यूपीएससी / एमपीएससी सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र III – मॉडल उत्तर
प्रश्न: भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की चर्चा कीजिए और इसके स्थायी समाधान सुझाइए।
1. विस्तृत प्रस्तावना (Detailed Introduction)
जलवायु परिवर्तन आज के समय में केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन चुका है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जहाँ की लगभग 55 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका के लिए कृषि और संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर है, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है, जिसे भारत का ‘असली वित्त मंत्री’ भी कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता और चरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather Events) की आवृत्ति में वृद्धि हुई है, जिसने भारतीय कृषि की नींव को हिलाकर रख दिया है।
अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट (AR6) ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील देशों में से एक है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण असिंचित क्षेत्रों में किसानों की आय में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। कृषि क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 18-19 प्रतिशत का योगदान देता है। अतः, कृषि पर पड़ने वाला कोई भी नकारात्मक प्रभाव सीधे तौर पर भारत की खाद्य सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन के लक्ष्यों और समग्र आर्थिक विकास को बाधित कर सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सूक्ष्म विश्लेषण करना और दीर्घकालिक, स्थायी समाधान खोजना न केवल आवश्यक है, बल्कि समय की मांग है।
2. फसलों और किसानों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (Effects on Crops and Farmers)
जलवायु परिवर्तन का भारतीय कृषि पर बहुआयामी प्रभाव पड़ रहा है। इसे मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित करके समझा जा सकता है: फसलों पर पड़ने वाला भौतिक और जैविक प्रभाव, तथा किसानों पर पड़ने वाला सामाजिक-आर्थिक प्रभाव।
2.1. फसलों पर प्रभाव (Effects on Crops)
- तापमान में वृद्धि और उपज में कमी: वैश्विक तापमान में वृद्धि का सीधा असर फसलों की उपज पर पड़ रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो भारत में गेहूं के उत्पादन में 4 से 5 मिलियन टन की कमी आ सकती है। उच्च तापमान फसलों के पकने की अवधि को कम कर देता है, जिससे दानों का आकार छोटा रह जाता है और कुल उत्पादन घट जाता है। विशेषकर रबी की फसलें (जैसे गेहूं, चना, सरसों) अत्यधिक गर्मी (Heatwaves) के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। मार्च-अप्रैल 2022 में उत्तर भारत में आई अकाल लू (Early Heatwaves) ने गेहूं के उत्पादन को भारी नुकसान पहुँचाया था।
- वर्षा के पैटर्न में बदलाव और मानसून की अनिश्चितता: भारतीय कृषि का लगभग 51% हिस्सा वर्षा सिंचित (Rainfed) है। जलवायु परिवर्तन ने मानसून की प्रकृति को अत्यधिक अनिश्चित बना दिया है। कभी अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़ आ जाती है, तो कभी लंबे समय तक बारिश न होने से सूखा पड़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप, खरीफ की फसलों (जैसे धान, सोयाबीन, कपास) की बुवाई में देरी होती है या पूरी फसल ही नष्ट हो जाती है। ‘अल नीनो’ (El Nino) जैसी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने इस समस्या को और भी विकराल बना दिया है।
- कीटों और बीमारियों के प्रकोप में वृद्धि: बढ़ता तापमान और बदलती आर्द्रता कीटों और रोगजनकों (Pathogens) के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण नए प्रकार के कीटों का हमला कृषि में देखा जा रहा है। उदाहरण के लिए, हाल ही में टिड्डी दल (Locust Swarm) का बढ़ता प्रकोप और फॉल आर्मीवर्म (Fall Armyworm) द्वारा मक्के की फसल को पहुँचाया गया नुकसान जलवायु परिवर्तन से जुड़े हुए हैं। इससे फसलें तो बर्बाद होती ही हैं, साथ ही कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुँचता है।
- मृदा की गुणवत्ता में गिरावट (Soil Degradation): अत्यधिक तापमान से मिट्टी की नमी तेजी से वाष्पीकृत होती है, जिससे मिट्टी सूख जाती है। वहीं दूसरी ओर, भारी बारिश और बाढ़ के कारण मिट्टी का ऊपरी उपजाऊ आवरण (Topsoil) बह जाता है, जिससे मृदा अपरदन (Soil Erosion) होता है। तटीय क्षेत्रों में समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के कारण कृषि भूमि में खारापन (Salinity) बढ़ रहा है, जिससे पश्चिम बंगाल, ओडिशा और गुजरात के तटीय इलाकों में कृषि भूमि बंजर होती जा रही है।
- पशुधन और मत्स्य पालन पर असर: कृषि का तात्पर्य केवल फसल उत्पादन नहीं है। जलवायु परिवर्तन से पशुओं में हीट स्ट्रेस (Heat Stress) बढ़ता है, जिससे दुग्ध उत्पादन और पशुओं की प्रजनन क्षमता में भारी गिरावट आती है। इसके अलावा, समुद्र के तापमान में वृद्धि से मछलियों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिसका असर तटीय मत्स्य पालन पर पड़ रहा है।
