Uniform Civil Code (UCC) & Article 44 (July 08, 2026) – दैनिक समसामयिकी विश्लेषण
समान नागरिक संहिता (UCC) और अनुच्छेद 44: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
1. विस्तृत संदर्भ और पृष्ठभूमि (Detailed Context & Background)
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी स्कूल में अलग-अलग धर्म के छात्रों के लिए छुट्टी, परीक्षा या अनुशासन के नियम अलग-अलग हों, तो स्कूल कैसे चलेगा? भारत में व्यक्तिगत मामलों के साथ कुछ ऐसा ही है। समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) का सीधा सा मतलब है—एक ऐसा साझा कानूनी ढांचा, जो धर्म की परवाह किए बिना देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो। चाहे शादी हो, तलाक हो, गोद लेना हो, विरासत हो या गुजारा भत्ता, सबके लिए एक ही कानून।
आज यानी जुलाई 08, 2026 को यह मुद्दा भारतीय राजनीति, अदालतों और सामाजिक विमर्श के केंद्र में है। उत्तराखंड ने 27 जनवरी 2025 को अपनी खुद की नागरिक संहिता लागू करके एक बड़ी शुरुआत की। इसके सफल प्रयोग के बाद अब देश के कई अन्य राज्य भी अपने स्तर पर इसका ड्राफ्ट तैयार कर रहे हैं। हाल ही में जनवरी 2026 में जारी ‘उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2026’ और कोर्ट द्वारा लैंगिक समानता को दी जा रही प्राथमिकता ने इस संवैधानिक बहस में नई जान फूंक दी है। परीक्षा की दृष्टि से आपको इस विषय की हर परत को गहराई से समझना होगा।
क. संवैधानिक इतिहास और संविधान सभा के वाद-विवाद
यह कोई नया विचार नहीं है। जब 1940 के दशक में हमारे स्वतंत्रता सेनानी और विद्वान संविधान सभा में बैठे थे, तब भी इस मुद्दे पर गर्म बहस छिड़ी थी। इसे आप एक बड़े घर के निर्माण की तरह समझ सकते हैं, जहां हर सदस्य के पास अपने कमरे के अलग नियम रखने या पूरे घर के लिए एक नियम बनाने पर तीखी बहस हो रही थी।
- सुधारवादियों का तर्क (समर्थक): डॉ. बी.आर. अंबेडकर, के.एम. मुंशी और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर जैसे दूरदर्शी नेताओं ने इसका पुरजोर समर्थन किया। वे मानते थे कि एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में शादी, तलाक और संपत्ति जैसे दीवानी मामलों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। डॉ. अंबेडकर ने साफ कहा था कि जब तक हम इन व्यक्तिगत कानूनों में सुधार नहीं करेंगे, तब तक महिलाओं को असली न्याय और समाज में समानता नहीं मिल सकती। के.एम. मुंशी ने भी चेतावनी दी थी कि अगर हम व्यक्तिगत कानूनों को धर्म का हिस्सा मानते रहे, तो हम एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र कभी नहीं बन पाएंगे।
- अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों की चिंताएं (विरोधी): इसके उलट, मोहम्मद इस्माइल और नज़ीरुद्दीन अहमद जैसे अल्पसंख्यक नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। वे इसे धार्मिक स्वतंत्रता (जो आज हमारे संविधान के अनुच्छेद 25 का हिस्सा है) पर हमला मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी भी समुदाय के निजी नियमों में उसकी मर्जी के बिना बदलाव करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।
- रास्ता कैसे निकला? (संवैधानिक समझौता): जब दोनों पक्ष अपनी बातों पर अड़े रहे, तो संविधान निर्माताओं ने एक बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने यूसीसी को तुरंत लागू होने वाले मौलिक अधिकारों (भाग III) में नहीं डाला। इसके बजाय, इसे राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP – भाग IV) के तहत अनुच्छेद 44 में जगह दी। इसका व्यावहारिक मतलब क्या है? अनुच्छेद 37 साफ करता है कि आप इन सिद्धांतों को लागू कराने के लिए सीधे अदालत नहीं जा सकते (ये गैर-वादयोग्य या non-enforceable हैं), लेकिन देश की सरकार जब भी कोई कानून बनाएगी, तो इन सिद्धांतों को ध्यान में रखना उसका नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य होगा।
