखा की तरह हैं। मक्का समझौते के तहत प्रस्तावित संयुक्त नौसैनिक गश्त इस क्षेत्र में भारतीय नौसेना की ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ (Net Security Provider) की भूमिका को सीधी टक्कर दे सकती है।

दूसरी बड़ी चिंता यह है कि सऊदी अरब के पैसों के दम पर तुर्की अपनी आधुनिक सैन्य तकनीक (जैसे प्रसिद्ध बेराकटार ड्रोन और आधुनिक युद्धपोत) पाकिस्तान को ट्रांसफर कर सकता है। इससे सीमा पर सैन्य संतुलन बिगड़ सकता है। इसका मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी नौसैनिक ताकत को और तेज करना होगा, ओमान और फ्रांस जैसे देशों के साथ समुद्री सुरक्षा समझौतों को मजबूत करना होगा और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (Atmanirbharata) की गति को और बढ़ाना होगा।

V. प्रारंभिक परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय अभ्यास प्रश्न (MCQs)

प्रश्न 1. मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और भारत में डिजिटल भुगतान प्रणालियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 को मूल रूप से पूरे भारत में सभी प्रकार के डिजिटल लेन-देन के लिए अनिवार्य शून्य एमडीआर (Zero MDR) नीति लागू करने के लिए ही बनाया गया था।
2. कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के तहत एमडीआर को बदलने या इसे सीमित करने की पूरी शक्ति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सौंपी गई है, और इसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
3. साल 2020 में लागू की गई शून्य एमडीआर नीति का मुख्य उद्देश्य नकदी पर निर्भरता को कम करना था, लेकिन इसकी वजह से बैंकों और फिनटेक कंपनियों को बिना किसी प्रत्यक्ष राजस्व के बुनियादी ढांचे का खर्च खुद उठाना पड़ा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 3
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (B) केवल 3

विस्तृत स्पष्टीकरण:

  • कथन 1 गलत है: आपको पता होना चाहिए कि भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 को मूल रूप से भारत में भुगतान प्रणालियों के नियमन और पर्यवेक्षण के लिए बनाया गया था, और इसके तहत रिजर्व बैंक को नियामक बनाया गया था। मूल कानून में शून्य एमडीआर का कोई जिक्र नहीं था। शून्य एमडीआर का प्रावधान बाद में वित्त अधिनियम, 2019 के जरिए इस कानून में धारा 10A जोड़कर पेश किया गया, जो 1 जनवरी, 2020 से लागू हुआ था।
  • कथन 2 गलत है: नया कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 केंद्र सरकार को अलग नहीं करता है। इसके विपरीत, यह केंद्र सरकार को यह शक्ति देता है कि वह आरबीआई की सलाह और सलाह-मशविरे से उन श्रेणियों, व्यापारियों या लेन-देन की सीमाओं को अधिसूचित करे जहाँ सीमित एमडीआर लगाया जा सके। इसलिए अंतिम निर्णय का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही है।
  • कथन 3 सही है: जनवरी 2020 में लागू की गई शून्य एमडीआर नीति का प्राथमिक उद्देश्य देश में डिजिटल लेन-देन को लोकप्रिय बनाना और नकदी पर निर्भरता घटाना था। लेकिन इससे बैंकों और फिनटेक कंपनियों के सामने राजस्व का संकट आ खड़ा हुआ क्योंकि उन्हें बिना किसी कमाई के सर्वर और सुरक्षा व्यवस्था का भारी खर्च उठाना पड़ रहा था। इसी समस्या के हल के लिए 2026 के विधेयक में बदलाव किए गए हैं।

अतः केवल तीसरा कथन सही होने के कारण विकल्प (B) सही उत्तर है।

प्रश्न 2. भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. स्वीकृत मॉडल और निर्माताओं की सूची (ALMM) आयातित सिलिकॉन वेफर्स पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी (सीमा शुल्क) लगाने के लिए शुरू किया गया एक वित्तीय उपाय है।
2. सौर विनिर्माण की पूरी श्रृंखला में भारत ने पॉलीसिलिकॉन और इंगट्स के उत्पादन में पूरी आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, जबकि हम केवल सौर मॉड्यूल की असेंबली के लिए विदेशों पर निर्भर हैं।
3. साल 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य COP26 में घोषित भारत के “पंचामृत” संकल्पों का हिस्सा था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (B) केवल 3

विस्तृत स्पष्टीकरण:

  • कथन 1 गलत है: ध्यान दें कि स्वीकृत मॉडल और निर्माताओं की सूची (ALMM) कोई टैक्स या सीमा शुल्क नहीं है, बल्कि यह एक गैर-टैरिफ प्रशासनिक उपाय है। इसे नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) जारी करता है ताकि सरकारी प्रोजेक्ट्स में केवल प्रमाणित निर्माताओं के उपकरणों का उपयोग सुनिश्चित करके घरेलू विनिर्माण को चीनी आयातों से बचाया जा सके।
  • कथन 2 गलत है: हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। भारत ने सौर मॉड्यूल असेंबली में तो अच्छी प्रगति की है (172 GW क्षमता के साथ), लेकिन मूल्य श्रृंखला के सबसे शुरुआती कच्चे माल – जैसे पॉलीसिलिकॉन, इंगट्स और सिलिकॉन वेफर्स के लिए हम लगभग पूरी तरह चीनी आयातों पर निर्भर हैं। भारत में इनका व्यावसायिक उत्पादन न के बराबर है।
  • कथन 3 सही है: ग्लासगो में हुए कॉप-26 (COP26) जलवायु सम्मेलन में भारत ने “पंचामृत” प्रतिज्ञाओं के तहत घोषणा की थी कि देश 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता को 500 GW तक बढ़ाएगा। अगस्त 2026 में 300.50 GW का मील का पत्थर पार करना इसी लक्ष्य की ओर बढ़ते कदमों को दर्शाता है।

इस प्रकार केवल कथन 3 सही है, जिससे विकल्प (B) सही विकल्प बनता है।

प्रश्न 3. बाब-अल-मंदेब (Bab-el-Mandeb) जलडमरूमध्य के भौगोलिक और भू-राजनीतिक महत्व का वर्णन करने वाला सबसे सटीक कथन कौन-सा है?
(A) यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और सऊदी अरब तथा ईरान से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात का मुख्य रास्ता है।
(B) यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और हिंद महासागर व भूमध्य सागर के बीच एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग का काम करता है।
(C) यह काला सागर को भूमध्य सागर से जोड़ता है और इसका नियंत्रण मोंट्रेक्स कन्वेंशन के तहत किया जाता है।
(D) यह दक्षिण चीन सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है और पूर्वी एशियाई देशों के व्यापार का प्रमुख गलियारा है।
सही उत्तर: (B)

विस्तृत स्पष्टीकरण:

  • विकल्प (A) गलत है: यह विवरण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और दुनिया के सबसे व्यस्त तेल निर्यात मार्गों में से एक है।
  • विकल्प (B) सही है: आपको मानचित्र पर यह देखना चाहिए कि बाब-अल-मंदेब यमन और अफ्रीका के हॉर्न (जिबूती और इरिट्रिया) के बीच स्थित एक संकीर्ण जलमार्ग है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से और अंततः हिंद महासागर से जोड़ता है। यह स्वेज नहर से होकर गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए मुख्य प्रवेश द्वार है, जो भारत के यूरोप व्यापार के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
  • विकल्प (C) गलत है: यह तुर्की के बोस्फोरस और डार्डानेलीस जलडमरूमध्य की बात कर रहा है, जो काला सागर को एजियन और भूमध्य सागर से जोड़ते हैं और मोंट्रेक्स संधि द्वारा विनियमित होते हैं।
  • विकल्प (D) गलत है: यह मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) का विवरण है, जो हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर से जोड़ता है।

अतः विकल्प (B) ही सबसे सही उत्तर है।

VI. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न और ढांचागत रूपरेखा (उत्तर प्रारूप)

मुख्य परीक्षा प्रश्न 1:
“यद्यपि शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Zero MDR) नीति ने भारत में डिजिटल भुगतानों को व्यापक रूप से अपनाने में सफलता प्रदान की, लेकिन इसने वित्तीय सेवा उद्योग के लिए गंभीर ढांचागत चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं।” कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। भारत में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के सतत मुद्रीकरण के लिए एक संतुलित रूपरेखा का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

अपनी मुख्य परीक्षा में इस उत्तर को प्रभावी ढंग से लिखने के लिए आपको इस ढांचे का उपयोग करना चाहिए:

  • भूमिका (लगभग 40 शब्द):
    • सबसे पहले एमडीआर (MDR) को परिभाषित कीजिए और साल 2020 में लागू की गई शून्य एमडीआर नीति का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
    • इसके बाद बताइए कि नया कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 किस तरह वित्तीय स्थिरता और वित्तीय समावेशन के बीच संतुलन बनाने का एक विधायी प्रयास है।
  • मुख्य भाग 1: शून्य एमडीआर नीति की सफलताएं (लगभग 60 शब्द):
    • दिखाइए कि कैसे इसने डिजिटल लेन-देने में भारी वृद्धि की और छोटे दुकानदारों (P2M) को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा।
    • बताइए कि इससे नोट छापने की सरकारी लागत घटी और कर अनुपालन (Tax Compliance) में सुधार हुआ।
    • यह भी रेखांकित कीजिए कि इस नीति ने भारत को डिजिटल भुगतान में दुनिया का लीडर बनाया।
  • मुख्य भाग 2: वित्तीय उद्योग के सामने खड़ी चुनौतियां (लगभग 80 शब्द):
    • दिखाइए कि कैसे भुगतान कंपनियों और बैंकों के लिए राजस्व का जरिया खत्म हो गया (Revenue Vacuum)।
    • स्पष्ट कीजिए कि तकनीकी बुनियादी ढांचे, सर्वर और सुरक्षा प्रणालियों के रखरखाव के लिए मिलने वाली सरकारी सब्सिडी काफी कम थी।
    • चर्चा कीजिए कि इसके कारण साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में फिनटेक नेटवर्क विस्तार के लिए जरूरी पूंजी की कमी हो रही है।
    • यह भी बताइए कि विदेशी कार्डों के मुकाबले भारत के स्वदेशी रुपे (RuPay) कार्डों को इससे नुकसान उठाना पड़ा।
  • मुख्य भाग 3: 2026 के संशोधन का विश्लेषण और आगे की राह (लगभग 70 शब्द):
    • विधेयक के नए नियमों को समझाइए, जो लेन-देन की राशि या व्यापारी के टर्नओवर के आधार पर वर्गीकृत और सीमित एमडीआर लगाने की अनुमति देते हैं।
    • एक संतुलित मॉडल का सुझाव दीजिए: 2,000 रुपये से कम के छोटे लेन-देन और छोटे व्यापारियों को पूरी तरह मुफ्त रखिए, जबकि बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर एक मामूली शुल्क लगाइए।
    • एक राष्ट्रीय डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना विकास कोष (DPI Development Fund) बनाने का प्रस्ताव दीजिए, जिसका उपयोग ग्रामीण डिजिटल साक्षरता और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने में किया जा सके।
  • निष्कर्ष (लगभग 30 शब्द):
    • उत्तर का समापन इस विचार के साथ कीजिए कि पूरी तरह सरकारी मदद (सब्सिडी) पर निर्भर रहने के बजाय एक बाजार-संचालित मॉडल अपनाना ही भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे के वैश्विक विस्तार और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए सही कदम है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न 2:
“गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता में 300 GW का आंकड़ा पार करना भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन वर्ष 2030 तक 500 GW के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ग्रिड एकीकरण और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करना आवश्यक है।” विवेचना कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

इस प्रश्न का उत्तर लिखते समय आपको निम्नलिखित संरचना का पालन करना चाहिए:

  • भूमिका (लगभग 40 शब्द):
    • अगस्त 2026 में भारत द्वारा हासिल की गई 300.50 GW की क्षमता (कुल स्थापित क्षमता का लगभग 45.2%) का उल्लेख करते हुए शुरुआत करें।
    • इस मील के पत्थर को सीधे तौर पर ग्लासगो कॉप-26 (COP26) में घोषित भारत के 500 GW के ‘पंचामृत’ लक्ष्य से जोड़िए।
  • मुख्य भाग 1: इस बदलाव को गति देने वाले प्रमुख कारक (लगभग 60 शब्द):
    • सफल सरकारी पहलों पर प्रकाश डालिए: जैसे सौर मॉड्यूल के लिए पीएलआई (PLI) योजना, घरेलू विनिर्माण को संरक्षण देने वाली ALMM सूची और कृषि क्षेत्र के सौरकरण के लिए पीएम-कुसुम योजना।
    • देशभर में बड़े सोलर पार्कों और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के तेजी से हो रहे विकास के बारे में बताइए।
  • मुख्य भाग 2: ग्रिड एकीकरण और ऊर्जा की अस्थिरता की चुनौतियां (लगभग 80 शब्द):
    • बताइए कि सौर और पवन ऊर्जा के अनिश्चित स्वभाव (दिन-रात और हवा के बहाव पर निर्भरता) के कारण ग्रिड संतुलन कैसे बिगड़ता है (डक कर्व की समस्या)।
    • मांग के चरम समय (शाम के वक्त) की जरूरत पूरी करने के लिए हमारे पास बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) और पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSP) की कमी को रेखांकित कीजिए।
    • राजस्थान और गुजरात जैसे उत्पादक राज्यों से मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाने के लिए पारेषण (Transmission) लाइनों की सीमाओं की चर्चा कीजिए।
  • मुख्य भाग 3: आपूर्ति श्रृंखला की निर्भरता और अन्य सीमाएं (लगभग 70 शब्द):
    • दिखाइए कि मॉड्यूल असेंबली में 172 GW की क्षमता के बावजूद, हम पॉलीसिलिकॉन, इंगट्स और सिलिकॉन वेफर्स जैसे बुनियादी कच्चे माल के लिए पूरी तरह चीनी आयातों पर निर्भर हैं।
    • सौर परियोजनाओं के लिए आवश्यक बड़े भू-भाग के कारण होने वाले स्थानीय भूमि-विवादों की चर्चा करें।
    • सूखे इलाकों में पैनलों को धोने के लिए पानी की कमी और पुराने सौर पैनलों के कचरे (PV Waste) के निपटान की नीतियों के अभाव का उल्लेख करें।
  • आगे की राह और निष्कर्ष (लगभग 50 शब्द):
    • समाधान सुझाइए: पीएलआई योजना के जरिए देश में ही सिलिकॉन वेफर और इंगट बनाने के लिए ज्यादा मदद दें, ग्रीन हाइड्रोजन व ग्रिड स्टोरेज पर फोकस करें, और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का विस्तार करें।
    • निष्कर्ष दीजिए कि इन ढांचागत सुधारों को अपनाकर ही भारत न केवल अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगा, बल्कि अपनी संप्रभु ऊर्जा सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर पाएगा।

