आगे की राह:

न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों के अनुरूप एक स्वायत्त और स्वतंत्र निकाय—राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (NTC)—का गठन किया जाना चाहिए। यह आयोग सभी न्यायाधिकरणों के बुनियादी ढांचे, नियुक्तियों और प्रशासनिक कार्यों की स्वतंत्र रूप से निगरानी कर सकेगा।


विषय 2: सामरिक बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिक्स — कैबिनेट द्वारा असम NH-15 परियोजना को मंजूरी

संदर्भ और पृष्ठभूमि: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने असम में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग 15 (NH-15) के बीहाटा चारियाली से तेजपुर खंड को फोर-लेन (चार-मार्गी) करने की मंजूरी दी है। लगभग ₹8,970 करोड़ की लागत वाली यह बुनियादी ढांचा परियोजना भारत की सीमा सुरक्षा तैयारियों और पूर्वोत्तर क्षेत्र के आर्थिक एकीकरण की दृष्टि से मील का पत्थर है।

सामरिक और सुरक्षा निहितार्थ:

1. LAC पर सैन्य तैयारी: NH-15 कॉरिडोर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन सीमा के समीप पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में तैनात भारतीय सैन्य चौकियों को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है। फोर-लेन बनने से भारी तोपखाने, बख्तरबंद वाहनों और सैनिकों की तीव्र एवं हर मौसम में आवाजाही आसान हो जाएगी।
2. ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को बल: यह परियोजना भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ भारत के व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क को सुदृढ़ करेगी, जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति के अनुकूल है।
3. आर्थिक गलियारे का विकास: बेहतर संपर्क से कृषि उत्पादों, चाय बागानों के माल और स्थानीय एमएसएमई उत्पादों को गुवाहाटी तथा देश के अन्य बाजारों तक पहुंचाने का समय और लागत कम होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

पर्यावरणीय चुनौतियां:

ब्रह्मपुत्र घाटी अत्यधिक बाढ़ प्रवण और नदी तट कटाव क्षेत्र है। इस क्षेत्र में राजमार्ग निर्माण के लिए उच्च स्तर की जलविज्ञानी इंजीनियरिंग और जलवायु-अनुकूल तकनीकों की आवश्यकता है ताकि बाढ़ का प्रवाह बाधित न हो और काजीरंगा एवं सोनई रूपाई जैसे संवेदनशील वन्यजीव गलियारों को नुकसान न पहुंचे।


विषय 3: कोलंबिया में 7.4 तीव्रता का भूकंप — भू-भौतिकीय कारण और वैश्विक आपदा प्रबंधन सीख

संदर्भ और पृष्ठभूमि: 10 अगस्त 2026 को पश्चिमी कोलंबिया (कैली और चोको क्षेत्र के समीप) में एक अत्यंत शक्तिशाली 7.4 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके बाद वहां आपातकाल की घोषणा कर दी गई। यह घटना सक्रिय विवर्तनिक सीमाओं पर स्थित देशों की संवेदनशीलता को दर्शाती है और भारत जैसे भूकंप प्रवण देशों के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) के संदर्भ में महत्वपूर्ण सबक प्रदान करती है।

भू-भौतिकीय तंत्र (Geophysical Mechanism):

कोलंबिया तीन मुख्य टेक्टोनिक प्लेटों—नाज़का प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट और कैरेबियाई प्लेट—के संलयन बिंदु पर स्थित है। प्रशांत महासागर की ‘रिंग ऑफ फायर’ के सक्रिय सबडक्शन जोन (Subduction Zone) में नाज़का प्लेट (महासागरीय प्लेट) दक्षिण अमेरिकी प्लेट (महाद्वीपीय प्लेट) के नीचे धंसती है। इस धंसने (सबडक्शन) के कारण पृथ्वी की परतों में भारी मात्रा में इलास्टिक स्ट्रेन (तनाव) संचित होता है, जो अचानक मुक्त होने पर तीव्र भूकंप का रूप ले लेता है।

नीतिगत सबक और सेंडाई फ्रेमवर्क:

1. भूकंपीय कोड का कड़ाई से पालन: कोलंबिया में हुई क्षति दर्शाती है कि अधिकांश मौतें भूकंप के कंपन से नहीं बल्कि कमजोर इंजीनियरिंग वाले कंक्रीट भवनों के ढहने से होती हैं। सुरक्षित भवन निर्माण मानकों का पालन अत्यंत आवश्यक है।
2. सेंडाई फ्रेमवर्क प्राथमिकताओं का कार्यान्वयन: आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) के अनुसार, देशों को आपदा के बाद राहत कार्य करने के बजाय अग्रगामी जोखिम प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। इसमें रियल-टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम, सामुदायिक मॉक ड्रिल और लचीले बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है.
3. भारत के लिए चेतावनी: भारत का लगभग 59% भूभाग मध्यम से तीव्र भूकंपीय क्षेत्रों (Zone III, IV, V) के अंतर्गत आता है। हिमालय क्षेत्र (Zone V), जहां भारतीय प्लेट सक्रिय रूप से यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, अत्यंत संवेदनशील है। दिल्ली-NCR, पूर्वोत्तर भारत और हिमालयी राज्यों में शहरी बुनियादी ढांचे का तत्काल ऑडिट किया जाना आवश्यक है।


पाठ्यक्रम संबद्धता तालिका (UPSC & MPSC)

विषयUPSC जीएस पेपर संबद्धताMPSC पाठ्यक्रम संबद्धता
न्यायाधिकरण विधेयक, 2026GS 2: राजव्यवस्था एवं शासन (संवैधानिक एवं अर्द्ध-न्यायिक निकाय)GS 2: संविधान, कानून एवं न्यायिक प्रणाली
असम NH-15 परियोजनाGS 3: बुनियादी ढांचा (सड़क), आंतरिक सुरक्षा (सीमावर्ती बुनियादी ढांचा)GS 4: अर्थव्यवस्था एवं विकास, बुनियादी ढांचा लॉजिस्टिक्स
कोलंबिया भूकंप सीखGS 1: भौतिक भूगोल (महत्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएं); GS 3: आपदा प्रबंधनGS 1: भूगोल एवं पारिस्थितिकी; GS 3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास

सराव पूर्व परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

प्रश्न. भारत में न्यायाधिकरणों (Tribunals) से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 323A के तहत न्यायाधिकरणों की स्थापना संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों द्वारा सार्वजनिक सेवा मामलों के लिए की जा सकती है।
2. अनुच्छेद 323B के तहत स्थापित न्यायाधिकरण अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के विशेष अनुमति क्षेत्रधिकार को छोड़कर अन्य सभी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को पूर्णतः बाहर कर सकते हैं।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने एल. चंद्र कुमार (1997) मामले में न्यायाधिकरणों के फैसलों पर उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226/227) द्वारा न्यायिक समीक्षा के अधिकार को बाहर करने वाले प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 3
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)
विस्तृत स्पष्टीकरण:
* कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 323A के तहत प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की स्थापना केवल संसद द्वारा की जा सकती है, राज्य विधानसभाओं द्वारा नहीं। हालांकि, अनुच्छेद 323B के तहत अन्य मामलों (जैसे कर, श्रम, भूमि सुधार आदि) के लिए न्यायाधिकरणों की स्थापना संसद और राज्य विधायिका दोनों द्वारा अपने-अपने विधायी अधिकार क्षेत्र के तहत की जा सकती है।
* कथन 2 गलत है: यद्यपि मूल प्रावधानों में उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को बाहर करने की शक्ति दी गई थी, परंतु सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के बाद इसे बदल दिया गया है। न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, जिसे छीना नहीं जा सकता।
* कथन 3 सही है: एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) मामले में सात न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया कि न्यायाधिकरणों के फैसलों के खिलाफ संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष अपील की जा सकती है और न्यायिक समीक्षा का अधिकार अक्षुण्ण रहेगा। अतः केवल कथन 3 सही है।


मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “यद्यपि सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक बुनियादी ढांचे का निर्माण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक आवश्यक अनिवार्यता है, लेकिन इसे पर्यावरण संवेदनशीलता के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।” पूर्वोत्तर भारत के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हालिया परिवहन गलियारा परियोजनाओं के विशेष संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर संरचना प्रारूप:
* प्रस्तावना: पूर्वोत्तर भारत की सामरिक भौगोलिक स्थिति (5 देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा करना) को रेखांकित करें तथा हाल ही में स्वीकृत राजमार्ग परियोजनाओं (जैसे NH-15 फोर-लेन) के सुरक्षा महत्व और पर्यावरण संवेदनशीलता के मध्य द्वंद्व का परिचय दें।
* सामरिक सुरक्षा अनिवार्यताएं (सुरक्षा पक्ष):
– चीन सीमा (LAC) के साथ कनेक्टिविटी को सुदृढ़ कर भारी सैन्य साजो-सामान और तोपखाने की तीव्र तैनाती सुनिश्चित करना।
– अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों में रसद आपूर्ति और सैन्य गश्ती को सुगम बनाना।
– पूर्वोत्तर राज्यों का मुख्य भूमि से भौतिक अलगाव समाप्त करना और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत उप-क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना।
* पारिस्थितिक चिंताएं और चुनौतियां (पर्यावरण पक्ष):
– पूर्वोत्तर भारत जैव विविधता का वैश्विक हॉटस्पॉट है। भारी बुनियादी ढांचा निर्माण से वनों का विनाश होता है और वन्यजीव गलियारे खंडित होते हैं।
– यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र V (Zone V) के अंतर्गत आता है, जिससे भूस्खलन और सड़कों के धंसने का खतरा बना रहता है।
– अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ों की कटाई करने से जल प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, जिससे मानसून के दौरान अचानक विनाशकारी बाढ़ आती है।
* समाधान एवं आगे की राह:
– निर्माण से पूर्व व्यापक और पारदर्शी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) सुनिश्चित करना।
– हरित इंजीनियरिंग (Green Engineering) को बढ़ावा देना, जैसे बायो-इंजीनियरिंग विधियों से पहाड़ों को स्थिर करना और वन्यजीवों के लिए ओवरपास/अंडरपास का निर्माण करना।
– आपदा प्रतिरोधी निर्माण तकनीकों का उपयोग और भू-सटीक सेटेलाइट मैपिंग के जरिए निर्माण स्थलों का चयन।
* निष्कर्ष: संक्षेप में कहें कि वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा का आशय केवल भौतिक सीमाओं की रक्षा करना नहीं है, बल्कि देश की जल और पारिस्थितिकी सुरक्षा को अक्षुण्ण रखना भी है। सतत और संतुलित विकास ही एकमात्र व्यवहार्य मार्ग है।

दैनिक समसामयिकी विश्लेषण में आपका स्वागत है। आज हम संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की परीक्षाओं के दृष्टिकोण से तीन अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे: लोकसभा द्वारा पारित न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026, असम में सामरिक सीमा संपर्क को बढ़ावा देने वाली ₹8,970 करोड़ की NH-15 परियोजना, और कोलंबिया में आए विनाशकारी 7.4 तीव्रता के भूकंप से भू-भौतिकीय और आपदा प्रबंधन संबंधी सीख।


विषय 1: न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 — न्यायिक स्वतंत्रता बनाम कार्यपालिका का अधिकार

संदर्भ और पृष्ठभूमि: हाल ही में लोकसभा ने न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 को पारित किया है। इस विधेयक का उद्देश्य देश में कार्यरत विभिन्न वैधानिक न्यायाधिकरणों (Tribunals) के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल और प्रशासनिक ढांचे में सुधार करना है। भारत में न्यायाधिकरणों की स्थापना 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भाग XIV-A जोड़कर की गई थी, जिसमें अनुच्छेद 323A (प्रशासनिक न्यायाधिकरण) और अनुच्छेद 323B (अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरण) शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों के बोझ को कम करना और विशेष क्षेत्रों में विशेषज्ञ निर्णय उपलब्ध कराना था। हालांकि, समय-समय पर न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली न्यायिक स्वतंत्रता और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के उल्लंघन को लेकर विवादों में रही है।

विधेयक, 2026 की प्रमुख विशेषताएं:

  • स्वतंत्र खोज-सह-चयन समिति: विधेयक में सभी न्यायाधिकरणों के लिए एक समान चयन समिति का प्रावधान किया गया है, जिसके अध्यक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे। इससे नियुक्तियों में कार्यपालिका का एकतरफा नियंत्रण कम होगा।
  • निश्चित कार्यकाल: सदस्यों और अध्यक्षों के लिए 4 वर्ष का कार्यकाल तय किया गया है, जिसमें अध्यक्ष के लिए अधिकतम आयु सीमा 70 वर्ष और सदस्यों के लिए 67 वर्ष निर्धारित की गई है।
  • न्यायाधिकरणों का विलय: कई अप्रसांगिक या ओवरलैप करने वाले न्यायाधिकरणों को समाप्त या विलय कर उनके अधिकारों को वापस पारंपरिक वाणिज्यिक न्यायालयों या उच्च न्यायालयों को सौंपने का निर्णय लिया गया है।

संवैधानिक और प्रशासनिक चुनौतियां:

1. शक्ति पृथक्करण का उल्लंघन: संविधान का अनुच्छेद 50 न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का निर्देश देता है। आलोचकों का मानना है कि न्यायाधिकरणों को संबंधित मंत्रालयों के प्रशासनिक नियंत्रण में रखने से उनकी निष्पक्षता प्रभावित होती है, क्योंकि कई मामलों में सरकार स्वयं एक पक्ष होती है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय: एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) और मद्रास बार एसोसिएशन (2020) के ऐतिहासिक मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण उच्च न्यायालयों के न्यायिक समीक्षा (अनुच्छेद 226/227) के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।
3. रिक्तियों का संकट: भारतीय न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों के खाली पदों के कारण न्याय निर्णय में अत्यधिक देरी होती है, जिससे त्वरित न्याय की मूल अवधारणा ही समाप्त हो जाती है।

आगे की राह:

न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों के अनुरूप एक स्वायत्त और स्वतंत्र निकाय—राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (NTC)—का गठन किया जाना चाहिए। यह आयोग सभी न्यायाधिकरणों के बुनियादी ढांचे, नियुक्तियों और प्रशासनिक कार्यों की स्वतंत्र रूप से निगरानी कर सकेगा।


विषय 2: सामरिक बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिक्स — कैबिनेट द्वारा असम NH-15 परियोजना को मंजूरी

संदर्भ और पृष्ठभूमि: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने असम में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग 15 (NH-15) के बीहाटा चारियाली से तेजपुर खंड को फोर-लेन (चार-मार्गी) करने की मंजूरी दी है। लगभग ₹8,970 करोड़ की लागत वाली यह बुनियादी ढांचा परियोजना भारत की सीमा सुरक्षा तैयारियों और पूर्वोत्तर क्षेत्र के आर्थिक एकीकरण की दृष्टि से मील का पत्थर है।

सामरिक और सुरक्षा निहितार्थ:

1. LAC पर सैन्य तैयारी: NH-15 कॉरिडोर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन सीमा के समीप पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में तैनात भारतीय सैन्य चौकियों को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है। फोर-लेन बनने से भारी तोपखाने, बख्तरबंद वाहनों और सैनिकों की तीव्र एवं हर मौसम में आवाजाही आसान हो जाएगी।
2. ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को बल: यह परियोजना भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ भारत के व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क को सुदृढ़ करेगी, जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति के अनुकूल है।
3. आर्थिक गलियारे का विकास: बेहतर संपर्क से कृषि उत्पादों, चाय बागानों के माल और स्थानीय एमएसएमई उत्पादों को गुवाहाटी तथा देश के अन्य बाजारों तक पहुंचाने का समय और लागत कम होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

पर्यावरणीय चुनौतियां:

ब्रह्मपुत्र घाटी अत्यधिक बाढ़ प्रवण और नदी तट कटाव क्षेत्र है। इस क्षेत्र में राजमार्ग निर्माण के लिए उच्च स्तर की जलविज्ञानी इंजीनियरिंग और जलवायु-अनुकूल तकनीकों की आवश्यकता है ताकि बाढ़ का प्रवाह बाधित न हो और काजीरंगा एवं सोनई रूपाई जैसे संवेदनशील वन्यजीव गलियारों को नुकसान न पहुंचे।


