दैनिक समसामयिकी (10 अगस्त 2026): भारत की 2015 मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) की समीक्षा और आर्थिक प्रभाव – परीक्षा विशेष विश्लेषण
चर्चा में क्यों? हाल ही में आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) द्वारा पुष्टि की गई है कि वर्ष 2015 की मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) की समीक्षा अंतिम चरण में है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में गिरते प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह को पुनर्जीवित करना, वैश्विक निवेशकों के आत्मविश्वास को बहाल करना और विदेशों में तेजी से बढ़ रहे भारतीय निवेशों (Outbound Investment) के हितों की सुरक्षा करना है। वित्तीय वर्ष 2026 में भारत में शुद्ध एफडीआई (FDI) प्रवाह घटकर $7.65 बिलियन रह गया है, जो एक समय लगभग $40 बिलियन प्रति वर्ष से अधिक हुआ करता था। यह तेज गिरावट नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, जिसके कारण द्विपक्षीय निवेश नीतियों में बड़े बदलावों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
1. विस्तृत संदर्भ और पृष्ठभूमि (Detailed Context & Background)
द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (Bilateral Investment Treaties – BITs) दो देशों के बीच पारस्परिक निवेश को बढ़ावा देने और संरक्षण प्रदान करने के लिए किए गए समझौते होते हैं। भारत ने आर्थिक उदारीकरण (1991 के सुधारों) के बाद अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक पूंजी के लिए खोला। भारत का पहला बीआईटी वर्ष 1994 में यूनाइटेड किंगडम (UK) के साथ हस्ताक्षरित किया गया था, जो 1993 के मॉडल बीआईटी पर आधारित था। 1993/2003 के मॉडल समझौतों में निवेशकों को व्यापक अधिकार दिए गए थे, जिन्हें ‘परिसंपत्ति-आधारित’ (Asset-based) माना जाता था। इसके तहत विदेशी निवेशकों को किसी भी प्रकार की संपत्ति (जैसे शेयर, ऋण, बौद्धिक संपदा अधिकार और सद्भावना) पर संरक्षण मिलता था। साथ ही, इन संधियों में ‘सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र’ (Most Favoured Nation – MFN) और ‘निष्पक्ष और न्यायसंगत व्यवहार’ (Fair and Equitable Treatment – FET) जैसे उदार क्लॉज शामिल थे। इसके अलावा, विदेशी निवेशकों को भारतीय अदालतों के चक्कर काटे बिना सीधे अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवाद निपटान (ISDS) मंच पर जाने की छूट थी।
हालांकि, वर्ष 2011 में एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब ‘व्हाइट इंडस्ट्रीज बनाम भारत सरकार’ (White Industries vs. Republic of India) मामले में एक ऑस्ट्रेलियाई कोयला खनन कंपनी ने भारत सरकार के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता का मुकदमा जीत लिया। व्हाइट इंडस्ट्रीज ने भारत-ऑस्ट्रेलिया बीआईटी में शामिल MFN क्लॉज का उपयोग करके भारत-कुवैत बीआईटी में मौजूद एक अधिक अनुकूल प्रावधान (समयबद्ध अदालती निपटान) को अपने मामले में लागू कर लिया। इस मुकदमे के बाद भारत सरकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकदमों की बाढ़ आ गई। वोडाफोन और केर्न एनर्जी (Cairn Energy) जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत सरकार द्वारा किए गए भूतलक्षी कर (Retrospective Taxation) संशोधनों को चुनौती दी, जबकि अन्य कंपनियों ने 2G स्पेक्ट्रम और देवास-एंट्रिक्स (Devas-Antrix) एस-बैंड स्पेक्ट्रम समझौतों को रद्द किए जाने के खिलाफ मुकदमे दायर किए। इन मुकदमों ने भारत सरकार को भारी वित्तीय जोखिम और नीतिगत संप्रभुता के संकट में डाल दिया।
