समाचार में क्यों?

११ जुलाई २०२६ को मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को तमिलनाडु के पाँच विधानसभा क्षेत्रों — त्रिची पूर्व और चार अन्य — में उपचुनाव की अधिसूचना जारी करने से ३१ जुलाई २०२६ तक अंतरिम निषेधाज्ञा प्रदान की। यह न्यायिक हस्तक्षेप न्यायपालिका और एक संवैधानिक निकाय के बीच के सम्बंध पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।

GS पेपर II पाठ्यक्रम मानचित्रण

  • संवैधानिक निकाय: निर्वाचन आयोग — संरचना, शक्तियाँ, कार्य, स्वतंत्रता.
  • न्यायपालिका: न्यायिक पुनरावलोकन; अनुच्छेद २२६ और २२७ के तहत उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार.
  • शक्तियों का पृथक्करण: संवैधानिक प्राधिकरणों के क्षेत्र में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ.
  • निर्वाचन विधि: उपचुनाव — संवैधानिक जनादेश, रिक्तियाँ और समय-सीमा.

निर्वाचन आयोग — संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद ३२४: मूलभूत प्रावधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३२४ संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचन नामावलियों की तैयारी एवं निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है। यह व्यापक, समग्र और कानून या अधीनस्थ प्राधिकरण द्वारा आसानी से सीमित न किए जाने वाला अधिकार है।

  • अनुच्छेद ३२४(१): निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण ECI में निहित.
  • अनुच्छेद ३२४(२): ECI में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राष्ट्रपति द्वारा नियत संख्या में निर्वाचन आयुक्त होते हैं.
  • अनुच्छेद ३२४(५): मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है — पद की सुरक्षा और स्वतंत्रता.

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता

संवैधानिक संरचना कई तंत्रों के माध्यम से ECI की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है:

  1. पद की सुरक्षा: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों का संबोधन आवश्यक है।
  2. वित्तीय स्वतंत्रता: आयुक्तों का वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है।
  3. व्यापक शक्तियाँ: मोहिंदर सिंह गिल मामले (१९७८) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद ३२४ संवैधानिक शून्यता से बचने के लिए शक्तियों का भंडार है।
  4. कार्यपालिका से स्वतंत्रता: ECI निर्वाचन निर्धारण में कार्यपालिका के निर्देशों का पालन नहीं करता।

उपचुनाव बुलाने की ECI की शक्ति

  • अनुच्छेद १७२: राज्य विधान सभा का पाँच वर्षीय कार्यकाल; बीच में उत्पन्न रिक्तियाँ उपचुनाव अनिवार्य करती हैं।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५१ की धारा १५१A: रिक्ति उत्पन्न होने के छह महिनों के भीतर उपचुनाव कराना अनिवार्य है — कुछ अपवादों के साथ जैसे शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम होना।

ECI की शक्तियों का न्यायिक पुनरावलोकन

संवैधानिक स्थिति

  • अनुच्छेद ३२९(ख): संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी निर्वाचन को निर्वाचन याचिका के अलावा न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। यह एक संवैधानिक अवरोध है।
  • A.C. Jose बनाम Sivan Pillai (1984) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन प्रक्रिया शुरू होने के बाद उच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
  • ECI बनाम अशोक कुमार (२०००): न्यायालयों को चुनावी कार्यक्रम में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए।

उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार की सीमाएँ

उच्च न्यायालयों के पास अनुच्छेद २२६ और २२७ के तहत व्यापक अधिकार हैं, लेकिन ये अनुच्छेद ३२९ के संवैधानिक अवरोध के अधीन हैं। मद्रास उच्च न्यायालय के निषेधाज्ञा आदेश को चुनौती दिए जाने पर, इसे इस संवैधानिक अवरोध की कसौटी पर परखा जाएगा।

उच्च न्यायालय बनाम ECI — मूल तनाव

  1. पूर्व-चुनाव बनाम चुनाव-पश्चात उपाय: अनुच्छेद ३२९ कहता है कि चुनावी विवाद चुनाव-पश्चात याचिका से सुलझाए जाएँ, न कि चुनाव-पूर्व रिट याचिका से।
  2. चुनावी कालक्रम की अपरिवर्तनीयता: एक बार चुनाव कार्यक्रम बाधित होने पर मतदाताओं, उम्मीदवारों और प्रशासनिक तंत्र के लिए व्यावहारिक अव्यवस्था उत्पन्न होती है।
  3. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व: बिना विधायक के क्षेत्रों में शासन घाटा होता है; देरी से उपचुनाव लोकतांत्रिक कमी बढ़ाते हैं।

