पश्चिमी घाट संरक्षण और भूस्खलन संवेदनशीलता — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन (14 जुलाई 2026) – दैनिक समसामयिकी
क्या आपने सोचा है कि पश्चिमी घाट में बार-बार भूस्खलन क्यों हो रहा है और यह विवाद चर्चा में क्यों है?
जुलाई 2026 के भीषण मानसून ने एक बार फिर पश्चिमी घाट के नाजुक ढलानों को झकझोर कर रख दिया है। केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के तटीय इलाकों से आ रही पहाड़ दरकने और मलबे में तब्दील होते आशियानों की तस्वीरें बेहद परेशान करने वाली हैं। इन हादसों ने न केवल बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया है, बल्कि हजारों परिवारों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया है।
इस तबाही ने देश के सामने एक पुराना और गंभीर सवाल फिर से खड़ा कर दिया है: हम पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक संरक्षण को लेकर इतने लापरवाही क्यों बरत रहे हैं? आज पर्यावरणविद और नीति निर्माता सीधे सवाल उठा रहे हैं कि माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले ‘पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल’ (WGEEP) और अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अगुवाई वाले ‘उच्च-स्तरीय कार्य समूह’ (HLWG) की सिफारिशों पर बरसों से धूल क्यों जम रही है? सरकार ने इन सुरक्षात्मक कदमों को उठाने में जो देरी की है, उसकी भारी कीमत आज वहां के निर्दोष लोग अपनी जान देकर चुका रहे हैं। यह आपदा चीख-चीखकर कह रही है कि अब हमें लोगों की सुरक्षा और इस अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र के बीच एक मजबूत संतुलन बनाना ही होगा।
UPSC/MPSC सिविल सेवा परीक्षा के लिए यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है?
अगर आप सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो इस विषय की गहराई को समझना आपके लिए अनिवार्य है। मुख्य परीक्षा (Mains) के सामान्य अध्ययन पेपर-3 (GS-3) में यह टॉपिक सीधे तौर पर कई महत्वपूर्ण उप-विषयों को छूता है।
पश्चिमी घाट का पारिस्थितिक मूल्य: यह सिर्फ पहाड़ नहीं, हमारी जीवन रेखा है
पश्चिमी घाट को केवल पहाड़ों की एक कतार समझना भूल होगी। इसे हम सह्याद्रि भी कहते हैं, और यह पर्वत श्रृंखला विशाल हिमालय से भी पुरानी तथा जैविक रूप से कहीं अधिक समृद्ध है। लगभग 1600 किलोमीटर लंबी यह पर्वत श्रृंखला भारत के पश्चिमी तट के समानांतर फैली हुई है और गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु जैसे छह राज्यों से होकर गुजरती है।
आपको इसे बचाने की जरूरत क्यों है? आइए इसके असाधारण महत्व को समझते हैं:
- प्रायद्वीपीय भारत का जल मीनार (Water Tower): गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी विशाल नदियाँ यहीं से निकलती हैं। ये नदियाँ करोड़ों लोगों के पीने के पानी, खेती और उद्योगों की जरूरतें पूरी करती हैं।
- अनोखी जैव विविधता: यह दुनिया के आठ सबसे महत्वपूर्ण ‘जैव विविधता हॉटस्पॉट’ में से एक है। यहाँ स्थानिक प्रजातियों (Endemic Species) की भरमार है—यानी ऐसे जीव और पौधे जो पूरी दुनिया में सिर्फ यहीं पाए जाते हैं। छलांग लगाता नीलगिरि तहर और इंसानी दाढ़ी जैसा चेहरा रखने वाला शेर जैसी पूंछ वाला बंदर (Lion-tailed Macaque) इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
- वैश्विक धरोहर: इस अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र के कारण ही यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है। यह मानसून की हवाओं को रोककर पूरे भारत के वर्षा चक्र को भी नियंत्रित करता है।
पहाड़ों के दरकने की वैज्ञानिक वजह: मानसून में भूस्खलन क्यों बढ़ जाता है?