इन मुकदमों से उत्पन्न दबाव के प्रत्युत्तर में, भारत सरकार ने वर्ष 2015 में एक नया रक्षात्मक मॉडल बीआईटी (Model BIT 2015) तैयार किया, जिसे 2016 में लागू किया गया। 2015 मॉडल का प्राथमिक उद्देश्य राज्य की नियामक संप्रभुता और नीतिगत स्वायत्तता की रक्षा करना था। इस मॉडल के तहत, भारत ने अपनी 70 से अधिक पुरानी निवेश संधियों को एकतरफा रूप से समाप्त कर दिया और साझेदार देशों से नए मॉडल के आधार पर बातचीत शुरू करने को कहा। 2015 मॉडल ने निवेश की परिभाषा को ‘उद्यम-आधारित’ (Enterprise-based) बनाकर संकीर्ण कर दिया, कराधान (Taxation) से संबंधित सभी मामलों को संधि के दायरे से बाहर कर दिया, MFN क्लॉज को पूरी तरह से हटा दिया और निवेशकों के लिए घरेलू न्यायिक उपायों को कम से कम 5 वर्षों तक आजमाने की कड़ी शर्त (Exhaustion of Local Remedies) रख दी।
यद्यपि 2015 मॉडल ने भारत सरकार को अवांछित अंतरराष्ट्रीय कानूनी मुकदमों से बचाया, लेकिन इसके अत्यधिक सुरक्षात्मक और कड़े नियमों के कारण भारत वैश्विक स्तर पर नए निवेश समझौते करने में विफल रहा। यूरोपीय संघ (EU), संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और यूनाइटेड किंगडम (UK) जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों ने इस कड़े विवाद समाधान तंत्र को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिससे भारत की द्विपक्षीय व्यापार और निवेश वार्ताएं (FTAs) ठप हो गईं। वर्ष 2026 की वर्तमान समीक्षा इसी गतिरोध को समाप्त करने, एफडीआई में आई भारी गिरावट को रोकने और वैश्विक स्तर पर पूंजी निवेश कर रही भारतीय कंपनियों के हितों की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
2. विश्लेषणात्मक विश्लेषण (Analytical Breakdown)
भारत की 2015 मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) की समीक्षा और इसके आर्थिक प्रभावों का गहन विश्लेषणात्मक विवरण निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:
(i) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में गिरावट और नीतिगत चिंताएं: वित्त वर्ष 2026 में भारत का शुद्ध एफडीआई प्रवाह गिरकर $7.65 बिलियन रह गया, जो देश की विनिर्माण और बुनियादी ढांचागत महत्वाकांक्षाओं (जैसे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘विकसित भारत 2047’) के लिए एक बड़ा झटका है। वैश्विक निवेशक कानूनी सुरक्षा और विवादों के त्वरित समाधान को प्राथमिकता देते हैं। 2015 के मॉडल में मजबूत निवेशक संरक्षण की कमी ने वैश्विक स्तर पर यह संदेश दिया कि भारत का निवेश माहौल अत्यधिक अनिश्चित और सरकार के पक्ष में झुका हुआ है। इसके परिणामस्वरूप, विदेशी निवेश का रुख वियतनाम, इंडोनेशिया और मैक्सिको जैसे देशों की ओर हो गया, जिनके पास अधिक संतुलित और अनुकूल निवेश संधियां मौजूद हैं।
(ii) विवाद समाधान तंत्र (ISDS) और पांच वर्षीय स्थानीय उपचारों की अनिवार्यता: 2015 मॉडल बीआईटी के अनुच्छेद 15 के तहत विदेशी निवेशक के लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता निकाय में जाने से पहले कम से कम 5 वर्षों तक भारत के घरेलू न्यायिक और प्रशासनिक निकायों के पास न्याय की गुहार लगाना अनिवार्य है। भारत में अदालतों में लंबित मामलों (Pending Cases) की संख्या और न्यायिक देरी जगजाहिर है। विदेशी निवेशकों के लिए यह प्रावधान ‘न्याय में देरी यानी न्याय से इनकार’ (Justice delayed is justice denied) के समान है। वर्तमान 2026 की समीक्षा में सरकार इस अवधि को घटाकर 2 से 3 वर्ष करने या कुछ विशिष्ट परिस्थितियों (जैसे बुनियादी मानवाधिकारों के उल्लंघन या न्याय से स्पष्ट इनकार) में सीधे मध्यस्थता की अनुमति देने पर विचार कर रही है ताकि निवेशकों को कानूनी सुरक्षा की गारंटी मिल सके।