आदर्श आचार संहिता (MCC) पर प्रभाव

आदर्श आचार संहिता (MCC) निर्वाचन की घोषणा से लेकर प्रक्रिया पूर्ण होने तक राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करती है:

  • अधिसूचना रोकने से MCC लागू नहीं होती — अर्थात् राज्य सरकार प्रभावित क्षेत्रों में नीति घोषणाएँ और व्यय जारी रख सकती है।
  • इससे विलंब काल में सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना बनती है।

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय (Precedents)

  • मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (१९७८): अनुच्छेद ३२४ शक्तियों का व्यापक भंडार है।
  • S.S. धनोआ बनाम भारत सरकार (१९९१): उपचुनाव अनिवार्य हैं; ECI को धारा १५१A की समय-सीमा में उन्हें कराना होगा।
  • ECI बनाम अशोक कुमार (२०००): न्यायालयों को चुनावी कार्यक्रम में हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
  • T.N. शेषन बनाम भारत सरकार (१९९५): ECI की अनुच्छेद ३२४ की शक्तियाँ व्यापक लेकिन निरपेक्ष नहीं।
  • लिली थॉमस बनाम भारत सरकार (२०१३): न्यायालय चुनाव संचालन करने वाले वैधानिक प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा कर सकते हैं।

प्रारंभिक परीक्षा MCQ

प्रश्न:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३२९(ख) के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा/कौन-से कथन सही है/हैं?

  1. यह निर्वाचन याचिका के अलावा संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी निर्वाचन को न्यायालय में चुनौती देने पर रोक लगाता है।
  2. यह उच्च न्यायालयों को निर्वाचन आयोग को अधिसूचना जारी करने से रोकने का अधिकार देता है।
  3. यह सुनिश्चित करने के लिए है कि निर्वाचन-पूर्व मुकदमेबाजी से चुनाव में देरी न हो।

विकल्प:

  • (A) केवल १ और २
  • (B) केवल १ और ३
  • (C) केवल २ और ३
  • (D) १, २ और ३

उत्तर: (B) केवल १ और ३

स्पष्टीकरण: अनुच्छेद ३२९(ख) सभी निर्वाचन-पूर्व न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक लगाता है — यह उच्च न्यायालयों को चुनाव अधिसूचनाओं के विरुद्ध निषेधाज्ञा देने का अधिकार नहीं देता। कथन २ गलत है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न (Mains)

प्रश्न (GS पेपर II):

“निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए केंद्रीय है, फिर भी न्यायिक पुनरावलोकन सभी प्राधिकरणों पर संवैधानिक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है। हालिया न्यायिक हस्तक्षेपों के आलोक में उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार और ECI की संवैधानिक स्वायत्तता के बीच के तनाव की जाँच करें।” (२५० शब्द)

उत्तर बिंदु:

  • ECI की संवैधानिक स्थिति: अनुच्छेद ३२४ — व्यापक शक्तियाँ; मुख्य निर्वाचन आयुक्त की पद सुरक्षा, वित्तीय स्वतंत्रता और कार्यपालिका निर्देश से स्वतंत्रता।
  • न्यायिक पुनरावलोकन का दायरा: अनुच्छेद २२६/२२७ — व्यापक शक्तियाँ, लेकिन अनुच्छेद ३२९ के अवरोध के अधीन।
  • मुख्य तनाव: ECI की निर्वाचन निर्धारण की शक्ति संवैधानिक है; न्यायालयों की पुनरावलोकन की शक्ति भी संवैधानिक — संघर्ष तब होता है जब एक दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण करता है।
  • लोकतंत्र पर प्रभाव: निर्वाचन-पूर्व निषेधाज्ञाएँ लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में देरी करती हैं; शासन घाटा पैदा करती हैं।
  • मार्ग: धारा १५१A के दायरे पर स्पष्ट विधायी मार्गदर्शन; त्वरित निर्वाचन न्यायालय; अनुच्छेद ३२९ की व्याख्या पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश।
  • निष्कर्ष: संवैधानिक परिरूपण एक नाजुक संतुलन चाहता है — ECI संवैधानिक रूप से अपनी शक्तियाँ प्रयोग करे और न्यायालय ECI के स्वायत्त क्षेत्र का सम्मान करते हुए संवैधानिक अधिकारों के रक्षक बने रहें।

यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है।

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