Karnataka government urged to declare drought, announce relief of ₹40,000 for each farmer (July 17, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण
परिचय और वर्तमान संदर्भ
कर्नाटक के गन्ना उत्पादक किसानों ने अपनी फसलों को बचाने और आर्थिक तबाही से बचने के लिए राज्य सरकार से गुहार लगाई है। किसान चाहते हैं कि सरकार तुरंत पूरे राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करे और हर पीड़ित किसान को ₹40,000 की तत्काल वित्तीय राहत दे। किसानों की यह मांग केवल नकद मदद तक सीमित नहीं है। उन्होंने सरकारी, सहकारी और निजी बैंकों से लिए गए सभी फसल ऋणों को पूरी तरह से माफ करने की भी पुरजोर मांग की है। जब आप मुख्य परीक्षा के लिए कृषि संकट का अध्ययन करते हैं, तो आपको मानसून की इस बेरुखी और किसानों की लाचारी के पीछे के बुनियादी कारणों को समझना होगा। कर्नाटक राज्य रायथा संघ जैसे किसान संगठन लगातार सड़कों पर उतरकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं ताकि प्रशासन किसानों की इस बदहाली को स्वीकार करे और तुरंत राहत कदम उठाए। यह संकट हमें साफ दिखाता है कि आज भी हमारी खेती कितनी हद तक मौसम के मिजाज पर टिकी है।
पाठ्यक्रम प्रासंगिकता
इस विषय की गहराई को समझने के लिए आपको यूपीएससी/एमपीएससी (UPSC/MPSC) के पाठ्यक्रम से इसके जुड़ाव को देखना होगा। यह खबर सीधे आपके इन पेपर्स से जुड़ती है:
- सामान्य अध्ययन पेपर-III:
- भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, वृद्धि, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय।
- कृषि मुख्य फसलें – देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न – सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली-कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन तथा संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिए ई-प्रौद्योगिकी।
- प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायकी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; सार्वजनिक वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्यप्रणाली, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु-पालन संबंधी अर्थशास्त्र।
- भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग- कार्यक्षेत्र एवं महत्त्व, स्थान, ऊपरी और नीचे की अपेक्षाएँ, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।
- भूमि सुधार।
- सामान्य अध्ययन पेपर-II:
- सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
- विकास प्रक्रियाएँ और विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानदाताओं, संस्थागत एवं अन्य हितधारकों की भूमिका।
- गरीबी और भूख से संबंधित विषय।
- शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस-अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएँ, सीमाएँ और संभावनाएँ; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही तथा संस्थागत एवं अन्य उपाय।
मुख्य बिंदु और देश के कृषि ढांचे के बुनियादी मुद्दे
जब आप इस मुद्दे का विश्लेषण करते हैं, तो इसे दो हिस्सों में बांटकर देखिए – पहला, किसानों की तात्कालिक मांगें क्या हैं; और दूसरा, सरकार के सामने क्या प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियां खड़ी हैं।
किसानों की प्रमुख मांगें:
- सूखे की फौरन घोषणा: कम बारिश के कारण फसलों की बर्बादी को देखते हुए किसान चाहते हैं कि सरकार राज्य को सूखाग्रस्त माने।
- ₹40,000 की सीधी नकद सहायता: फसल के नुकसान की भरपाई करने और रोजमर्रा के खर्चों को चलाने के लिए किसानों को यह नकद मदद चाहिए।
- कर्ज से मुक्ति: राष्ट्रीयकृत, सहकारी और निजी बैंकों से लिए गए सभी फसल ऋणों को सरकार पूरी तरह माफ करे।
- गन्ने के बकाये का निपटारा: चीनी मिलों के पास फंसा हुआ गन्ने का पैसा किसानों को तुरंत वापस मिले।