(iii) उद्यम-आधारित बनाम परिसंपत्ति-आधारित निवेश परिभाषा: 1993 के मॉडल की परिसंपत्ति-आधारित परिभाषा का दुरुपयोग करके शेल (Shell) कंपनियां और पोर्टफोलियो निवेशक भी संरक्षण का दावा करते थे, जिसे रोकने के लिए 2015 मॉडल में केवल ‘उद्यम-आधारित’ वास्तविक व्यावसायिक गतिविधियों को ही निवेश माना गया। किंतु इससे वास्तविक विदेशी निवेशकों के पोर्टफोलियो निवेश, ऋण प्रतिभूतियां और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) असुरक्षित हो गए। समीक्षा के तहत अब एक संतुलित ‘हाइब्रिड मॉडल’ अपनाने का प्रस्ताव है, जो संदिग्ध शेल कंपनियों को बाहर रखते हुए वास्तविक बौद्धिक संपदा और आधुनिक ऋण उपकरणों को सुरक्षा प्रदान करेगा।
(iv) आउटबाउंड भारतीय निवेश (ODI) की सुरक्षा की आवश्यकता: पिछले दो दशकों में भारत केवल पूंजी प्राप्त करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि एक महत्वपूर्ण पूंजी निर्यातक (Capital Exporter) देश बनकर उभरा है। भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियां (जैसे टाटा, रिलायंस, इंफोसिस, बिड़ला आदि) यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। यदि भारत अन्य देशों के साथ अत्यंत सख्त और एकतरफा सुरक्षात्मक बीआईटी पर हस्ताक्षर करने की जिद करता है, तो पारस्परिक आधार पर भारतीय निवेशकों को भी विदेशों में कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी। अतः, भारत के आर्थिक राष्ट्रवाद और वैश्विक विस्तार के हितों में एक संतुलित बीआईटी नीति की आवश्यकता है जो दोनों तरफ के निवेशकों के अधिकारों की रक्षा करे।
(v) संप्रभुता बनाम निवेशक सुरक्षा का नाजुक संतुलन: लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में भारत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और कराधान जैसे विषयों पर कानून बनाने का संप्रभु अधिकार है। 2015 के मॉडल में सरकार ने इन क्षेत्रों को पूरी तरह से बीआईटी के दायरे से बाहर रख दिया था। यद्यपि संप्रभु नियामक स्वायत्तता (Sovereign Regulatory Autonomy) आवश्यक है, लेकिन इसकी आड़ में किए जाने वाले मनमाने नीतिगत बदलाव विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित करते हैं। संशोधित मॉडल में इन संप्रभु अपवादों को अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता के साथ परिभाषित किया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि इनका उपयोग निवेशकों के साथ भेदभाव या प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष जब्ती (Expropriation) के लिए न किया जाए।
(vi) कर (Taxation) मामलों का बहिष्करण और नीतिगत विवाद: वोडाफोन और केर्न एनर्जी के मामलों के बाद भारत ने 2015 मॉडल में कर संबंधी सभी विवादों को पूरी तरह से संधि के दायरे से बाहर कर दिया था। हालांकि इससे सरकार को कर संप्रभुता मिला, लेकिन निवेशकों में यह डर बैठ गया कि सरकार मनमाने ढंग से भूतलक्षी कर लगा सकती है और उनके पास कोई अंतरराष्ट्रीय कानूनी उपचार उपलब्ध नहीं होगा। वर्तमान समीक्षा के दौरान कर विवादों के लिए ‘सद्भावना परीक्षण’ (Good Faith Test) जैसी व्यवस्था को शामिल करने पर विचार किया जा रहा है, जिससे कर चोरी रोकने के साथ-साथ वैध निवेशकों को सुरक्षा दी जा सके।
