आइए सबसे पहले समझते हैं कि पश्चिमी घाट में भूस्खलन और संरक्षण का यह मुद्दा समाचारों में क्यों है
जुलाई २०२६ में भारी मानसूनी वर्षा के आगमन ने पश्चिमी घाट के नाजुक क्षेत्रों में एक बार फिर विनाशकारी भूस्खलन की घटनाओं को जन्म दिया है। विशेष रूप से केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में कई स्थानों पर पहाड़ दरक गए हैं। इन दर्दनाक घटनाओं के कारण बड़े पैमाने पर जनहानि हुई है, स्थानीय लोगों का पलायन हुआ है और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। इसके परिणामस्वरूप, इन बार-बार होने वाली आपदाओं ने पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण विवाद को देश के सामने फिर से खड़ा कर दिया है। पर्यावरणविद और नीति निर्माता एक बार फिर माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल और उसके बाद अंतरिक्ष वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में गठित उच्च-स्तरीय कार्य समूह की सिफारिशों को लागू करने में हुई देरी पर सवाल उठा रहे हैं। हालिया घटनाओं से यह स्पष्ट हो गया है कि संरक्षण के उपायों को टालने से भारी पारिस्थितिक कीमत चुकानी पड़ रही है। साथ ही यह आपदा क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा और इस जैव विविधता हॉटस्पॉट के संरक्षण के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता को दर्शाती है।
आइए सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए इस विषय की पाठ्यक्रम प्रासंगिकता को समझते हैं
संघ लोक सेवा आयोग और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है। मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन पेपर तीन के अंतर्गत यह पर्यावरण, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन और सतत विकास जैसे उप-विषयों से सीधे जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही विभिन्न राज्य स्तर की परीक्षाओं में भी यह पर्यावरण संरक्षण और आपदा न्यूनीकरण रणनीतियों के संदर्भ में पूछा जाता है। विकास बनाम संरक्षण के संघर्ष, गाडगिल और कस्तूरीरंगन रिपोर्टों के तुलनात्मक विश्लेषण और भूस्खलन के भौगोलिक कारणों को समझना परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।
आइए पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक महत्व को विस्तार से समझते हैं
पश्चिमी घाट, जिसे सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के रूप में भी जाना जाता है, हिमालय से भी पुरानी और जैविक रूप से अत्यधिक समृद्ध पर्वत प्रणाली है। लगभग एक हजार छह सौ किलोमीटर लंबी यह पर्वत श्रृंखला भारत के पश्चिमी तट के समानांतर फैली हुई है, जो छह राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर गुजरती है। इस क्षेत्र को दुनिया के आठ सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक माना जाता है। इसे प्रायद्वीपीय भारत का जल मीनार भी कहा जाता है क्योंकि गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदियों का उद्गम इसी क्षेत्र से होता है। ये नदियां करोड़ों लोगों की कृषि, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करती हैं। पश्चिमी घाट में जैविक स्थानिकता का स्तर बहुत ऊंचा है, जिसका अर्थ है कि यहां पाए जाने वाले अनेक जीव दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते। नीलगिरि तहर, शेर जैसी पूंछ वाला बंदर जिसे लायन-टैल्ड मकाक कहते हैं, और अनेक दुर्लभ उभयचर प्राणी तथा वनस्पतियां इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस असाधारण मूल्य के कारण यूनेस्को ने पश्चिमी घाट को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है, जो वैश्विक पर्यावरण संतुलन और मानसून नियमन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
आइए मानसून के दौरान भूस्खलन संवेदनशीलता के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करते हैं
जुलाई २०२६ में हुए भूस्खलन हादसों ने मानसून के दौरान इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर किया है। इसके पीछे कई प्राकृतिक और मानवनिर्मित कारक जिम्मेदार हैं। मुख्य भौगोलिक कारक इस क्षेत्र के तीव्र ढलान, चट्टानों का अत्यधिक अपक्षय और मिट्टी की मोटी परत हैं। मानसून के दौरान इन ढलानों पर भारी और लगातार वर्षा होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब कम समय में अत्यधिक वर्षा होने की घटनाएं बढ़ गई हैं। यह तीव्र वर्षा मिट्टी को जल्दी से संतृप्त कर देती है, जिससे मिट्टी का वजन बढ़ जाता है और उसकी जकड़न कमजोर हो जाती है। मिट्टी की परतों के बीच पानी का दबाव बढ़ने से ढलान खिसकने लगते हैं और तीव्र गति से कीचड़ और मलबा नीचे की ओर बहने लगता है। प्राकृतिक कारणों के अलावा इंसानी गतिविधियों ने भी इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, सड़कों और रिसॉर्ट्स के निर्माण के लिए पहाड़ों की अवैज्ञानिक कटाई और चाय या रबर जैसी एकल कृषि पद्धतियों के विस्तार ने मिट्टी की पकड़ को कमजोर कर दिया है। इसके अलावा, केरल और कर्नाटक के कई हिस्सों में सॉइल पाइपिंग नामक घटना देखी गई है, जहां भूमिगत जल जमीन के नीचे खोखली सुरंगें बना देता है। यह आंतरिक कटाव भूमि को और अधिक अस्थिर कर देता है, जिससे भारी बारिश में पहाड़ अचानक ढह जाते हैं