सरकार के सामने खड़ी चुनौतियाँ और व्यवस्थागत पेंच:
- बजट पर भारी दबाव (राजकोषीय बोझ): इसे आप एक घरेलू बजट की तरह समझ सकते हैं। अगर घर में अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए और आप सारा पैसा उसमें लगा दें, तो बच्चों की स्कूल फीस या मकान की मरम्मत का काम रुक जाता है। ठीक वैसे ही, जब सरकार बड़े पैमाने पर कर्ज माफी और नकद राहत देती है, तो बुनियादी ढांचे (सड़क, बिजली, नहर) के विकास के लिए पैसा कम पड़ जाता है।
- सूखा घोषित करने की जटिल प्रक्रिया: सरकार रातों-रात सूखा घोषित नहीं कर सकती। इसके लिए एक लंबी और वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसमें सैटेलाइट इमेज, मिट्टी की नमी और बारिश के आंकड़ों की जांच होती है।
- मानसून पर अत्यधिक निर्भरता: कर्नाटक सहित भारत के बड़े हिस्से में आज भी खेती केवल मानसून के भरोसे चलती है। अगर बारिश रूठी, तो पूरी फसल चौपट हो जाती है।
- फसलों के विविधीकरण से दूरी: एक ही तरह की फसल पर निर्भर रहना वैसा ही है जैसे अपने सारे पैसे किसी एक शेयर में लगा देना। अगर वह डूबा, तो सब डूब गया। गन्ने जैसी पानी सोखने वाली फसलों को सूखे इलाकों में उगाना किसानों के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
- कर्ज का दुष्चक्र: फसल बर्बाद होने पर किसान साहूकारों या बैंकों से नया कर्ज लेते हैं। जब वे इसे चुका नहीं पाते, तो यह कर्ज का जाल उन्हें आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदमों की ओर धकेलता है।
- फसल बीमा की खामियां: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) कागजों पर बेहतरीन है, लेकिन जमीनी हकीकत में दावों के निपटारे में देरी और जागरूकता की कमी आज भी एक बड़ी रुकावट है।
- बाजार की अनिश्चितता: फसल अच्छी हो भी जाए, तो बिचौलियों के जाल और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव के कारण किसानों को उनकी मेहनत का सही दाम नहीं मिल पाता।
- जलवायु परिवर्तन की मार: कभी जरूरत से ज्यादा बारिश तो कभी महीनों तक सूखा – यह मौसम का बदलता मिजाज किसानों की कमर तोड़ रहा है।
प्रमुख अवधारणाओं और प्रशासनिक/कानूनी पहलुओं का विश्लेषण
परीक्षा के नजरिए से आपको इन तकनीकी और कानूनी शब्दों को गहराई से समझना होगा, क्योंकि मुख्य परीक्षा में सीधे तौर पर इनसे जुड़े सवाल पूछे जाते हैं।
1. सूखे की घोषणा कैसे होती है? (Drought Declaration)
क्या आप जानते हैं कि सूखा घोषित करने का फैसला कोई मनमाना निर्णय नहीं है? इसके लिए केंद्र सरकार ने ‘सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016’ (Drought Management Manual, 2016) बनाई है। राज्य सरकारें सीधे सूखा घोषित नहीं कर सकतीं। वे मौसम विभाग (IMD) के बारिश के आंकड़ों, रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) की सैटेलाइट तस्वीरों और जमीन पर जाकर फसल के हालात (Ground-truthing) को देखने के बाद ही कोई निर्णय लेती हैं।
इसके लिए मुख्य रूप से चार सूचकांकों का इस्तेमाल किया जाता है:
- बारिश के आंकड़े: अगर सामान्य से 25% या उससे ज्यादा बारिश कम हुई हो।
- खेती की स्थिति: बुवाई का रकबा कितना कम हुआ और मिट्टी में कितनी नमी बची है।
- जल स्तर: बांधों, नदियों और भूजल का गिरता स्तर।
- वनस्पति सूचकांक: सैटेलाइट द्वारा दर्ज हरियाली में कमी।
यह घोषणा क्यों जरूरी है? क्योंकि इस घोषणा के बाद ही सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से मिलने वाली वित्तीय मदद को सक्रिय कर पाती है। इसके बाद ही किसानों को सब्सिडी, पीने का पानी, मनरेगा के तहत अतिरिक्त काम और कर्ज के पुनर्गठन जैसी राहत मिलती है।
2. ऋण माफी: तात्कालिक राहत या दीर्घकालिक बीमारी? (Loan Waiver)
जब सरकार किसानों का कर्ज माफ करती है, तो वह बैंकों से कहती है कि ‘किसानों से पैसा मत वसूलिए, उनका कर्ज हम चुकाएंगे।’