जुलाई 2026 में हुई तबाही ने साफ कर दिया है कि बारिश के मौसम में यह पूरा इलाका बेहद असुरक्षित हो जाता है। इसके पीछे प्रकृति और इंसान दोनों की बड़ी भूमिका है।
भौगोलिक और प्राकृतिक कारण:
- तीखे ढलान और कमजोर चट्टानें: यहाँ के पहाड़ों के ढलान बहुत सीधे और खड़े हैं, जिन पर मिट्टी की मोटी और ढीली परत जमी है।
- बादल फटना और मूसलाधार बारिश: जलवायु परिवर्तन ने वर्षा के पैटर्न को बदल दिया है। अब कुछ ही घंटों में बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है। यह पानी जब मिट्टी में भरता है, तो मिट्टी स्पंज की तरह फूल जाती है। पानी के बढ़ते दबाव के कारण मिट्टी भारी होकर ढलान से फिसलने लगती है और देखते ही देखते भारी मलबा नीचे आ गिरता है।
मानव-जनित कारण (Human Factors):
इंसानों ने जंगलों को काटकर पहाड़ों को और कमजोर कर दिया है। चौड़ी सड़कें बनाने और पर्यटकों के लिए रिसॉर्ट्स खड़े करने के लिए लोग पहाड़ों को अवैज्ञानिकी तरीके से काट रहे हैं। चाय और रबर जैसी एकल कृषि (Monoculture Plantation) ने प्राकृतिक जंगलों की जगह ले ली है। इन कृत्रिम बागानों के पेड़ों की जड़ें जंगली पेड़ों की तरह मिट्टी को बांधकर नहीं रख पातीं।
सॉइल पाइपिंग (Soil Piping) की गंभीर समस्या:
केरल और कर्नाटक के पहाड़ी इलाकों में एक खतरनाक प्राकृतिक प्रक्रिया देखी गई है जिसे ‘सॉइल पाइपिंग’ कहते हैं। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे किसी पुरानी दीवार के अंदर ही अंदर पानी का रिसाव होने से वह खोखली हो जाती है। ठीक वैसे ही, जमीन के नीचे बहने वाला पानी मिट्टी को धीरे-धीरे बहा ले जाता है और भूमिगत सुरंगें बना देता है। सतह ऊपर से सामान्य दिखती है, लेकिन नीचे की खोखली जमीन भारी बारिश का बोझ सह नहीं पाती और अचानक धंस जाती है।
माधव गाडगिल समिति (2011): संरक्षण के लिए एक सख्त और कड़ा खाका
साल 2010 में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जाने-माने पर्यावरणविद माधव गाडगिल की अगुवाई में एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया। इस पैनल ने 2011 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें पर्यावरण को बचाने के लिए बेहद कड़े कदम उठाने की सिफारिश की गई थी:
- पूरे क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करना: गाडगिल समिति ने सिफारिश की कि पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित किया जाए।
- तीन स्तर का वर्गीकरण: उन्होंने इस पूरे क्षेत्र को संवेदनशीलता के आधार पर जोन-1, जोन-2 और जोन-3 में विभाजित किया।
- कठोर पाबंदियां: सबसे संवेदनशील जोन-1 में खनन, पत्थर उत्खनन (Quarrying), नए थर्मल पावर प्लांट और बड़ी पनबिजली परियोजनाओं पर पूरी तरह रोक लगाने की बात कही गई।
- ग्राम सभाओं को सर्वोच्च शक्ति: रिपोर्ट ने निर्णय लेने के ‘नीचे से ऊपर’ (Bottom-up) के मॉडल का समर्थन किया। समिति का मानना था कि किसी भी विकास परियोजना को हरी झंडी देने का अंतिम अधिकार स्थानीय ग्राम सभा के पास होना चाहिए, न कि सरकारी विभागों के पास।
के. कस्तूरीरंगन समिति (2013): विकास और पर्यावरण के बीच समझौते का प्रयास
