कर्नाटक में सूखे की घोषणा और किसान राहत: एक विस्तृत विश्लेषण

परिचय और वर्तमान संदर्भ

हाल ही में कर्नाटक के गन्ना उत्पादक किसानों ने राज्य सरकार से राज्य में सूखे की घोषणा करने और प्रत्येक किसान को 40,000 रुपये की तत्काल राहत राशि प्रदान करने का आग्रह किया है। किसानों की यह मांग केवल सूखा राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राष्ट्रीयकृत, सहकारी और निजी बैंकों से लिए गए फसल ऋण को माफ करने की अपील भी शामिल है। यह मुद्दा राज्य में अपर्याप्त वर्षा और कृषि क्षेत्र पर इसके गंभीर प्रभावों को उजागर करता है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब कई क्षेत्र पहले से ही सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। कर्नाटक राज्य रायथा संघ सहित विभिन्न किसान संगठनों ने सरकार पर दबाव डाला है कि वह किसानों की दुर्दशा को स्वीकार करे और तत्काल उपचारात्मक उपाय करे। यह घटना किसानों की अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभाव और सरकारी सहायता की आवश्यकता को दर्शाती है।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता

  • सामान्य अध्ययन पेपर-III:
    • भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, वृद्धि, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय।
    • कृषि मुख्य फसलें – देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न – सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली-कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन तथा संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिए ई-प्रौद्योगिकी।
    • प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायकी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; सार्वजनिक वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्यप्रणाली, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु-पालन संबंधी अर्थशास्त्र।
    • भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग- कार्यक्षेत्र एवं महत्त्व, स्थान, ऊपरी और नीचे की अपेक्षाएँ, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।
    • भूमि सुधार।
  • सामान्य अध्ययन पेपर-II:
    • सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
    • विकास प्रक्रियाएँ और विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानदाताओं, संस्थागत एवं अन्य हितधारकों की भूमिका।
    • गरीबी और भूख से संबंधित विषय।
    • शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस-अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएँ, सीमाएँ और संभावनाएँ; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही तथा संस्थागत एवं अन्य उपाय।

मुख्य बिंदु / तर्क / संरचनात्मक मुद्दे

किसानों की मांगें:

  • सूखे की तत्काल घोषणा: किसान राज्य के कई हिस्सों में अपर्याप्त वर्षा के कारण फसल हानि का हवाला दे रहे हैं।
  • प्रत्येक किसान को 40,000 रुपये की राहत: यह मांग फसल नुकसान की भरपाई और तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए है।
  • फसल ऋण माफी: राष्ट्रीयकृत, सहकारी और निजी बैंकों से लिए गए सभी फसल ऋणों की माफी की मांग की गई है ताकि किसान ऋण के बोझ से मुक्त हो सकें।
  • गन्ने का बकाया भुगतान: चीनी मिलों पर किसानों के गन्ने के बकाया भुगतान में तेजी लाने का भी आग्रह किया गया है।

सरकार के समक्ष चुनौतियाँ और संरचनात्मक मुद्दे:

  • राजकोषीय बोझ: सूखे की घोषणा, राहत पैकेज और ऋण माफी से राज्य के खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। यह सरकार के विकास कार्यों और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन के आवंटन को प्रभावित कर सकता है।
  • सूखे की घोषणा की प्रक्रिया: सूखे की घोषणा के लिए वैज्ञानिक मानदंडों, जैसे वर्षा की कमी, शुष्क अवधि, मृदा नमी सूचकांक और फसल की स्थिति का आकलन करना होता है। इसमें समय लगता है और राजनीतिक दबाव के कारण कई बार यह प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
  • बारिश पर निर्भरता: भारतीय कृषि का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर कर्नाटक में, अभी भी मानसून की बारिश पर अत्यधिक निर्भर है। अपर्याप्त सिंचाई सुविधाओं के कारण मानसून की विफलता का सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ता है।
  • फसल विविधीकरण का अभाव: गन्ने जैसी जल-गहन फसलों पर अत्यधिक निर्भरता सूखे की स्थिति में किसानों के लिए जोखिम बढ़ाती है। जलवायु-लचीली और कम पानी वाली फसलों को अपनाने की आवश्यकता है।
  • ऋणग्रस्तता और किसान आत्महत्याएं: बार-बार फसल का नुकसान और उचित मूल्य न मिल पाने के कारण किसान ऋण के दुष्चक्र में फंस जाते हैं, जिससे आत्महत्याओं की दर बढ़ती है। ऋण माफी एक तात्कालिक समाधान हो सकता है लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान नहीं है।
  • फसल बीमा योजना का प्रभाव: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का उद्देश्य किसानों को फसल नुकसान से बचाना है। हालांकि, इसकी पहुंच, दावा निपटान और जागरूकता को लेकर अभी भी चुनौतियां हैं।
  • कृषि बाजार और मूल्य अस्थिरता: किसानों को अक्सर अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है, खासकर अधिशेष उत्पादन के वर्षों में। कृषि उपज विपणन समितियों (APMC) और बाजार तक पहुंच के मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: अनियमित वर्षा पैटर्न, चरम मौसमी घटनाएँ (जैसे सूखा और बाढ़) जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष परिणाम हैं, जो कृषि को और अधिक संवेदनशील बनाते हैं।

प्रमुख शब्दों और संवैधानिक/कानूनी पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण

1. सूखे की घोषणा (Drought Declaration):

  • प्रक्रिया: भारत में सूखे की घोषणा के लिए केंद्र सरकार ने एक “सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016” (Drought Management Manual, 2016) जारी की है। इसके तहत राज्य सरकारें भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) से प्राप्त वर्षा आंकड़ों, उपग्रह इमेजरी (जैसे राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर – NRSC के डेटा), भू-सत्यन (ground-truthing) और फसल की स्थिति के आकलन के आधार पर सूखे की स्थिति का मूल्यांकन करती हैं।
  • मानदंड: सूखे की घोषणा के लिए चार प्रमुख संकेतकों का उपयोग किया जाता है:
    • वर्षा संबंधी संकेतक: वर्षा की कमी (सामान्य से 25% या अधिक कम)।
    • कृषि संबंधी संकेतक: बुवाई क्षेत्र में कमी, फसल की स्थिति, मृदा नमी सूचकांक।
    • जलीय संबंधी संकेतक: जलाशय स्तर, भूजल स्तर में गिरावट।
    • पर्यावरण संबंधी संकेतक: सूखे से संबंधित वनस्पति सूचकांक।
  • महत्त्व: सूखे की घोषणा केंद्र सरकार से सहायता (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष – NDRF से) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के तहत विभिन्न राहत उपायों को सक्रिय करती है, जैसे:
    • फसल हानि के लिए इनपुट सब्सिडी।
    • पीने के पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना।
    • मनरेगा के तहत अतिरिक्त रोजगार।
    • पशुधन सुरक्षा के उपाय।
    • ऋण पुनर्गठन या माफी पर विचार।

2. ऋण माफी (Loan Waiver):