ख. ऐतिहासिक विकासक्रम (औपनिवेशिक काल से वर्तमान तक)
यह समझने के लिए कि भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग कानून क्यों बने, हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। इसकी जड़ें अंग्रेजों के शासनकाल में छिपी हैं:
- अंग्रेजों की सोची-समझी रणनीति: 1835 की रिपोर्ट और लेक्स लोकी रिपोर्ट (1840): ब्रिटिश सरकार ने व्यापार और अपराधों से जुड़े कानूनों (जैसे कि बाद में बनी भारतीय दंड संहिता 1860) को तो सबके लिए एक जैसा बना दिया। उन्होंने पारिवारिक मामलों जैसे शादी-ब्याह और उत्तराधिकार में जानबूझकर हाथ नहीं डाला। वे जानते थे कि यदि उन्होंने हिंदुओं या मुसलमानों के पारिवारिक रीति-रिवाजों में दखल दिया, तो 1857 जैसी कोई बड़ी क्रांति दोबारा भड़क सकती है। अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को बनाए रखने के लिए उन्होंने इन व्यक्तिगत कानूनों को अलग ही रहने दिया।
- नेहरू सरकार का बड़ा कदम: हिंदू कोड बिल (1950 का दशक): आजादी के बाद, भारत सरकार ने हिंदू समाज के रीति-रिवाजों को आधुनिक बनाने और महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने का बड़ा फैसला किया। इसके लिए संसद ने चार प्रमुख कानून पारित किए—हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम 1956, और हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम 1956। इन कानूनों ने हिंदू महिलाओं को संपत्ति का अधिकार और शादी में बराबरी दी। हालांकि, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और यहूदी समुदायों के व्यक्तिगत कानून जस के तस बने रहे, जिससे यह सुधार केवल एक वर्ग तक सीमित रह गया।
ग. महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (अदालती फैसलों की जुबानी)
अदालतों ने सरकार को बार-बार याद दिलाया है कि अनुच्छेद 44 को ठंडे बस्ते से बाहर निकाला जाए। मुख्य परीक्षा के उत्तर लिखते समय आपको इन प्रमुख मुकदमों का उल्लेख जरूर करना चाहिए:
- शाह बानो मामला (1985): इस ऐतिहासिक मुकदमे (मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम) में सुप्रीम कोर्ट ने 73 वर्ष की एक बेसहारा मुस्लिम महिला को अपने पति से गुजारा भत्ता पाने का अधिकार (CrPC की धारा 125 के तहत) दिया। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 केवल फाइलों में बंद एक “मृत पत्र” बनकर रह गया है।
- सरला मुद्गल मामला (1995): इस मामले में कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई पुरुष केवल दूसरी शादी करने के लिए अपना धर्म बदलकर इस्लाम अपनाता है, तो उसकी यह शादी गैर-कानूनी मानी जाएगी। कोर्ट ने इसे पहली पत्नी के अधिकारों के साथ खिलवाड़ बताया और सरकार से यूसीसी की दिशा में कदम बढ़ाने को कहा।
- जॉन वल्लामट्टम मामला (2003): सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह धारा ईसाइयों को धार्मिक या धर्मार्थ कार्यों के लिए वसीयत के जरिए संपत्ति दान करने से रोकती थी। कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि यूसीसी देश की एकता के लिए बेहद जरूरी है।
- सायरा बानो मामला (2017): कोर्ट ने एक झटके में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की अमानवीय प्रथा को असंवैधानिक और पूरी तरह से मनमाना करार दिया। इस फैसले ने महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में एक राष्ट्रव्यापी माहौल तैयार किया और यूसीसी की जमीन को और मजबूत कर दिया।
घ. उत्तराखंड मॉडल और 2026 के नए बदलाव
उत्तराखंड ने 2024 में देश का पहला यूसीसी बिल पास किया, जो 27 जनवरी 2025 से पूरे राज्य में लागू हो गया। इसके ठीक एक साल बाद, जनवरी 2026 में, वहां की सरकार ने समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2026 लागू करके इसमें कई बड़े बदलाव किए। आइए, इन महत्वपूर्ण सुधारों को समझते हैं:
- नए आपराधिक कानूनों से तालमेल: सरकार ने इस अध्यादेश के जरिए पुराने दंड प्रावधानों को हटाकर देश की नई आपराधिक संहिताओं—भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के साथ जोड़ दिया है।
- लैंगिक समानता (Gender Neutrality) की अनूठी पहल: यह बदलाव दिल जीतने वाला है। सरकार ने उत्तराधिकार से जुड़े सरकारी दस्तावेजों में से रूढ़िवादी शब्द “विधवा” (widow) को पूरी तरह हटा दिया है। इसकी जगह अब अधिक सम्मानजनक और जेंडर-न्यूट्रल शब्द “पति/पत्नी” (spouse) का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया है।
- लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationships) के सख्त नियम: यदि कोई जोड़ा लिव-इन में रहता है, तो उसे अपना पंजीकरण कराना होगा। ऐसा न करने पर सजा का प्रावधान है। सरकार का मकसद यहां नैतिक पहरेदारी करना नहीं, बल्कि लिव-इन में रहने वाली महिलाओं और उनसे पैदा होने वाले बच्चों को कानूनी सुरक्षा देना है।
- धोखा देकर शादी करने पर कड़ा एक्शन: अगर कोई व्यक्ति अपनी असली धार्मिक या व्यक्तिगत पहचान छिपाकर यानी झूठ बोलकर शादी करता है, तो पीड़ित पक्ष के पास इस आधार पर शादी को तुरंत रद्द (annulment) कराने का पूरा कानूनी हक होगा।
- कागजी कार्रवाई खत्म, डिजिटल शुरुआत: उत्तराखंड सरकार ने शादी और लिव-इन के रजिस्ट्रेशन के लिए एक ऑनलाइन portal शुरू किया है। यह पूरी प्रक्रिया अब 100% पेपरलेस और डिजिटल हो चुकी है। इसका सीधा फायदा यह हुआ है कि दफ्तरों के चक्कर काटने और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिली है।
2. विश्लेषणात्मक वर्गीकरण (Analytical Breakdown)
यदि आप परीक्षा में अच्छे अंक पाना चाहते हैं, तो आपको इस संवेदनशील मुद्दे को केवल एक नजरिए से नहीं, बल्कि इसके विभिन्न आयामों के चश्मे से देखना होगा। आइए, इसके पक्ष और विपक्ष के प्रमुख तर्कों का विश्लेषण करते हैं:
क. लैंगिक न्याय और मानवाधिकार (आधी आबादी को अधिकार)
यह कड़वा सच है कि अधिकांश पारंपरिक पारिवारिक कानून पुरुषों के पक्ष में झुके हुए हैं और महिलाओं के अधिकारों को दबाते हैं। यूसीसी का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत पक्ष यही है कि यह धर्म से ऊपर उठकर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देता है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड के नए नियमों को देखिए: अब वहां सभी धर्मों की लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष तय कर दी गई है। इसके साथ ही, महिलाओं के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाली बहुविवाह (Polygamy) प्रथा को पूरी तरह बैन कर दिया गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) को जमीन पर उतारता है। सबसे खास बात यह है कि अब बेटियों को भी बेटों की तरह माता-पिता की संपत्ति में बराबर का हक मिलेगा, चाहे वह संपत्ति पैतृक हो या माता-पिता द्वारा खुद कमाई गई हो।
ख. सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकीकरण (एक देश, एक कानून)
भारत विविधताओं का देश है, लेकिन अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून होने से कई बार समाज में दूरियां और तनाव पैदा हो जाता है। जब देश के सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून होगा, तो उनके भीतर “एक राष्ट्र, एक कानून” की भावना पैदा होगी। यह कानून विवाह, तलाक और संपत्ति जैसे दीवानी मामलों को मजहब की दीवार से अलग करता है। इससे नागरिकों में धार्मिक पहचान के बजाय एक साझा भारतीय पहचान मजबूत होती है, जो देश की एकता के लिए बेहद जरूरी है।
ग. लिव-इन रिलेशनशिप का नियमन: सुरक्षा और निजता की जंग
उत्तराखंड यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन सबसे ज्यादा चर्चा और विवाद का विषय रहा है। खासकर 2026 के नए संशोधनों के बाद इस पर बहस और तेज हो गई है। इसे आप सिक्के के दो पहलुओं की तरह समझ सकते हैं:
- सुरक्षा का पहलू (समर्थकों का रुख): समर्थकों का मानना है कि यह नियम उन महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा जो लिव-इन संबंधों में हिंसा या धोखे का शिकार हो जाती हैं। इसके अलावा, ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों को समाज में ‘नाजायज’ नहीं कहा जा सकेगा; उन्हें कानूनी मान्यता मिलेगी और वे माता-पिता की संपत्ति के हकदार होंगे।
- निजता का पहलू (आलोचकों का रुख): दूसरी तरफ, आलोचकों का कहना है कि दो वयस्कों के आपसी संबंधों में सरकार का दखल देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निजता के अधिकार (Right to Privacy) का सीधा उल्लंघन है। रजिस्ट्रेशन न कराने पर जेल की सजा का प्रावधान पुलिस को लोगों के निजी जीवन में तांक-झांक करने का मौका दे सकता है, जिससे ‘पुलिस राज’ का खतरा बढ़ जाता है।
घ. धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सुधार: अल्पसंख्यकों का डर
हमारा संविधान अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और उसके अनुसार आचरण करने की आजादी देता है। ऐसे में अल्पसंख्यक समुदायों (विशेषकर मुस्लिम और ईसाई) को यह डर सता रहा है कि यूसीसी लागू होने से उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों और उनकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान खत्म हो जाएगी। वे इसे अपनी आस्था पर बहुसंख्यक वर्ग के विचारों को थोपने की कोशिश के रूप में देखते हैं। हालांकि, यूसीसी के पैरोकारों का कहना है कि शादी और उत्तराधिकार जैसे मामले सामाजिक मुद्दे हैं, न कि विशुद्ध रूप से धार्मिक। संविधान का अनुच्छेद 25(2) सरकार को समाज सुधार और कल्याण के लिए इन सामाजिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का पूरा अधिकार देता है।
ङ. आदिवासियों को छूट: क्या ‘समान’ कानून सच में समान है?
भारत के आदिवासी क्षेत्रों (जैसे पूर्वोत्तर राज्यों) के अपने विशेष पारंपरिक कानून हैं। इन परंपराओं को बचाने के लिए हमारे संविधान की छठी अनुसूची और अनुच्छेद 371 (जैसे नगालैंड के लिए 371A और मिजोरम के लिए 371G) के तहत विशेष सुरक्षा दी गई है। उत्तराखंड सरकार ने भी अपने यूसीसी से वहां की अनुसूचित जनजातियों (ST) को बाहर रखा है। लेकिन इस छूट ने एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है: अगर हम देश की सांस्कृतिक विविधता को बचाने के नाम पर आदिवासियों को छूट दे सकते हैं, तो यही तर्क दूसरे धार्मिक समुदायों पर क्यों लागू नहीं हो सकता? यह अपवाद यूसीसी के ‘समानता’ वाले मूल दावे को कहीं न कहीं थोड़ा कमजोर जरूर करता है।
च. संघवाद की चुनौती: राज्यों के अलग-अलग नियम
आपको यह ध्यान रखना होगा कि हमारे संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची (Concurrent List – प्रविष्टि 5) में आते हैं। यानी, केंद्र सरकार और राज्य सरकारें दोनों ही इन मुद्दों पर अपने-अपने कानून बना सकती हैं। अब जरा सोचिए, यदि उत्तराखंड अपना अलग यूसीसी बनाता है, गुजरात अपना अलग और राजस्थान अपना अलग, तो क्या पूरे देश के लिए एक समान कानून का सपना कभी पूरा हो पाएगा? इससे देश में कानूनी रूप से एक अजीब और बिखरी हुई स्थिति पैदा हो सकती है, जो पूरे भारत में एक जैसे कानून (एकरूपता) के उद्देश्य को ही बेअसर कर देगी।
व्यक्तिगत कानूनों और प्रस्तावित यूसीसी मॉडल का तुलनात्मक विश्लेषण
3. पाठ्यक्रम संबद्धता तालिका (Syllabus Linkage Table)
सिविल सेवा परीक्षा (UPSC/MPSC) की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। आपकी तैयारी को आसान बनाने के लिए, हमने इसे आपके सिलेबस के साथ लिंक कर दिया है, ताकि आप जान सकें कि आपको इसे मुख्य परीक्षा में कहाँ उपयोग करना है:
4. अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न (Practice Prelims MCQ)
अपनी तैयारी को परखने के लिए इस बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) को हल करने का प्रयास कीजिए:
प्रश्न: समान नागरिक संहिता (UCC) और भारतीय संविधान के भाग IV के संदर्भ में, नीचे दिए गए कथनों पर विचार कीजिए:
- संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का प्रावधान है। ये नियम अदालतों द्वारा लागू (enforceable) नहीं करवाए जा सकते, लेकिन देश के शासन को चलाने के लिए बुनियादी महत्व रखते हैं।
- उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2026 के समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश के तहत सरकारी दस्तावेजों से ‘विधवा’ (widow) शब्द को हटाकर उसकी जगह लैंगिक रूप से निष्पक्ष ‘पति/पत्नी’ (spouse) शब्द का इस्तेमाल अनिवार्य किया है।
- विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) पूरी तरह से संविधान की सातवीं अनुसूची की ‘संघ सूची’ (Union List) के विषय हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
विस्तृत व्याख्या:
सही उत्तर: (a) केवल 1 और 2
कथन 1 सही क्यों है? हमारे संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) का अनुच्छेद 44 साफ कहता है कि सरकार पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करेगी। वहीं, अनुच्छेद 37 यह स्पष्ट करता है कि भाग IV के नियमों को लागू करवाने के लिए आप किसी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते (ये non-justiciable हैं)। लेकिन यह देश के शासन के लिए मूलभूत हैं और कोई भी नया कानून बनाते समय सरकार को इन्हें ध्यान में रखना ही होगा। इसलिए, पहला कथन बिल्कुल सही है।
कथन 2 सही क्यों है? उत्तराखंड सरकार ने जनवरी 2026 में जो समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश जारी किया, उसमें लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया। सरकार ने पुरानी पितृसत्तात्मक सोच को बदलते हुए कानूनी दस्तावेजों में “विधवा” (widow) शब्द की जगह जेंडर-न्यूट्रल शब्द “पति/पत्नी” (spouse) लिखना अनिवार्य किया। इसका उद्देश्य महिलाओं को बराबरी का हक देना और उनके प्रति सामाजिक सम्मान को बढ़ाना है। इसलिए, दूसरा कथन भी सही है।
कथन 3 गलत क्यों है? ध्यान रखिए, विवाह, तलाक, संपत्ति का उत्तराधिकार, गोद लेना और गुजारा भत्ता जैसे व्यक्तिगत कानून हमारी सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (Concurrent List – प्रविष्टि 5) के हिस्से हैं, न कि संघ सूची के। इसका सीधा मतलब यह है कि संसद के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं को भी इस पर कानून बनाने की शक्ति हासिल है। यही वजह है कि उत्तराखंड सरकार ने अपने स्तर पर यूसीसी लागू कर दिया। अगर यह केवल संघ सूची में होता, तो ऐसा करना राज्यों के बस में नहीं था। इसलिए, तीसरा कथन गलत है।
5. अभ्यास मुख्य परीक्षा प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)
मुख्य परीक्षा (Mains) में उत्तर लिखने की शैली को सुधारने के लिए इस प्रश्न को हल करने का अभ्यास करें:
प्रश्न: “समान नागरिक संहिता (UCC) को पूरे देश में लागू करने के लिए भारत को अपने बहु-सांस्कृतिक ताने-बाने (Multiculturalism) और महिलाओं के समानता के अधिकार (Gender Equality) के बीच एक बेहद बारीक संतुलन बनाना होगा।” उत्तराखंड के हालिया कानूनी प्रयोग और 2026 के संशोधनों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन (Critically Evaluate) कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
मॉडल उत्तर का खाका (Model Answer Blueprint):
1. प्रस्तावना (Introduction):
- परिभाषा और संवैधानिक आधार बताइए: यूसीसी का सीधा अर्थ है—सभी नागरिकों के लिए शादी, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे दीवानी मामलों में एक समान कानून बनाना, जैसा कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 44 (DPSP) में लिखा है।