गाडगिल समिति की बेहद सख्त सिफारिशों का राज्य सरकारों, स्थानीय नेताओं और व्यावसायिक समूहों ने कड़ा विरोध किया। उनका दावा था कि इन प्रतिबंधों से विकास के सारे काम ठप हो जाएंगे और स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी छिन जाएगी। इस गतिरोध को खत्म करने के लिए सरकार ने 2012 में अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह बनाया।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने एक व्यावहारिक रास्ता निकालने की कोशिश की:
- दो हिस्सों में विभाजन: उन्होंने पूरे पश्चिमी घाट को दो श्रेणियों में बांटा—’सांस्कृतिक परिदृश्य’ और ‘प्राकृतिक परिदृश्य’।
- 63% हिस्से को छूट: मानव बस्तियों, कृषि भूमि और बागानों वाले ‘सांस्कृतिक परिदृश्य’ (कुल क्षेत्र का 63%) को इन कड़े नियमों के दायरे से बाहर रखा गया।
- केवल 37% क्षेत्र का संरक्षण: उन्होंने केवल बचे हुए 37% प्राकृतिक जंगलों और वन्यजीव क्षेत्रों को ही संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की। इस सीमित क्षेत्र में उन्होंने खनन और भारी प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया, जबकि अन्य ढांचागत परियोजनाओं को कड़े नियमों के तहत अनुमति देने का सुझाव दिया।
- प्रशासनिक नियंत्रण: निर्णय लेने की प्रक्रिया में उन्होंने स्थानीय ग्राम सभाओं की जगह प्रशासनिक अधिकारियों और नौकरशाही को अधिक प्राथमिकता दी।
गाडगिल बनाम कस्तूरीरंगन: दोनों दृष्टिकोणों का तुलनात्मक विश्लेषण
इन दोनों रिपोर्टों के बीच की खाई वास्तव में पर्यावरण बनाम आर्थिक विकास की बुनियादी लड़ाई को दर्शाती है।
माधव गाडगिल ने प्रकृति की सुरक्षा को सर्वोपरि माना। उन्होंने पूरे पश्चिमी घाट को एक अखंड और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा और स्थानीय लोगों की राय को नीति का आधार बनाया। हालांकि, उनकी इस योजना को बहुत ज्यादा आदर्शवादी और अव्यावहारिक मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
दूसरी तरफ, कस्तूरीरंगन समिति ने उद्योगों और विकास को ध्यान में रखते हुए बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने केवल 37% हिस्से को सुरक्षित रख कर 63% हिस्से को मानवीय गतिविधियों के लिए खुला छोड़ दिया। पर्यावरणविदों का आरोप है कि इसी ढिलाई ने व्यावसायिक लॉबी को बढ़ावा दिया और आज पहाड़ी ढलान पहले से कहीं ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं।
विकास बनाम संरक्षण का द्वंद्व: क्या दोनों साथ-साथ चल सकते हैं?
हम अक्सर विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखते हैं, जो एक बहुत बड़ी भूल है। छह राज्य सरकारें लगातार तर्क देती हैं कि बढ़ती आबादी के लिए चौड़ी सड़कें, बांध और बिजली परियोजनाएं जरूरी हैं। वे पर्यटन और कृषि को रोजगार का मुख्य जरिया मानती हैं।
लेकिन आपको इस सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना होगा। जब भी कोई बड़ी आपदा या भूस्खलन होता है, तो जान-माल का जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई करने और पुनर्वास में सरकार को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। क्या यह आर्थिक नुकसान नहीं है? पर्यावरण को दांव पर लगाकर हासिल किया गया कोई भी विकास स्थायी नहीं हो सकता। दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति तभी मुमकिन है जब हमारा पर्यावरण सुरक्षित और स्वस्थ हो।
आगे की राह: हमें कौन से वैज्ञानिक और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे?