सकारात्मक पहलू: संकट में फंसे किसानों को फौरन राहत मिलती है, उनके सिर से कर्ज का बोझ उतरता है और इससे संभावित आत्महत्याओं को रोकने में मदद मिलती है।
नकारात्मक पहलू और चुनौतियां:
- नैतिक संकट (Moral Hazard): इसे एक उदाहरण से समझिए। यदि किसी परीक्षा में शिक्षक पहले ही कह दे कि कोई भी फेल हो, उसे पास कर दिया जाएगा, तो छात्र पढ़ना छोड़ देंगे। ठीक वैसे ही, कर्ज माफी की उम्मीद में वे किसान भी कर्ज चुकाना बंद कर देते हैं जो भुगतान करने में सक्षम हैं।
- बैंकिंग व्यवस्था पर चोट: इससे बैंकों की वसूली प्रभावित होती है, उनका गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (NPA) बढ़ता है और बैंकों के पास नए ऋण देने के लिए नकदी की कमी हो जाती है।
- राजकोषीय अनुशासन का बिगड़ना: सारा पैसा कर्ज चुकाने में जाने से सरकार के पास लोक कल्याणकारी और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बजट कम पड़ जाता है।
- गड़बड़ लक्ष्यीकरण: अक्सर इसका सबसे ज्यादा फायदा बड़े किसानों को मिलता है, जबकि छोटा और सीमांत किसान, जो ज्यादातर अनौपचारिक स्रोतों (साहूकारों) से कर्ज लेता है, इस योजना से बाहर ही रह जाता है।
3. गन्ने की राजनीति और अर्थशास्त्र: FRP, SAP और बकाये का पेंच
गन्ने की कीमतों को तय करने के लिए एक विशेष ढांचा काम करता है। इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि यह न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई दोहरी चाबी है:
- उचित और लाभकारी मूल्य (FRP): यह वह न्यूनतम कानूनी दाम है जो चीनी मिलों को गन्ना किसानों को देना ही होगा। इसकी सिफारिश कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) करता है और इसे आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) मंजूरी देती है। यह आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी है।
- राज्य परामर्श मूल्य (SAP): उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ राज्य सरकारें केंद्र के FRP से ऊपर अपनी तरफ से एक और मूल्य तय करती हैं, जिसे SAP कहते हैं। यह किसानों को खुश रखने का एक जरिया है, लेकिन इससे चीनी मिलों पर बोझ बढ़ता है।
- गन्ने का बकाया (Sugarcane Arrears): जब चीनी मिलें घाटे या चीनी के गिरते दामों के कारण किसानों को समय पर उनके गन्ने का भुगतान नहीं कर पाती हैं, तो उसे गन्ने का बकाया कहते हैं। यह किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बन जाता है।
4. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005)
यह कानून देश में किसी भी बड़ी आपदा से निपटने का मुख्य कानूनी हथियार है। इसके तहत राष्ट्रीय (NDMA), राज्य (SDMA) और जिला स्तर (DDMA) पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरण काम करते हैं। सूखा भी इस कानून के दायरे में आने वाली एक प्राकृतिक आपदा है, जिसके तहत राहत और पुनर्वास कार्य चलाए जाते हैं।
5. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
साल 2016 में शुरू की गई इस योजना का मकसद किसानों को मौसम की मार से सुरक्षा देना है। इसके तहत प्रीमियम की दरें बहुत कम रखी गई हैं:
- खरीफ फसलें: किसान को केवल 2% प्रीमियम देना होता है।
- रबी फसलें: केवल 1.5% प्रीमियम।
- वाणिज्यिक/बागवानी फसलें: 5% प्रीमियम।
बाकी का प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकार मिलकर भरती हैं। हालांकि, इसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए दावों के पारदर्शी मूल्यांकन और तकनीकी (जैसे ड्रोन और एआई) के इस्तेमाल को बढ़ाना होगा।
पर्यावरणीय और आर्थिक अंतर्संबंध: एक दुष्चक्र