(vii) वैश्विक व्यापार समझौतों (FTAs) को गति देना: भारत वर्तमान में यूरोपीय संघ (EU) और यूनाइटेड किंगडम (UK) के साथ व्यापक मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) पर बातचीत कर रहा है। इन दोनों पक्षों ने एफटीए पर हस्ताक्षर करने के लिए एक आधुनिक और न्यायसंगत निवेश संरक्षण समझौते (BIT) को अनिवार्य शर्त बनाया है। 2015 के मॉडल बीआईटी के गतिरोध के कारण ये व्यापार समझौते कई वर्षों से लटके हुए हैं। 2015 के मॉडल में संशोधन इन महत्वपूर्ण समझौतों के बंद दरवाजे खोल सकता है, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains – GVCs) में एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
नीचे दी गई तालिका भारत की निवेश संधि नीति के विकास और प्रस्तावित परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है:
| मूल्यांकन के मापदंड | 1993/2003 मॉडल बीआईटी | 2015 मॉडल बीआईटी | प्रस्तावित 2026 समीक्षा |
|---|---|---|---|
| निवेश की परिभाषा | परिसंपत्ति-आधारित (Asset-based) – अत्यंत व्यापक, जिसमें शेल कंपनियां भी शामिल थीं। | उद्यम-आधारित (Enterprise-based) – संकीर्ण, केवल वास्तविक व्यवसाय संचालन तक सीमित। | हाइब्रिड मॉडल – शेल कंपनियों को रोकते हुए बौद्धिक संपदा और आधुनिक वित्तीय परिसंपत्तियों को सुरक्षा। |
| विवाद समाधान (ISDS) | सीधे अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता मंच पर जाने की छूट। घरेलू अदालतें अनिवार्य नहीं थीं। | कम से कम 5 वर्षों तक भारतीय अदालतों के सभी न्यायिक उपायों का उपयोग अनिवार्य। | घरेलू उपायों की अवधि घटाकर 2-3 वर्ष करना या न्याय न मिलने पर सीधे मध्यस्थता का विकल्प। |
| सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र (MFN) | शामिल था, जिससे अन्य संधियों से अनुकूल प्रावधानों का आयात (Treaty Shopping) बढ़ा। | पूरी तरह से हटा दिया गया, जिससे निवेशक सुरक्षा अत्यंत कमजोर हो गई। | सख्त सुरक्षा उपायों और अपवादों के साथ सीमित स्तर पर MFN क्लॉज को फिर से शामिल करना। |
| कराधान (Taxation) का दायरा | कर संबंधी नीतियों को चुनौती देने की आंशिक अनुमति थी। | कर संबंधी मामलों को पूर्णतः बाहर रखा गया, जिससे निवेशक अविश्वास बढ़ा। | कर संप्रभुता कायम रखते हुए कर नीतियों में मनमानेपन और भेदभाव के खिलाफ सुरक्षात्मक सुरक्षा। |
| पूंजी का निर्यात (ODI) | पूंजी निर्यातकों (भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों) के हितों पर ध्यान न्यूनतम था। | मुख्य रूप से विदेशी मुकदमों के खिलाफ सुरक्षात्मक रवैया; भारतीय बाहरी निवेश उपेक्षित। | पारस्परिक निवेशक संरक्षण सिद्धांत के माध्यम से विदेशों में भारतीय निवेशों के हितों की सुरक्षा। |
3. पाठ्यक्रम सहबद्धता तालिका (Syllabus Linkage Table)
यह विषय संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की मुख्य परीक्षाओं के निम्नलिखित प्रश्नपत्रों और शीर्षकों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है:
| परीक्षा का नाम | प्रश्नपत्र / सामान्य अध्ययन | पाठ्यक्रम का संबद्ध विषय (Syllabus Topic) | परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण उप-विषय (Sub-topics) |
|---|---|---|---|
| UPSC Civil Services | सामान्य अध्ययन – III (GS 3) | भारतीय अर्थव्यवस्था, विकास, संसाधन जुटाना, उदारीकरण के आर्थिक प्रभाव, बुनियादी ढांचा और निवेश मॉडल (Investment Models)। | FDI और FPI का आर्थिक महत्व, 2015 मॉडल बीआईटी की सीमाएं, संप्रभु नियामक स्वायत्तता बनाम निवेश संवर्धन। |
| UPSC Civil Services | सामान्य अध्ययन – II (GS 2) | द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा भारत से संबंधित और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते। | भारत-यूरोपीय संघ और भारत-यूके एफटीए वार्ता में निवेश संधियों की भूमिका, अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता विवाद। |