विषय 3: कोलंबिया में 7.4 तीव्रता का भूकंप — भू-भौतिकीय कारण और वैश्विक आपदा प्रबंधन सीख

संदर्भ और पृष्ठभूमि: 10 अगस्त 2026 को पश्चिमी कोलंबिया (कैली और चोको क्षेत्र के समीप) में एक अत्यंत शक्तिशाली 7.4 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके बाद वहां आपातकाल की घोषणा कर दी गई। यह घटना सक्रिय विवर्तनिक सीमाओं पर स्थित देशों की संवेदनशीलता को दर्शाती है और भारत जैसे भूकंप प्रवण देशों के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) के संदर्भ में महत्वपूर्ण सबक प्रदान करती है।

भू-भौतिकीय तंत्र (Geophysical Mechanism):

कोलंबिया तीन मुख्य टेक्टोनिक प्लेटों—नाज़का प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट और कैरेबियाई प्लेट—के संलयन बिंदु पर स्थित है। प्रशांत महासागर की ‘रिंग ऑफ फायर’ के सक्रिय सबडक्शन जोन (Subduction Zone) में नाज़का प्लेट (महासागरीय प्लेट) दक्षिण अमेरिकी प्लेट (महाद्वीपीय प्लेट) के नीचे धंसती है। इस धंसने (सबडक्शन) के कारण पृथ्वी की परतों में भारी मात्रा में इलास्टिक स्ट्रेन (तनाव) संचित होता है, जो अचानक मुक्त होने पर तीव्र भूकंप का रूप ले लेता है।

नीतिगत सबक और सेंडाई फ्रेमवर्क:

1. भूकंपीय कोड का कड़ाई से पालन: कोलंबिया में हुई क्षति दर्शाती है कि अधिकांश मौतें भूकंप के कंपन से नहीं बल्कि कमजोर इंजीनियरिंग वाले कंक्रीट भवनों के ढहने से होती हैं। सुरक्षित भवन निर्माण मानकों का पालन अत्यंत आवश्यक है।
2. सेंडाई फ्रेमवर्क प्राथमिकताओं का कार्यान्वयन: आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) के अनुसार, देशों को आपदा के बाद राहत कार्य करने के बजाय अग्रगामी जोखिम प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। इसमें रियल-टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम, सामुदायिक मॉक ड्रिल और लचीले बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है.
3. भारत के लिए चेतावनी: भारत का लगभग 59% भूभाग मध्यम से तीव्र भूकंपीय क्षेत्रों (Zone III, IV, V) के अंतर्गत आता है। हिमालय क्षेत्र (Zone V), जहां भारतीय प्लेट सक्रिय रूप से यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, अत्यंत संवेदनशील है। दिल्ली-NCR, पूर्वोत्तर भारत और हिमालयी राज्यों में शहरी बुनियादी ढांचे का तत्काल ऑडिट किया जाना आवश्यक है।


पाठ्यक्रम संबद्धता तालिका (UPSC & MPSC)

विषयUPSC जीएस पेपर संबद्धताMPSC पाठ्यक्रम संबद्धता
न्यायाधिकरण विधेयक, 2026GS 2: राजव्यवस्था एवं शासन (संवैधानिक एवं अर्द्ध-न्यायिक निकाय)GS 2: संविधान, कानून एवं न्यायिक प्रणाली
असम NH-15 परियोजनाGS 3: बुनियादी ढांचा (सड़क), आंतरिक सुरक्षा (सीमावर्ती बुनियादी ढांचा)GS 4: अर्थव्यवस्था एवं विकास, बुनियादी ढांचा लॉजिस्टिक्स
कोलंबिया भूकंप सीखGS 1: भौतिक भूगोल (महत्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएं); GS 3: आपदा प्रबंधनGS 1: भूगोल एवं पारिस्थितिकी; GS 3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास

सराव पूर्व परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

प्रश्न. भारत में न्यायाधिकरणों (Tribunals) से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 323A के तहत न्यायाधिकरणों की स्थापना संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों द्वारा सार्वजनिक सेवा मामलों के लिए की जा सकती है।
2. अनुच्छेद 323B के तहत स्थापित न्यायाधिकरण अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के विशेष अनुमति क्षेत्रधिकार को छोड़कर अन्य सभी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को पूर्णतः बाहर कर सकते हैं।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने एल. चंद्र कुमार (1997) मामले में न्यायाधिकरणों के फैसलों पर उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226/227) द्वारा न्यायिक समीक्षा के अधिकार को बाहर करने वाले प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 3
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)
विस्तृत स्पष्टीकरण:
* कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 323A के तहत प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की स्थापना केवल संसद द्वारा की जा सकती है, राज्य विधानसभाओं द्वारा नहीं। हालांकि, अनुच्छेद 323B के तहत अन्य मामलों (जैसे कर, श्रम, भूमि सुधार आदि) के लिए न्यायाधिकरणों की स्थापना संसद और राज्य विधायिका दोनों द्वारा अपने-अपने विधायी अधिकार क्षेत्र के तहत की जा सकती है।
* कथन 2 गलत है: यद्यपि मूल प्रावधानों में उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को बाहर करने की शक्ति दी गई थी, परंतु सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के बाद इसे बदल दिया गया है। न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, जिसे छीना नहीं जा सकता।
* कथन 3 सही है: एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997) मामले में सात न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया कि न्यायाधिकरणों के फैसलों के खिलाफ संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष अपील की जा सकती है और न्यायिक समीक्षा का अधिकार अक्षुण्ण रहेगा। अतः केवल कथन 3 सही है।


मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “यद्यपि सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक बुनियादी ढांचे का निर्माण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक आवश्यक अनिवार्यता है, लेकिन इसे पर्यावरण संवेदनशीलता के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।” पूर्वोत्तर भारत के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हालिया परिवहन गलियारा परियोजनाओं के विशेष संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर संरचना प्रारूप:
* प्रस्तावना: पूर्वोत्तर भारत की सामरिक भौगोलिक स्थिति (5 देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा करना) को रेखांकित करें तथा हाल ही में स्वीकृत राजमार्ग परियोजनाओं (जैसे NH-15 फोर-लेन) के सुरक्षा महत्व और पर्यावरण संवेदनशीलता के मध्य द्वंद्व का परिचय दें।
* सामरिक सुरक्षा अनिवार्यताएं (सुरक्षा पक्ष):
– चीन सीमा (LAC) के साथ कनेक्टिविटी को सुदृढ़ कर भारी सैन्य साजो-सामान और तोपखाने की तीव्र तैनाती सुनिश्चित करना।
– अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों में रसद आपूर्ति और सैन्य गश्ती को सुगम बनाना।
– पूर्वोत्तर राज्यों का मुख्य भूमि से भौतिक अलगाव समाप्त करना और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत उप-क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना।
* पारिस्थितिक चिंताएं और चुनौतियां (पर्यावरण पक्ष):
– पूर्वोत्तर भारत जैव विविधता का वैश्विक हॉटस्पॉट है। भारी बुनियादी ढांचा निर्माण से वनों का विनाश होता है और वन्यजीव गलियारे खंडित होते हैं।
– यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र V (Zone V) के अंतर्गत आता है, जिससे भूस्खलन और सड़कों के धंसने का खतरा बना रहता है।
– अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ों की कटाई करने से जल प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, जिससे मानसून के दौरान अचानक विनाशकारी बाढ़ आती है।
* समाधान एवं आगे की राह:
– निर्माण से पूर्व व्यापक और पारदर्शी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) सुनिश्चित करना।
– हरित इंजीनियरिंग (Green Engineering) को बढ़ावा देना, जैसे बायो-इंजीनियरिंग विधियों से पहाड़ों को स्थिर करना और वन्यजीवों के लिए ओवरपास/अंडरपास का निर्माण करना।
– आपदा प्रतिरोधी निर्माण तकनीकों का उपयोग और भू-सटीक सेटेलाइट मैपिंग के जरिए निर्माण स्थलों का चयन।
* निष्कर्ष: संक्षेप में कहें कि वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा का आशय केवल भौतिक सीमाओं की रक्षा करना नहीं है, बल्कि देश की जल और पारिस्थितिकी सुरक्षा को अक्षुण्ण रखना भी है। सतत और संतुलित विकास ही एकमात्र व्यवहार्य मार्ग है।

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