यूपीएससी/एमपीएससी मुख्य परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लिए आपको मुद्दों को आपस में जोड़ना आना चाहिए। सूखा केवल पानी की कमी नहीं है; यह एक ऐसी श्रृंखला है जो पर्यावरण से शुरू होकर सीधे देश की अर्थव्यवस्था की रगों तक पहुंचती है। इसे हम एक डोमिनोज़ प्रभाव (Domino Effect) की तरह समझ सकते हैं:
पर्यावरण पर असर:
- जलवायु परिवर्तन की चेतावनी: सूखे का बार-बार आना और उसकी तीव्रता जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी गवाही है। बदलता मॉनसून चक्र खेती के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह तबाह कर रहा है।
- जल स्तर का पाताल में जाना: बारिश न होने से न केवल फसल सूखती है, बल्कि भूजल का स्तर भी तेजी से नीचे गिर जाता है। इससे पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचता है।
- जमीन का बंजर होना: मिट्टी की नमी खत्म होने से मिट्टी का कटाव तेज होता है, जिससे उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे मरुस्थल में बदलने लगती है।
अर्थव्यवस्था पर चोट:
- जीडीपी (GDP) की धीमी रफ्तार: जब कृषि उत्पादन गिरता है, तो सीधे तौर पर देश और राज्य की आर्थिक विकास दर पर ब्रेक लग जाता है।
- महंगाई का बढ़ना: फसल कम होने से मंडियों में अनाज और सब्जियों की आपूर्ति घटती है। मांग वैसी ही रहने से कीमतें आसमान छूने लगती हैं। इसका सबसे बड़ा शिकार गरीब और मध्यम वर्ग बनता है।
- ग्रामीण पलायन: जब गांव में काम और आमदनी का कोई जरिया नहीं बचता, तो किसान और मजदूर शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे शहरों के संसाधनों पर भी दबाव बढ़ता है।
- सरकारी खजाने पर बोझ: सूखा राहत बांटने और कर्ज माफ करने के कारण सरकारों को विकास कार्यों के बजट में कटौती करनी पड़ती है, जिससे सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों का निर्माण धीमा हो जाता है।
- बैंकिंग संकट: किसानों द्वारा कर्ज न चुका पाने से बैंकों के एनपीए (NPA) बढ़ते हैं, जिससे देश की बैंकिंग प्रणाली कमजोर होती है।
अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न (Practice Prelims MCQ)
प्रश्न: भारत में सूखे की घोषणा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सूखे की घोषणा करने के लिए सरकार केवल वर्षा की कमी को ही एकमात्र पैमाना मानती है।
- ‘सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016’ के तहत सूखे की घोषणा में कृषि, जलीय और पर्यावरण से जुड़े विभिन्न संकेतकों का उपयोग किया जाता है।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान के खिलाफ किसानों को वित्तीय सुरक्षा देती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A. केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1 और 3
D. 1, 2 और 3
सही उत्तर: B
स्पष्टीकरण:
- कथन 1 गलत है: सूखा घोषित करने के लिए सिर्फ कम बारिश होना काफी नहीं है। सरकार इसके साथ-साथ मिट्टी की नमी, फसलों की स्थिति और जलाशयों के पानी के स्तर को भी परखती है।
- कथन 2 सही है: ‘सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016’ के तहत बारिश की कमी के अलावा बुवाई क्षेत्र, मिट्टी की नमी, बांधों के जल स्तर, भूजल और सैटेलाइट से प्राप्त वनस्पति सूचकांकों का आकलन किया जाता है।
- कथन 3 सही है: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का मूल उद्देश्य ही यही है कि सूखा, बाढ़ या कीड़ों के हमले जैसी आपदाओं से फसल खराब होने पर किसानों को बीमा क्लेम की राशि देकर आर्थिक सुरक्षा दी जाए।
अभ्यास मुख्य परीक्षा वर्णनात्मक प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)
प्रश्न: सूखे की घोषणा, किसान ऋण माफी और कृषि क्षेत्र में व्यवस्थागत (संरचनात्मक) चुनौतियों का विश्लेषण करें। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए क्या स्थायी समाधान हो सकते हैं, जो किसानों की आजीविका को भी बचाएं और देश की राजकोषीय स्थिरता को भी बनाए रखें?