आइए माधव गाडगिल समिति रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों की समीक्षा करते हैं
वर्ष २०१० में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने प्रसिद्ध पर्यावरणविद् माधव गाडगिल के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया था। २०११ में सौंपी गई इस रिपोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक बेहद कड़ा दृष्टिकोण अपनाया। समिति ने सिफारिश की थी कि संपूर्ण पश्चिमी घाट क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए। इसके बाद इस क्षेत्र को संवेदनशीलता के आधार पर तीन श्रेणियों, जोन एक, जोन दो और जोन तीन में बांटा गया। सबसे संवेदनशील जोन एक में खनन, पत्थर उत्खनन, नए ताप विद्युत संयंत्रों, बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं और लाल श्रेणी के प्रदूषणकारी उद्योगों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया गया था। गाडगिल रिपोर्ट ने नीचे से ऊपर के निर्णय लेने के मॉडल की वकालत की, जिसमें विकास और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े फैसलों का अंतिम अधिकार स्थानीय ग्राम सभाओं को देने की बात कही गई थी। इसके अलावा, जैविक खेती को बढ़ावा देने, पुराने बांधों को हटाने और वन भूमि के व्यावसायिक उपयोग पर पूर्ण रोक लगाने की सिफारिश भी की गई थी।
आइए कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशों को समझते हैं
माधव गाडगिल समिति की कड़ी सिफारिशों का राज्य सरकारों, स्थानीय राजनेताओं और उद्यमियों ने विरोध किया। उनका तर्क था कि इस तरह के प्रतिबंधों से विकास रुक जाएगा और लोगों का रोजगार छिन जाएगा। इसके जवाब में सरकार ने २०१२ में अंतरिक्ष वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह का गठन किया। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने वर्गीकरण के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। संपूर्ण पश्चिमी घाट को संवेदनशील घोषित करने के बजाय उन्होंने इसे दो हिस्सों में विभाजित किया, सांस्कृतिक परिदृश्य और प्राकृतिक परिदृश्य। मानव बस्तियों, कृषि भूमि और वृक्षारोपण वाले सांस्कृतिक परिदृश्य को, जो कुल क्षेत्र का ६३ प्रतिशत है, कड़े नियमों से बाहर रखा गया। केवल शेष ३७ प्रतिशत प्राकृतिक जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों को ही संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई। इस ३७ प्रतिशत क्षेत्र में खनन, रेत उत्खनन और लाल श्रेणी के बड़े उद्योगों पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन अन्य विकास गतिविधियों को कड़े नियमों के तहत अनुमति दी गई। इस रिपोर्ट ने ग्राम सभाओं के बजाय प्रशासनिक और नौकरशाही नियंत्रण को प्राथमिकता दी।
आइए गाडगिल रिपोर्ट और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के दृष्टिकोण की तुलना करते हैं
दोनों रिपोर्टों के बीच का अंतर पर्यावरण संरक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के अंतर को दर्शाता है। माधव गाडगिल रिपोर्ट ने पर्यावरण की सुरक्षा को सर्वोपरि माना और पूरे पश्चिमी घाट को एक एकल पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा। उनका ध्यान जनभागीदारी और शाश्वत विकास मॉडल पर था। इसके विपरीत, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक व्यावहारिक समझौता करने का प्रयास किया। केवल ३७ प्रतिशत क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करके उन्होंने मानवीय गतिविधियों और विकास योजनाओं को कम से कम प्रभावित करने की कोशिश की। गाडगिल रिपोर्ट को अत्यधिक सख्त और अव्यावहारिक माना गया, जबकि पर्यावरणविदों ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की आलोचना की क्योंकि इसने ६३ प्रतिशत क्षेत्र को व्यावसायिक दोहन के लिए खुला छोड़ दिया। जुलाई २०२६ की आपदाएं यह दर्शाती हैं कि व्यावहारिकता के नाम पर की गई ढिलाई पहाड़ी ढलानों को असुरक्षित बना रही है।
आइए विकास बनाम संरक्षण के बीच छिड़े इस विवाद का विश्लेषण करते हैं