अब समय आ गया है कि हम किसी भी एक अतिवादी विचार को छोड़कर एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक रणनीति अपनाएं। हमें तुरंत निम्नलिखित पांच कदम उठाने होंगे:
- जोखिम वाले क्षेत्रों की सटीक पहचान (Micro-Zoning): सैटेलाइट मैपिंग की मदद से भूस्खलन के प्रति सबसे संवेदनशील ढलानों को चिन्हित करें। ऐसे बेहद कमजोर ढलानों पर भारी निर्माण कार्यों और बड़े व्यावसायिक रिसॉर्ट्स के निर्माण को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
- स्थानीय लोगों को भागीदार बनाना: नीतियों को ऊपर से लादने के बजाय स्थानीय ग्राम सभाओं को सशक्त बनाएं। स्थानीय लोगों को जैविक खेती और हरित नौकरियों (Green Jobs) से जोड़कर उनके आर्थिक हितों की रक्षा करें।
- साझा अंतर-राज्यीय प्राधिकरण: पश्चिमी घाट से जुड़े सभी छह राज्यों को मिलकर एक ‘साझा पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण’ (Western Ghats Ecology Authority) का गठन करना चाहिए ताकि नीतियों में दोहराव न हो और पूरा क्षेत्र एक इकाई के रूप में सुरक्षित रहे।
- अत्याधुनिक चेतावनी प्रणालियाँ: संवेदनशील इलाकों में डॉपलर रडार और ऑटोमैटिक रेन गेज स्टेशन स्थापित करें। इससे भारी बारिश का सटीक पूर्वानुमान लगाकर समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा सकेगा।
- पारिस्थितिक सुदृढ़ीकरण (Bio-engineering): ढलानों पर केवल चाय या रबर उगाने के बजाय गहरी जड़ों वाले स्थानीय वृक्षों का रोपण करें। ये पेड़ मिट्टी को प्राकृतिक रूप से जकड़ कर रखेंगे और भूस्खलन के खतरे को कम करेंगे।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Prelims Practice Question)
कथन 1: माधव गाडगिल के नेतृत्व वाले विशेषज्ञ पैनल ने पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की थी।
कथन 2: के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाले कार्य समूह ने केवल 37 प्रतिशत पश्चिमी घाट क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने का सुझाव दिया था।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
- (A) केवल कथन 1
- (B) केवल कथन 2
- (C) कथन 1 और कथन 2 दोनों
- (D) न तो कथन 1 और न ही कथन 2
सही उत्तर: (C) कथन 1 और कथन 2 दोनों
व्याख्या: दोनों ही कथन पूरी तरह सत्य हैं। माधव गाडगिल समिति ने सख्त रुख अपनाते हुए संपूर्ण पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी। इसके ठीक विपरीत, कस्तूरीरंगन समिति ने विकास कार्यों और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए केवल 37 प्रतिशत क्षेत्र (मुख्यतः वनों और संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों) को ही संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का व्यावहारिक प्रस्ताव दिया था।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (GS Mains Practice Question)
प्रश्न. पश्चिमी घाट के संरक्षण पर माधव गाडगिल समिति और के. कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के बीच मुख्य अंतरों का मूल्यांकन कीजिए। मानसून के दौरान बार-बार होने वाले भूस्खलन के संदर्भ में इस क्षेत्र के लिए एक सतत और व्यावहारिक मार्ग सुझाइए। (250 शब्द, 15 अंक)
उत्तर लेखन के लिए मुख्य दिशा-निर्देश (Model Answer Framework):
- प्रस्तावना (Introduction): उत्तर की शुरुआत हाल ही में जुलाई 2026 में पश्चिमी घाट में आए विनाशकारी भूस्खलन की घटनाओं से करें। यह स्पष्ट करें कि क्यों इस संवेदनशील पारिस्थितिकी हॉटस्पॉट का संरक्षण जनसुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- मुख्य भाग – खंड 1 (तुलना): गाडगिल समिति (कठोर रुख, संपूर्ण क्षेत्र संवेदनशील, ग्राम सभा को शक्ति) और कस्तूरीरंगन समिति (व्यावहारिक दृष्टिकोण, केवल 37% क्षेत्र संवेदनशील, प्रशासनिक नियंत्रण) के दृष्टिकोण के अंतर को स्पष्ट बिंदुओं या तालिका में दर्शाएं।
- मुख्य भाग – खंड 2 (भूस्खलन के कारण): स्पष्ट करें कि संरक्षण नीतियों को लागू न करने और अंधाधुंध मानवीय हस्तक्षेप (जैसे पहाड़ों की अवैजिकल कटाई और सॉइल पाइपिंग) ने किस प्रकार इस क्षेत्र में ढलानों को असुरक्षित और विनाशकारी आपदाओं के प्रति संवेदनशील बना दिया है।
- निष्कर्ष / आगे की राह (Conclusion / Way Forward): जैव-इंजीनियरिंग (Bio-engineering), अत्याधुनिक आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों के विकास, अंतर-राज्यीय साझा प्राधिकरण के गठन और स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी के साथ एक व्यावहारिक समाधान का सुझाव देकर उत्तर समाप्त करें।
इस पूरे विषय के गहन विश्लेषण, मुख्य परीक्षा के संपूर्ण मॉडल उत्तर और विस्तृत जीएस पाठ्यक्रम मैपिंग के लिए आप IASEasyWay.com पर जा सकते हैं। इसका लिंक नीचे विवरण में दिया गया है।
यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है।