2.2. किसानों पर प्रभाव (Effects on Farmers)
- आय में गिरावट और ऋण का जाल: बार-बार फसल बर्बाद होने से किसानों की आय अनिश्चित हो गई है। खेती में लागत (बीज, उर्वरक, कीटनाशक) लगातार बढ़ रही है, जबकि जलवायु आपदाओं के कारण उत्पादन घट रहा है। इसके परिणामस्वरूप किसान साहूकारों और बैंकों के ऋण जाल (Debt Trap) में फंसते जा रहे हैं। यही ऋण का बोझ महाराष्ट्र के विदर्भ, तेलंगाना और पंजाब जैसे क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या (Farmers’ Suicides) का सबसे प्रमुख कारण बनकर उभरा है।
- जलवायु शरणार्थी और पलायन (Climate Refugees & Migration): सूखे और बाढ़ के कारण कृषि घाटे का सौदा बनती जा रही है, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर तीव्र पलायन (Distress Migration) हो रहा है। छोटे और सीमांत किसान अपनी ज़मीनें छोड़कर शहरों में दिहाड़ी मज़दूर बनने को मजबूर हैं। बुंदेलखंड और मराठवाड़ा इसके जीवंत उदाहरण हैं।
- कृषि का महिलाकरण (Feminization of Agriculture): पुरुषों के शहरों की ओर पलायन के कारण कृषि का पूरा बोझ महिलाओं पर आ गया है। ग्रामीण महिलाओं को अब घर के कामकाज के साथ-साथ खेतों का भारी काम भी करना पड़ता है। विडंबना यह है कि अधिकांश महिलाओं के पास भूमि का मालिकाना हक नहीं होता, जिससे उन्हें संस्थागत ऋण, बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।
- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर खतरा: किसानों के लिए फसल का नुकसान केवल आय का नुकसान नहीं है, बल्कि यह उनके परिवार की खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। पौष्टिक फसलों (जैसे दालें और मोटे अनाज) के उत्पादन में कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण (Malnutrition) का खतरा बढ़ जाता है।
3. जलवायु अनुकूलन रणनीतियां और स्थायी समाधान (Climate Adaptation Strategies & Sustainable Solutions)
जलवायु परिवर्तन की इस वैश्विक और अपरिहार्य चुनौती से निपटने के लिए भारतीय कृषि को ‘जलवायु-अनुकूल’ (Climate-Resilient) बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें तकनीकी नवाचार, पारंपरिक ज्ञान और नीतिगत सुधारों का समावेश हो। इसके स्थायी समाधान निम्नलिखित हैं:
3.1. सूक्ष्म सिंचाई और जल प्रबंधन (Micro-irrigation and Water Management)
जल संकट भारतीय कृषि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अतः जल उपयोग दक्षता (Water Use Efficiency) बढ़ाना सबसे महत्वपूर्ण कदम है:
- प्रति बूंद अधिक फसल (Per Drop More Crop): प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के इस घटक को व्यापक स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है। बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) के पारंपरिक तरीके के बजाय ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर (Sprinkler) का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे पानी की 50 से 70 प्रतिशत तक बचत होती है और उर्वरकों का भी सही उपयोग (Fertigation) होता है।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting): गाँव के स्तर पर तालाबों, जोहड़ों और चेक डैम का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि मानसून के पानी को सहेज कर भूजल स्तर को रिचार्ज किया जा सके। मनरेगा (MGNREGA) का उपयोग जल संरक्षण ढांचों के निर्माण के लिए किया जाना एक बेहतरीन नीति है।
- वाटरशेड प्रबंधन: शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वाटरशेड विकास कार्यक्रमों को गति देनी चाहिए। इससे न केवल मृदा की नमी बरकरार रहती है, बल्कि सूखे के प्रभाव को भी कम किया जा सकता है।
3.2. बीज विकास और जलवायु-अनुकूल किस्में (Seed Development and Climate-Resilient Varieties)
कृषि अनुसंधान का पूरा ध्यान अब ऐसी फसलें विकसित करने पर होना चाहिए जो जलवायु के झटकों को सह सकें:
- सूखा और गर्मी प्रतिरोधी बीज (Drought & Heat Tolerant Seeds): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों को ऐसी संकर (Hybrid) और जीन-संशोधित (GM) किस्में विकसित करनी चाहिए जो कम पानी और उच्च तापमान में भी अच्छी उपज दे सकें। ‘राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना’ (NAIP) के तहत विकसित की जा रही नई किस्में इसका उत्तम उदाहरण हैं।
- लवणता सहिष्णु किस्में (Salinity Tolerant Varieties): तटीय क्षेत्रों के लिए, जहाँ समुद्री जल के कारण खेतों में खारापन बढ़ रहा है, वहाँ धान और अन्य फसलों की खारापन सहने वाली किस्मों का विकास और वितरण किया जाना चाहिए।
- पारंपरिक बीजों का संरक्षण: भारत के पास बीजों की समृद्ध पारंपरिक विविधता है जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल होती है। जीन बैंकों की स्थापना और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से इन देसी बीजों का संरक्षण और संवर्धन किया जाना चाहिए।
- फसल चक्र में बदलाव: धान और गन्ने जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों के स्थान पर मक्का, ज्वार, बाजरा (Millets) और दलहन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मोटे अनाज (Shree Anna) स्वभाव से ही जलवायु-अनुकूल होते हैं और कुपोषण दूर करने में भी सहायक होते हैं।