| MPSC State Services | सामान्य अध्ययन – IV (GS 4) | महाराष्ट्र और भारत की अर्थव्यवस्था, आर्थिक विकास, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विदेशी पूंजी (FDI/ODI) का प्रवाह। | राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में विदेशी पूंजी का योगदान, महाराष्ट्र में निवेश आकर्षित करने के लिए राष्ट्रीय नीतिगत ढांचा। |
| MPSC State Services | सामान्य अध्ययन – III (GS 3) | मानव संसाधन विकास और अंतर्राष्ट्रीय संबंध, द्विपक्षीय व्यापार संगठन और समझौते। | वैश्विक स्तर पर भारत की व्यापार नीति का विकास, आउटबाउंड निवेश में महाराष्ट्र की कंपनियों के हित। |
4. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Practice Prelims MCQ)
प्रश्न: द्विपक्षीय निवेश संधि (Bilateral Investment Treaty – BIT) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के 1993 के मॉडल बीआईटी में ‘परिसंपत्ति-आधारित’ (Asset-based) परिभाषा को अपनाकर निवेश के दायरे को अत्यंत सीमित कर दिया गया था, जबकि 2015 के मॉडल में इसे व्यापक बनाते हुए ‘उद्यम-आधारित’ (Enterprise-based) कर दिया गया।
2. 2015 के मॉडल बीआईटी के अनुसार, एक विदेशी निवेशक को भारत सरकार के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता (ISDS) शुरू करने से पहले न्यूनतम पाँच वर्षों तक स्थानीय न्यायिक या प्रशासनिक उपायों का उपयोग करना अनिवार्य है।
3. 2015 के मॉडल बीआईटी में ‘सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र’ (Most Favoured Nation – MFN) क्लॉज को पूरी तरह से हटा दिया गया था ताकि अन्य संधियों के प्रावधानों के अनियंत्रित आयात (Treaty Shopping) को रोका जा सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 and 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (B) केवल 2 और 3
विस्तृत बहु-पैराग्राफ स्पष्टीकरण:
कथन 1 गलत है: भारत के 1993 के मॉडल बीआईटी में ‘परिसंपत्ति-आधारित’ (Asset-based) परिभाषा को अपनाया गया था, जो निवेश के दायरे को अत्यंत विस्तृत और व्यापक बनाती थी। इसके तहत शेयर, डिबेंचर, बौद्धिक संपदा अधिकार और यहां तक कि अमूर्त संपत्तियों (जैसे गुडविल) को भी निवेश संरक्षण प्राप्त था। इसके विपरीत, 2015 के मॉडल बीआईटी ने इस दृष्टिकोण को बदलते हुए ‘उद्यम-आधारित’ (Enterprise-based) परिभाषा को अपनाया, जिसने निवेश के दायरे को बहुत संकीर्ण कर दिया। इसके तहत केवल उन्हीं उद्यमों को संरक्षण प्राप्त होता है जो वास्तविक आर्थिक गतिविधि करते हैं और जिनका भारत में स्थायी आधार पर भौतिक अस्तित्व होता है। इसका उद्देश्य शेल कंपनियों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नाम पर होने वाले कर अपवंचन को रोकना था। अतः कथन 1 में परिभाषाओं और उनके प्रभावों को उल्टा लिखा गया है, जिससे यह कथन असत्य हो जाता है।
कथन 2 सही है: 2015 के मॉडल बीआईटी के अनुच्छेद 15 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी विदेशी निवेशक और भारत सरकार के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो निवेशक सीधे अंतर्राष्ट्रीय पंचाट या मध्यस्थता (ISDS) के पास नहीं जा सकता। निवेशक को पहले भारत की स्थानीय अदालतों या प्रशासनिक निकायों के समक्ष निवारण की मांग करनी होगी। इस स्थानीय न्यायिक उपाय का उपयोग करने की न्यूनतम अवधि पांच वर्ष निर्धारित की गई है। यदि पांच वर्ष की अवधि के भीतर स्थानीय अदालतों से विवाद का संतोषजनक समाधान नहीं होता है, तभी निवेशक अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू करने का हकदार होता है। इस नियम का उद्देश्य घरेलू न्यायिक संप्रभुता का सम्मान सुनिश्चित करना है।