मॉडल उत्तर संरचना (मुख्य बिंदु):
भूमिका (Introduction):
- भारत में आज भी खेती की मानसून पर अत्यधिक निर्भरता और जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार आने वाले सूखे का संक्षिप्त परिचय दें।
- कर्नाटक के किसानों की हालिया मांग (₹40,000 राहत और कर्ज माफी) का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत करें।
चुनौतियों का गहन विश्लेषण:
- सूखे की घोषणा में अड़चनें: वैज्ञानिक मापदंडों को पूरा करने में लगने वाला समय और इसके राजनीतिक दबाव के बीच का टकराव। जमीनी स्तर पर डेटा जुटाने में होने वाली देरी से राहत मिलने में देर होती है।
- ऋण माफी के दुष्प्रभाव: कर्ज माफी से किसानों को तुरंत मदद तो मिलती है, लेकिन इससे बैंकों की आर्थिक सेहत खराब होती है (NPA बढ़ना)। यह ईमानदार कर्जदारों को हतोत्साहित करती है (Moral Hazard)। इसके अलावा, यह बड़े किसानों तक ही सीमित रह जाती है क्योंकि छोटे किसानों के पास औपचारिक ऋण कम होते हैं।
- कृषि क्षेत्र के बुनियादी संकट: देश में आज भी दो-तिहाई कृषि भूमि असिंचित है। किसान गन्ने जैसी फसलों की ओर भागते हैं जो सूखा प्रभावित इलाकों में पानी का अत्यधिक दोहन करती हैं। बिचौलियों के चलते एपीएमसी (APMC) मंडियों में किसानों का शोषण होता है और फसल बीमा योजनाओं में दावों के निपटारे की प्रक्रिया बेहद पेचीदा है।
स्थायी और व्यावहारिक समाधान:
- सिंचाई के आधुनिक तरीके: ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) जैसी तकनीक को बढ़ावा देना ताकि ‘हर बूंद से अधिक फसल’ का सपना पूरा हो सके। तालाबों का निर्माण और भूजल रिचार्ज पर जोर देना।
- फसलों का विविधीकरण (Crop Diversification): किसानों को कम पानी लेने वाली और सूखा-रोधी फसलों (जैसे बाजरा, रागी, दालें) की खेती के लिए प्रोत्साहित करना।
- बाजार सुधार और तकनीक: ई-नाम (e-NAM) को पूरी तरह प्रभावी बनाना और कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) को सीधे खरीदारों से जोड़ना ताकि बिचौलियों का खेल खत्म हो। कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउस का जाल बिछाना।
- बीमा योजना का सरलीकरण: PMFBY में ड्रोन तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके नुकसान का आकलन तेजी से करना ताकि दावों का भुगतान हफ़्तों में हो सके, महीनों में नहीं।
- मजबूत संस्थागत कर्ज प्रणाली: छोटे और सीमांत किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए उन तक बैंक ऋण की पहुंच आसान बनाना। सीधे बैंक खातों में आय सहायता (जैसे PM-KISAN) को और मजबूत करना।
- कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&D): सूखा और गर्मी झेलने वाले उन्नत बीजों का विकास करना और स्थानीय स्तर पर मौसम की सटीक जानकारी देना।
निष्कर्ष:
- सूखे और कृषि संकट का समाधान केवल चुनावी वादों या कर्ज माफी जैसी तात्कालिक राहतों में नहीं है। इसके लिए हमें एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। किसानों की आजीविका की रक्षा और सरकार के वित्तीय स्वास्थ्य के बीच एक बारीक संतुलन बनाकर ही हम भारत को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर और सुरक्षित बना सकते हैं।
यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।