  • अवधारणा: ऋण माफी का अर्थ है किसानों को उनके कृषि ऋणों (राष्ट्रीयकृत, सहकारी, क्षेत्रीय ग्रामीण और कभी-कभी निजी बैंकों से भी) को चुकाने की आवश्यकता से मुक्त करना।
  • लाभ:
    • संकटग्रस्त किसानों को तत्काल राहत।
    • किसान आत्महत्याओं को रोकने में मदद।
    • ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ावा।
  • नुकसान/चुनौतियाँ:
    • नैतिक संकट (Moral Hazard): यह भविष्य में ऋण चुकाने की प्रवृत्ति को कम कर सकता है, क्योंकि किसानों को उम्मीद होती है कि सरकार फिर से ऋण माफ कर देगी।
    • ऋण संस्कृति पर प्रभाव: यह बैंकों की ऋण देने की क्षमता को प्रभावित करता है और बैंकिंग क्षेत्र के लिए गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) को बढ़ा सकता है।
    • राज्य के वित्त पर दबाव: ऋण माफी से राज्य सरकारों पर भारी राजकोषीय बोझ पड़ता है, जिससे विकास कार्यों के लिए धन की कमी हो सकती है।
    • लक्ष्यीकरण का अभाव: अक्सर बड़े किसानों को छोटे किसानों की तुलना में अधिक लाभ होता है, क्योंकि उनके पास बड़े ऋण होते हैं।
    • अस्थायी समाधान: यह कृषि क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान नहीं है।

3. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) / उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) / राज्य परामर्श मूल्य (SAP) गन्ने के लिए:

  • उचित और लाभकारी मूल्य (FRP): यह वह न्यूनतम मूल्य है जिस पर चीनी मिलों को गन्ना किसानों से गन्ना खरीदना अनिवार्य है। इसे कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों पर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा घोषित किया जाता है और यह आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत वैधानिक रूप से बाध्यकारी है। FRP उत्पादन लागत, वैकल्पिक फसलों से आय, उपभोक्ताओं पर प्रभाव और चीनी मिलों की भुगतान क्षमता जैसे कारकों को ध्यान में रखता है।
  • राज्य परामर्श मूल्य (SAP): कुछ राज्य (जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा) FRP से अधिक एक अपना SAP घोषित करते हैं। यह किसानों को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है, लेकिन यह चीनी मिलों के लिए वित्तीय बोझ बढ़ाता है और गन्ने के बकाया भुगतान का मुद्दा पैदा करता है।
  • गन्ने का बकाया: जब चीनी मिलें किसानों को समय पर FRP या SAP का भुगतान नहीं करती हैं, तो इसे गन्ने का बकाया (Sugarcane Arrears) कहा जाता है। यह अक्सर चीनी की कीमतों में गिरावट, चीनी मिलों की खराब वित्तीय स्थिति और गन्ना उत्पादन लागत में वृद्धि के कारण होता है।

4. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005):

  • यह अधिनियम भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक संस्थागत ढांचा प्रदान करता है।
  • इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) के गठन का प्रावधान है।
  • यह आपदाओं की तैयारी, प्रतिक्रिया और राहत के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करता है।
  • सूखा एक प्राकृतिक आपदा है और इस अधिनियम के तहत सहायता और राहत उपाय किए जाते हैं।

5. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY):

  • फरवरी 2016 में शुरू की गई, यह योजना प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और बीमारियों के कारण फसल के नुकसान से किसानों को सुरक्षा प्रदान करती है।
  • इसमें खरीफ फसलों के लिए किसानों द्वारा देय प्रीमियम 2%, रबी फसलों के लिए 1.5% और बागवानी/वाणिज्यिक फसलों के लिए 5% तय किया गया है। शेष प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकार द्वारा साझा किया जाता है।
  • इस योजना का उद्देश्य किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना और कृषि आय में स्थिरता लाना है। हालांकि, इसकी पहुंच, दावों के त्वरित निपटान और बीमा कंपनियों द्वारा मूल्यांकन की पारदर्शिता को लेकर अभी भी सुधार की आवश्यकता है।