कथन 3 सही है: सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र (MFN) क्लॉज दो देशों के बीच एक समझौता है जो यह सुनिश्चित करता है कि वे एक-दूसरे को वैसा ही व्यापारिक या निवेश संरक्षण लाभ प्रदान करेंगे जैसा वे किसी तीसरे देश को देते हैं। 1993 के मॉडल बीआईटी में MFN क्लॉज शामिल था, जिसका उपयोग ‘व्हाइट इंडस्ट्रीज बनाम भारत सरकार’ मामले में निवेशक द्वारा किया गया था। इस मामले में ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने भारत-कुवैत संधि के अधिक अनुकूल प्रावधानों का लाभ उठाने के लिए MFN क्लॉज का सहारा लिया, जिसे तकनीकी भाषा में ‘ट्रीटी शॉपिंग’ (Treaty Shopping) या ‘फोरम शॉपिंग’ कहा जाता है। इस खतरे से बचने के लिए, भारत सरकार ने 2015 के मॉडल बीआईटी से MFN क्लॉज को पूरी तरह से हटा दिया।
निष्कर्ष: चूंकि केवल कथन 2 और कथन 3 सही हैं, इसलिए विकल्प (B) सही उत्तर है। यह प्रश्न सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के बदलते पैटर्न के अनुरूप संकल्पनात्मक स्पष्टीकरण और तथ्यात्मक सटीकता दोनों की परीक्षा लेता है।
5. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Question)
प्रश्न: “द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs) राज्य की नियामक स्वायत्तता की रक्षा और विदेशी निवेशकों के लिए एक सुरक्षित व स्थिर विनियामक वातावरण प्रदान करने के बीच एक नाजुक संतुलन का प्रतिनिधित्व करती हैं।” भारत के 2015 के मॉडल बीआईटी की सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए और यह समझाइए कि प्रस्तावित 2026 के संशोधन इन सीमाओं को दूर करते हुए भारत की आर्थिक आकांक्षाओं को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)
मॉडल उत्तर संरचनात्मक रूपरेखा (Model Answer Structural Blueprint):
भूमिका (Introduction – लगभग 40-50 शब्द):
द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) का मुख्य उद्देश्य विदेशी पूंजी को सुरक्षा प्रदान करके आर्थिक विकास को गति देना है, जबकि राज्य के लोक कल्याणकारी और संप्रभु अधिकारों को अक्षुण्ण रखना है। हाल ही में, भारत सरकार के आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) द्वारा 2015 के मॉडल बीआईटी की समीक्षा शुरू की गई है, क्योंकि वित्त वर्ष 2026 में भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) गिरकर $7.65 बिलियन रह गया है। यह समीक्षा भारत की संप्रभु नियामक स्वायत्तता और विदेशी निवेशकों के विश्वास के बीच संतुलन साधने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मुख्य भाग (Body – लगभग 150-160 शब्द):
1. भारत के 2015 के मॉडल बीआईटी की सीमाएं (आलोचनात्मक मूल्यांकन):
- अत्यधिक सख्त विवाद निपटान (ISDS): अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से पहले 5 वर्षों तक भारतीय अदालतों के न्यायिक उपायों को आजमाने की अनिवार्यता विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित करती है, क्योंकि भारत में वाणिज्यिक मामलों के निपटारे में औसतन 10 से 15 वर्ष लग जाते हैं।
- प्रमुख क्लॉज का अभाव: सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र (MFN) क्लॉज को पूरी तरह हटाने और निष्पक्ष व न्यायसंगत व्यवहार (FET) के दायरे को अत्यधिक संकीर्ण करने से विदेशी निवेशकों को मनमाने नीतिगत बदलावों के खिलाफ सुरक्षा नहीं मिलती।