- वर्तमान संदर्भ से जोड़ें: उत्तराखंड द्वारा 27 जनवरी 2025 को देश का पहला यूसीसी लागू करने और फिर जनवरी 2026 में ‘समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश’ लाने के फैसले ने राष्ट्रीय स्तर पर इस बहस को और तेज कर दिया है।
2. मुख्य भाग (Body):
क. लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में उठाए गए प्रगतिशील कदम:
- महिलाओं को न्याय दिलाना: बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाकर, निकाह हलाला जैसी प्रथाओं को खत्म करके और शादी की न्यूनतम उम्र को सख्ती से लागू करके। यह कदम अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के साथ हो रहे ऐतिहासिक भेदभाव को मिटाता है।
- विरासत में बेटी को बराबर का दर्जा: अब बेटे और बेटी को संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलेगा। 2026 के संशोधनों ने “विधवा” शब्द की जगह जेंडर-न्यूट्रल “पति/पत्नी” शब्द लाकर समानता को और मजबूती दी है।
- लिव-इन संबंधों में सुरक्षा: लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के अनिवार्य पंजीकरण से महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलती है और उनसे पैदा होने वाले बच्चों को समाज में कानूनी मान्यता मिलती है।
ख. बहुसंस्कृतिवाद और संवैधानिक चुनौतियाँ:
- धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल (अनुच्छेद 25-28): अल्पसंख्यक समुदायों को डर है कि यूसीसी उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों और संस्कृति को खत्म कर देगा। भारतीय धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों को समान आदर देने की वकालत करती है, न कि जबरन एकरूपता थोपने की।
- आदिवासियों को छूट देने का अंतर्विरोध: उत्तराखंड ने अपनी अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा है। यह कदम यूसीसी के “समान” होने के दावे पर सवाल खड़े करता है। यदि आदिवासियों को उनकी अनूठी संस्कृति के नाम पर छूट मिल सकती है, तो अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को क्यों नहीं?
- निजता का हनन (अनुच्छेद 21): लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण न कराने पर जेल की सजा का प्रावधान (जो BNS के तहत तय किया गया है) लोगों की व्यक्तिगत आजादी में सरकार के अनावश्यक दखल को दर्शाता है। पुट्टास्वामी फैसले (2017) के बाद निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जिसका सम्मान होना चाहिए।
- संघीय व्यवस्था में उलझन: यदि हर राज्य समवर्ती सूची का उपयोग करके अपना अलग-अलग यूसीसी मॉडल बनाने लगेगा, तो देश में एक समान कानून के बजाय कानूनी अराजकता पैदा हो जाएगी।
3. आगे की राह (Way Forward):
- आम सहमति और लोकतांत्रिक चर्चा: सरकार को सभी धार्मिक संगठनों, आदिवासी समूहों और नागरिक समाज के साथ खुलकर बात करनी चाहिए ताकि आम सहमति बन सके। हमें विधि आयोग (Law Commission) के सुझावों के अनुसार सुधारवादी तरीका अपनाना चाहिए।
- धीरे-धीरे होने वाले सुधार (Incremental Reforms): एक ही बार में पूरे देश पर एक नया कोड थोपने के बजाय, सरकार को पहले विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण और महिला-विरोधी नियमों को बदलने पर ध्यान देना चाहिए।
- प्रशासनिक पारदर्शिता: उत्तराखंड के 2026 के मॉडल की तर्ज पर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को डिजिटल और आसान बनाना चाहिए। नए आपराधिक कानूनों (BNS/BNSS) के साथ तालमेल तो बिठाएं, लेकिन साथ ही नागरिकों की निजता का पूरा सम्मान भी करें।
- निष्कर्ष: यूसीसी का असली उद्देश्य देश में जबरन एकरूपता (Uniformity) थोपना नहीं होना चाहिए। इसका मूल लक्ष्य समानता और सामाजिक न्याय (Equality and Social Justice) स्थापित करना होना चाहिए। हमें भारत की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखते हुए मानवीय गरिमा को सबसे ऊपर रखना होगा।
यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है।