पर्यावरणीय/आर्थिक संबंध

  • पर्यावरणीय संबंध:
    • जलवायु परिवर्तन: सूखे की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता जलवायु परिवर्तन का एक सीधा परिणाम है। अनियमित मानसून पैटर्न, वर्षा की कमी और अत्यधिक मौसम की घटनाएं कृषि को अधिक जोखिमपूर्ण बनाती हैं।
    • जल संकट: सूखे के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट आती है, जिससे पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो जाती है। यह पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता और समग्र पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।
    • मृदा निम्नीकरण: सूखे की स्थिति में मृदा नमी में कमी आती है, जिससे मृदा अपरदन और मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
  • आर्थिक संबंध:
    • कृषि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर प्रभाव: कृषि क्षेत्र में उत्पादन में कमी से राज्य और राष्ट्रीय GDP में गिरावट आती है, जिससे आर्थिक वृद्धि प्रभावित होती है।
    • खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति: फसल की पैदावार कम होने से खाद्य आपूर्ति बाधित होती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं और खाद्य मुद्रास्फीति का दबाव बनता है। यह उपभोक्ताओं, विशेषकर गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को प्रभावित करता है।
    • ग्रामीण संकट और प्रवासन: किसानों की आय में कमी से ग्रामीण संकट बढ़ता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर प्रवासन (अर्थात लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं) बढ़ सकता है।
    • सरकारी वित्त पर बोझ: सूखा राहत, ऋण माफी और अन्य सहायता उपायों के कारण राज्य और केंद्र सरकारों पर राजकोषीय बोझ बढ़ता है, जिससे अन्य विकास परियोजनाओं के लिए धन की कमी हो सकती है।
    • बैंकिंग क्षेत्र: ऋण माफी या ऋण चुकाने में देरी से बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (NPAs) बढ़ सकती हैं, जिससे बैंकिंग क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न (Practice Prelims MCQ)

प्रश्न: भारत में सूखे की घोषणा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. सूखे की घोषणा के लिए केवल वर्षा की कमी को ही एकमात्र मानदंड माना जाता है।
  2. सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016 के तहत सूखे की घोषणा में कृषि, जलीय और पर्यावरण संबंधी संकेतकों का भी उपयोग किया जाता है।
  3. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले फसल नुकसान के लिए किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A. केवल 1 और 2

B. केवल 2 और 3

C. केवल 1 और 3

D. 1, 2 और 3

सही उत्तर: B

स्पष्टीकरण:

  • कथन 1 गलत है। सूखे की घोषणा के लिए केवल वर्षा की कमी एकमात्र मानदंड नहीं है। सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016 के तहत वर्षा, कृषि, जलीय और पर्यावरण संबंधी संकेतकों का एक सेट उपयोग किया जाता है।
  • कथन 2 सही है। सूखा प्रबंधन नियमावली, 2016 में वर्षा की कमी के साथ-साथ बुवाई क्षेत्र में कमी, मृदा नमी, जलाशय स्तर, भूजल स्तर और वनस्पति सूचकांक जैसे कृषि, जलीय और पर्यावरण संबंधी संकेतकों को भी शामिल किया गया है।
  • कथन 3 सही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का प्राथमिक उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और बीमारियों के कारण होने वाले फसल नुकसान के खिलाफ किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है, जिसमें सूखा भी शामिल है।

अभ्यास मुख्य परीक्षा वर्णनात्मक प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)

प्रश्न: सूखे की घोषणा, किसान ऋण माफी और कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक मुद्दों से जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण करें। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए स्थायी समाधान क्या हो सकते हैं, जो किसानों की आजीविका को सुरक्षित करें और राजकोषीय स्थिरता बनाए रखें?

मॉडल उत्तर बिंदु:

परिचय:

  • भारत में कृषि की मानसून पर निर्भरता और जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की बढ़ती आवृत्ति का संक्षिप्त उल्लेख।
  • कर्नाटक के किसानों की हालिया मांग का संदर्भ, जो इस जटिल मुद्दे को सामने लाती है।

चुनौतियों का विश्लेषण:

  • सूखे की घोषणा से जुड़ी चुनौतियाँ:
    • वैज्ञानिक मानदंडों और राजनीतिक दबाव के बीच संतुलन।
    • डेटा संग्रह और भू-सत्यन की विश्वसनीयता।
    • प्रक्रियागत देरी से राहत पहुंचने में विलंब।
  • किसान ऋण माफी से जुड़ी चुनौतियाँ:
    • नैतिक संकट: भविष्य में ऋण चुकाने की प्रवृत्ति में कमी।
    • राजकोषीय बोझ: राज्य के वित्त पर दबाव, विकास कार्यों के लिए धन की कमी।
    • बैंकिंग क्षेत्र पर प्रभाव: NPAs में वृद्धि, ऋण प्रवाह में कमी।
    • लक्ष्यीकरण का अभाव: अक्सर बड़े किसानों को अधिक लाभ, छोटे किसानों तक सीमित पहुंच।
  • कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक मुद्दे:
    • सिंचाई सुविधाओं का अभाव: केवल एक तिहाई कृषि भूमि सिंचित।
    • फसल विविधीकरण का अभाव: जल-गहन फसलों पर अत्यधिक निर्भरता।
    • कृषि विपणन की समस्याएँ: APMC मंडियों में बिचौलियों का वर्चस्व, बाजार तक पहुंच का अभाव।
    • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: अनियमित वर्षा, तापमान वृद्धि, चरम मौसमी घटनाएँ।
    • कृषि में पूंजी निवेश की कमी: अनुसंधान, बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी में कम निवेश।
    • फसल बीमा का कवरेज और दावा निपटान: जागरूकता की कमी और प्रक्रियाओं में जटिलता।

स्थायी समाधान:

  • सिंचाई बुनियादी ढांचे का विकास:
    • सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर) को बढ़ावा देना।
    • नदी जोड़ो परियोजनाओं और छोटे जलाशयों का निर्माण।
    • भूजल रिचार्ज पर ध्यान।
  • फसल विविधीकरण और जलवायु-लचीली कृषि:
    • किसानों को कम पानी वाली, सूखा-प्रतिरोधी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना।
    • जैविक खेती और कृषि वानिकी को बढ़ावा देना।
  • कृषि विपणन सुधार:
    • ई-नाम (e-NAM) जैसी डिजिटल प्लेटफॉर्म को मजबूत करना।
    • कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) को बढ़ावा देना ताकि वे सीधे बाजार तक पहुंच सकें।
    • भंडारण और कोल्ड चेन सुविधाओं का विकास।
  • फसल बीमा योजना का सुदृढ़ीकरण:
    • PMFBY के कवरेज का विस्तार और जागरूकता बढ़ाना।
    • दावा निपटान प्रक्रियाओं को सरल और पारदर्शी बनाना।
    • भू-सत्यन और क्षति आकलन में प्रौद्योगिकी (ड्रोन, AI) का उपयोग।
  • ऋण प्रणाली में सुधार:
    • संस्थागत ऋण की पहुंच बढ़ाना और अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर निर्भरता कम करना।
    • कृषि ऋण पुनर्गठन और पुनर्वित्त के लिए प्रभावी तंत्र।
    • लक्षित आय सहायता (जैसे PM-KISAN) को मजबूत करना।
  • कृषि अनुसंधान एवं विकास:
    • सूखा-प्रतिरोधी किस्मों का विकास।
    • मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों में सुधार।
    • किसानों को कृषि-जलवायु सलाह तक पहुंच प्रदान करना।
  • आपदा प्रबंधन में सक्रियता:
    • पूर्वानुमान आधारित कार्रवाई (Forecast-based Action) तंत्र अपनाना।
    • समुदाय-आधारित आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया योजनाओं को मजबूत करना।

निष्कर्ष:

  • सूखे और कृषि संकट से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो तात्कालिक राहत के साथ-साथ दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर भी केंद्रित हो।
  • किसानों की आजीविका की सुरक्षा और राजकोषीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है ताकि एक लचीला और टिकाऊ कृषि क्षेत्र का निर्माण किया जा सके।


यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।

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