3.3. जैविक खेती और प्राकृतिक खेती (Organic Farming and Natural Farming)
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता ने न केवल मृदा को नष्ट किया है, बल्कि कृषि को ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) का एक बड़ा उत्सर्जक भी बना दिया है। इसके समाधान के रूप में स्थायी कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा:
- जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF): सुभाष पालेकर द्वारा प्रवर्तित इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों का शून्य उपयोग होता है। यह जीवामृत और बीजामृत (गाय के गोबर और मूत्र से निर्मित) पर निर्भर है। यह मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारती है, खेती की लागत कम करती है और मिट्टी में कार्बन सोखने (Carbon Sequestration) की क्षमता बढ़ाती है।
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): सरकार की इस योजना के तहत जैविक खेती को क्लस्टर अप्रोच के माध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है। जैविक खेती न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि वैश्विक बाज़ार में जैविक उत्पादों की उच्च मांग के कारण यह किसानों की आय भी बढ़ा सकती है। सिक्किम भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य बनकर एक आदर्श प्रस्तुत कर चुका है।
- मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (Soil Health Management): मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme) के माध्यम से किसानों को मिट्टी की प्रकृति के अनुसार उचित मात्रा में पोषक तत्वों का उपयोग करने के लिए जागरूक किया जाना चाहिए। फसल अवशेषों (पराली) को जलाने के बजाय उन्हें खेतों में ही मल्चिंग (Mulching) के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
3.4. तकनीकी, संस्थागत और नीतिगत हस्तक्षेप (Technological and Policy Interventions)
आधुनिक विज्ञान और मजबूत नीतियों का संगम ही कृषि को बचा सकता है:
- सटीक कृषि (Precision Agriculture) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): ड्रोन तकनीक, सैटेलाइट इमेजरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का उपयोग करके खेतों की वास्तविक समय (Real-time) निगरानी की जानी चाहिए। इससे पानी, कीटनाशक और उर्वरक का केवल वहीं उपयोग होगा जहाँ वास्तव में ज़रूरत है।
- पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems): भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और इसरो (ISRO) की मदद से ग्राम पंचायत स्तर तक मौसम की सटीक और अति-स्थानीय (Hyper-local) जानकारी मोबाइल एसएमएस और ऐप्स (जैसे मेघदूत ऐप) के माध्यम से किसानों तक पहुंचाई जानी चाहिए, ताकि वे समय रहते अपनी फसलों को बचा सकें।
- फसल बीमा प्रणाली का सुदृढ़ीकरण: ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (PMFBY) का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। दावों के त्वरित निपटान के लिए सैटेलाइट डेटा और ड्रोन सर्वेक्षण का उपयोग होना चाहिए ताकि किसानों को आपदा के तुरंत बाद आर्थिक सहायता मिल सके।
- राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA): जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPCC) के तहत आने वाले इस मिशन को अधिक वित्तीय सहायता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ लागू किया जाना चाहिए।
4. निष्कर्ष (Conclusion)
जलवायु परिवर्तन एक अमूर्त खतरा नहीं है; यह वर्तमान की एक कठोर वास्तविकता है जिसका खामियाजा भारतीय कृषि और अन्नदाता को चुकाना पड़ रहा है। यदि तत्काल और सुविचारित कदम नहीं उठाए गए, तो भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में पड़ जाएगी। “जलवायु स्मार्ट कृषि” (Climate Smart Agriculture – CSA) आज कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी बाध्यता है।
समाधान किसी एक दिशा से नहीं आएगा। इसके लिए हमें एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा परिकल्पित ‘सदाबहार क्रांति’ (Evergreen Revolution) की ओर बढ़ना होगा, जहाँ पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाए बिना उत्पादन बढ़ाया जाए। सूक्ष्म सिंचाई, जलवायु-प्रतिरोधी बीज, और जैविक खेती जैसे तकनीकी और पारंपरिक उपायों के साथ-साथ मजबूत नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों, विशेषकर लक्ष्य 2 (शून्य भुखमरी) और लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) को प्राप्त करने के लिए भारत को अपने कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। सीओपी-26 (COP26) में भारत द्वारा घोषित ‘पंचामृत’ और 2070 तक ‘नेट ज़ीरो’ (Net Zero) उत्सर्जन का लक्ष्य तभी सफल हो सकता है जब हम अपनी कृषि को कार्बन सिंक (Carbon Sink) और जलवायु अनुकूलन का एक प्रमुख साधन बना लें। कृषि और प्रकृति के बीच का सहजीवी संबंध ही भविष्य में मानव जाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करेगा।