पश्चिमी घाट के विवाद का मूल कारण विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की कमी है। इस क्षेत्र के छह राज्य तर्क देते हैं कि बढ़ती आबादी और औद्योगिक जरूरतों के लिए सड़कों, बिजली लाइनों और बांधों का निर्माण जरूरी है। लाखों लोग आजीविका के लिए कृषि और पर्यटन पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, वैज्ञानिकों का मानना है कि आपदाओं से होने वाला आर्थिक नुकसान तात्कालिक लाभ से कहीं अधिक है। भूस्खलन और बाढ़ से घरों, फसलों और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान होता है जिससे सरकारी खजाने पर राहत का बोझ बढ़ता है। साथ ही पश्चिमी घाट का विनाश पूरे दक्षिण भारत के मानसून चक्र और जल सुरक्षा को खतरे में डालता है। इसलिए पर्यावरण को विकास का रोड़ा मानना गलत है, क्योंकि दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति स्वस्थ पर्यावरण पर ही टिकी है।
आइए पश्चिमी घाट के सतत संरक्षण के लिए आगे की राह पर चर्चा करते हैं
इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को चरमपंथी विचारों को छोड़कर एक संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। पहला कदम उपग्रह मैपिंग की मदद से भूस्खलन प्रवण क्षेत्रों का सटीक सीमांकन करना है। तीव्र ढलान वाले पहाड़ों पर बड़े निर्माण कार्यों और रिसॉर्ट्स पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। दूसरा, निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय ग्राम सभाओं को शामिल किया जाना चाहिए। स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना कोई भी पर्यावरण नीति सफल नहीं हो सकती, इसलिए उन्हें जैविक खेती और हरित नौकरियों के जरिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। तीसरा, सभी छह राज्यों को मिलकर एक साझा पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण का गठन करना चाहिए ताकि नीतियों में तालमेल बना रहे। चौथा, डॉपलर रडार और स्वचालित वर्षा मापी यंत्रों के साथ पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए। अंत में, ढलानों पर गहरी जड़ों वाले स्थानीय वृक्षों का रोपण करके मिट्टी की पकड़ मजबूत की जानी चाहिए।
आइए अभ्यास के लिए प्रारंभिक परीक्षा के एक बहुविकल्पीय प्रश्न को हल करते हैं
पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए गठित समितियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा या से कथन सही हैं?
कथन एक. माधव गाडगिल के नेतृत्व वाले विशेषज्ञ पैनल ने पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की थी।
कथन दो. के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाले कार्य समूह ने केवल सैंतीस प्रतिशत पश्चिमी घाट क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने का सुझाव दिया था।
कृपया नीचे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन करें।
विकल्प अ. केवल कथन एक सही है।
विकल्प ब. केवल कथन दो सही है।
विकल्प स. कथन एक और कथन दो दोनों सही हैं।
विकल्प द. न तो कथन एक और न ही कथन दो सही है।
इस प्रश्न का सही उत्तर विकल्प स है। दोनों कथन सही हैं। माधव गाडगिल समिति ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा का समर्थन किया था, जबकि कस्तूरीरंगन समिति ने विकास को ध्यान में रखते हुए केवल सैंतीस प्रतिशत भाग को संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी।
आइए मुख्य परीक्षा के अभ्यास प्रश्न और उसके मॉडल उत्तर के मुख्य बिंदुओं को देखते हैं
प्रश्न. पश्चिमी घाट के संरक्षण पर माधव गाडगिल समिति और के कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के बीच मुख्य अंतरों का मूल्यांकन कीजिए। मानसून के दौरान बार-बार होने वाले भूस्खलन के संदर्भ में इस क्षेत्र के लिए एक सतत और व्यावहारिक मार्ग सुझाइए।
उत्तर की संरचना के लिए मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं। प्रस्तावना में पश्चिमी घाट के महत्व और हालिया जुलाई २०२६ के भूस्खलन जैसी घटनाओं का उल्लेख करें जो संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। मुख्य भाग में दोनों रिपोर्टों के वर्गीकरण के तरीकों, ग्राम सभा की शक्तियों और विकास गतिविधियों पर प्रतिबंधों के अंतर को स्पष्ट करें। समझाएं कि गाडगिल रिपोर्ट ने पर्यावरण को प्राथमिकता दी जबकि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। इसके बाद, संरक्षण नीतियों के लागू न होने और अवैज्ञानिक विकास से बढ़ी संवेदनशीलता पर चर्चा करें। निष्कर्ष में सतत उपायों जैसे तीव्र ढलानों पर निर्माण निषेध, संयुक्त प्राधिकरण का गठन, अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर वनरोपण का सुझाव दें।
इस विषय के संपूर्ण विश्लेषण, यूपीएससी मुख्य परीक्षा के मॉडल उत्तर और जीएस पाठ्यक्रम मैपिंग के लिए, IASEasyWay.com पर जाएं। इसका लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में दिया गया है।
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