- कराधान का पूर्ण बहिष्करण: वोडाफोन विवाद के बाद कर मामलों को बीआईटी से पूरी तरह बाहर कर दिया गया, जिससे विदेशी निवेशकों में ‘भूतलक्षी कर’ (Retrospective Tax) और मनमाने कराधान का डर बना रहा।
- आउटबाउंड निवेश (ODI) की उपेक्षा: 2015 का मॉडल केवल एक आयातक देश के दृष्टिकोण से बनाया गया था, जिससे विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों (जैसे टाटा, बिड़ला) को सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता सीमित हो गई।
- वैश्विक वार्ताओं में गतिरोध: इस मॉडल की कठोरता के कारण यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत के साथ नए बीआईटी पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया, जिससे मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) भी बाधित हुए हैं।
2. प्रस्तावित 2026 के संशोधन इन सीमाओं को कैसे दूर कर सकते हैं:
- आईएसडीएस (ISDS) का सरलीकरण: स्थानीय न्यायिक उपचारों की 5 वर्ष की अवधि को घटाकर 2-3 वर्ष किया जा सकता है, या ‘न्याय में देरी’ की स्थिति में सीधे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की अनुमति दी जा सकती है।
- संतुलित निवेश परिभाषा: एक नई ‘हाइब्रिड परिभाषा’ लाकर शेल कंपनियों को प्रतिबंधित रखते हुए वैध बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) और तकनीकी हस्तांतरण को सुरक्षा दी जा सकती है।
- सीमित MFN क्लॉज की वापसी: दुरुपयोग को रोकने के लिए उचित सुरक्षा उपायों (Safeguards) के साथ MFN और FET क्लॉज को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
- कर मामलों पर समझौता: कर चोरी के खिलाफ कठोरता बरतने के साथ-साथ ‘सद्भावनापूर्वक कराधान’ (Good Faith Taxation) सुनिश्चित करने के लिए एक मध्यस्थता तंत्र विकसित किया जा सकता है।
- पारस्परिकता का सिद्धांत (Reciprocity): नया मॉडल विदेशों में भारतीय निवेशों के हितों की रक्षा करके घरेलू बहुराष्ट्रीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों में सुरक्षा प्रदान करेगा।
आगे की राह (Way Forward – लगभग 40-50 शब्द):
भारत को अपनी नीतिगत संप्रभुता से समझौता किए बिना निवेशकों के अनुकूल वातावरण का निर्माण करना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने आवश्यक हैं:
- नियामक पूर्वानुमेयता (Regulatory Predictability): नीतिगत बदलावों को अचानक लागू करने के बजाय उद्योग जगत के साथ व्यापक चर्चा की जानी चाहिए ताकि नीतिगत अनिश्चितता कम हो सके।
- घरेलू मध्यस्थता का सुदृढ़ीकरण: भारत को गिफ्ट सिटी (GIFT City) जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों में मध्यस्थता हब स्थापित करके समयबद्ध वाणिज्यिक विवाद समाधान की व्यवस्था करनी चाहिए।
- वार्ता में लचीलापन: साझेदार देशों (जैसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं बनाम उभरती अर्थव्यवस्थाओं) की आर्थिक प्रकृति के आधार पर निवेश संधियों के प्रारूप में लचीलापन अपनाना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion – लगभग 30-40 शब्द):
भारत के 2015 मॉडल बीआईटी में प्रस्तावित 2026 के संशोधन एक ‘स्वस्थ सुधार’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सुधार देश के संप्रभु अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए विदेशी निवेशकों के मन में विश्वास पैदा करेगा। यह नीतिगत बदलाव न केवल भारत में एफडीआई के प्रवाह को पुनः सक्रिय करेगा बल्कि ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक वैश्विक पूंजी को आकर्षित करने में भी उत्प्रेरक की भूमिका निभाएगा।