मुख्य परीक्षा प्रश्न 3:
“मक्का संयुक्त रक्षा समझौता (MJDA) का उदय पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक सुरक्षा संरचनाओं में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। भारत की विदेश नीति और पश्चिमी हिंद महासागर में उसके समुद्री सुरक्षा हितों पर इस समझौते के रणनीतिक निहितार्थों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।” (15 अंक, 250 शब्द)

इस जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एक संतुलित उत्तर लिखने के लिए आपको इस दृष्टिकोण का पालन करना चाहिए:

  • भूमिका (लगभग 40 शब्द):
    • 7 अगस्त, 2026 को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच साइन किए गए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (MJDA) और इसके ‘सामूहिक रक्षा’ क्लॉज का परिचय देकर उत्तर शुरू करें।
    • बताइए कि यह गठबंधन भारत के रणनीतिक हितों वाले क्षेत्र में एक बिल्कुल नया समीकरण है।
  • मुख्य भाग 1: भारत की पश्चिम एशिया नीति पर पड़ने वाला रणनीतिक प्रभाव (लगभग 70 शब्द):
    • विश्लेषण कीजिए कि यह भारत की ‘लिंक वेस्ट’ नीति को कैसे प्रभावित कर सकता है, जो अब तक पाकिस्तान को दरकिनार कर सऊदी अरब और यूएई से मजबूत आर्थिक-रणनीतिक रिश्ते बनाने में सफल रही है।
    • दिखाइए कि कैसे पाकिस्तान और तुर्की (जो कश्मीर जैसे नाजुक मामलों पर हमेशा भारत विरोधी रहे हैं) अब हमारे अहम सहयोगी सऊदी अरब के साथ सीधे सैन्य गठबंधन में आ गए हैं।
    • चर्चा कीजिए कि यह नया गठबंधन भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) की सुरक्षा और इसके क्रियान्वयन को कैसे प्रभावित कर सकता है।
  • मुख्य भाग 2: समुद्री सुरक्षा और रक्षा तकनीक की चुनौतियां (लगभग 80 शब्द):
    • स्पष्ट कीजिए कि अरब सागर और पश्चिमी हिंद महासागर में मक्का समझौते के तहत प्रस्तावित साझा नौसैनिक गश्त, होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक रास्तों पर भारतीय नौसेना की ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ (Net Security Provider) की भूमिका को कैसे चुनौती दे सकती है।
    • यह भी समझाइए कि सऊदी वित्तपोषण के जरिए तुर्की के उन्नत सैन्य उपकरणों (जैसे बेराकटार ड्रोन और युद्धपोत) का पाकिस्तान को मिलना हमारे खिलाफ सैन्य संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
  • मुख्य भाग 3: भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया और कूटनीतिक रास्ते (लगभग 60 शब्द):
    • सऊदी अरब के साथ हमारे आर्थिक संबंधों का लाभ उठाने का सुझाव दें – भारत सऊदी तेल का एक बड़ा खरीदार और अहम टेक पार्टनर है; द्विपक्षीय बातचीत से रियाद के सामने अपनी सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से रखें।
    • हिंद महासागर क्षेत्र में हमारी अन्य समुद्री साझेदारियों (जैसे कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव, ओमान, यूएई और फ्रांस के साथ समझौते) को और अधिक मजबूत बनाने की वकालत करें।
    • देश के भीतर हथियारों के स्वदेशीकरण (आत्मनिर्भरता) और नौसेना के आधुनिकीकरण को तेज करने पर बल दें।
  • निष्कर्ष (लगभग 30 शब्द):
    • निष्कर्ष निकालिये कि भारत को इस नई भू-राजनीतिक सच्चाई का सामना व्यावहारिक और लचीली कूटनीति के साथ करना होगा, जहां द्विपक्षीय हितों को बचाए रखते हुए हिंद महासागर में अपनी स्वतंत्र रक्षात्मक और नौसैनिक स्थिति को बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है।

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