परिचय एवं वर्तमान संदर्भ

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने हाल ही में घोषणा की है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 9 जुलाई को पूरे देश को कवर कर लिया है, जो अपनी सामान्य तिथि (8 जुलाई) से एक दिन बाद है। यह खबर भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि, जल सुरक्षा और समग्र अर्थव्यवस्था के लिए मानसून जीवनरेखा है। हालाँकि, यह घोषणा एक महत्वपूर्ण चेतावनी के साथ आई है: जुलाई माह में देश भर में वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान है, भले ही हाल की व्यापक वर्षा ने मौसमी वर्षा घाटे में सुधार किया हो। मानसून की प्रगति पर यह बारीकी से नज़र रखना महत्वपूर्ण है, विशेषकर बदलते जलवायु प्रतिरूपों (patterns) के संदर्भ में।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता

  • सामान्य अध्ययन पेपर I (भूगोल): भारतीय भूगोल – मानसून, जलवायु विज्ञान, प्राकृतिक संसाधन।
  • सामान्य अध्ययन पेपर III (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन):
    • अर्थव्यवस्था: भारतीय कृषि, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक वृद्धि और विकास पर मानसून का प्रभाव।
    • पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन और उसके भारत पर प्रभाव, पर्यावरणीय पारिस्थितिकी।
    • आपदा प्रबंधन: सूखा, बाढ़ और उनके प्रबंधन की रणनीतियाँ।

मुख्य बिंदु / तर्क / संरचनात्मक मुद्दे

भारतीय मानसून सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी के लिए एक महत्वपूर्ण निर्धारक है।

मानसून का महत्व:

  • कृषि पर निर्भरता: भारत की लगभग 55% कृषि योग्य भूमि सिंचित नहीं है और पूरी तरह से मानसून पर निर्भर करती है। खरीफ फसलें (जैसे धान, मक्का, बाजरा, दलहन, तिलहन) मानसून की वर्षा पर अत्यधिक निर्भर करती हैं। एक अच्छा मानसून कृषि उत्पादन को बढ़ावा देता है, ग्रामीण आय बढ़ाता है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • जल सुरक्षा: मानसून देश के जलाशयों, नदियों, झीलों और भूजल स्तर को रिचार्ज करता है, जो पेयजल, सिंचाई और उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • हाइड्रोपावर उत्पादन: पर्याप्त वर्षा जल विद्युत परियोजनाओं के लिए आवश्यक पानी उपलब्ध कराता है, जिससे ऊर्जा उत्पादन होता है और बिजली की कमी कम होती है।
  • आर्थिक वृद्धि: कृषि उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव से ग्रामीण मांग बढ़ती है, जिससे विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को बढ़ावा मिलता है। यह समग्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

वर्तमान स्थिति एवं चिंताएँ:

  • देरी से आगमन और विस्तार: मानसून का पूरे देश में एक दिन की देरी से विस्तार (9 जुलाई) सामान्य तौर पर कोई बड़ी चिंता का विषय नहीं है, लेकिन इसकी प्रगति और वितरण महत्वपूर्ण है।
  • जुलाई की वर्षा का अनुमान: IMD का जुलाई में ‘सामान्य से कम’ वर्षा का पूर्वानुमान चिंता का विषय है, क्योंकि यह खरीफ फसलों की बुवाई और शुरुआती वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। जुलाई में अच्छी वर्षा फसलों की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है।
  • मौसमी वर्षा घाटे में सुधार: हाल की व्यापक वर्षा ने समग्र मौसमी घाटे को कम किया है, जो एक सकारात्मक संकेत है। हालाँकि, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यह सुधार पूरे मानसून सीजन में बना रहे।
  • स्थानिक और अस्थायी परिवर्तनशीलता: मानसून की वर्षा अक्सर पूरे देश में एक समान नहीं होती है। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा (बाढ़) का अनुभव हो सकता है, जबकि अन्य सूखे की स्थिति से जूझ सकते हैं। यह परिवर्तनशीलता एक संरचनात्मक चुनौती है।

बदलते जलवायु प्रतिरूपों की चुनौतियाँ:

  • अनियमितता: जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून अधिक अनियमित हो गया है। इसमें लंबे समय तक शुष्क अवधि के बाद अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ देखी जा रही हैं, जिससे बाढ़ और सूखे दोनों की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
  • चरम मौसम की घटनाएँ: तीव्र वर्षा (cloudbursts) और लंबे समय तक शुष्क रहने जैसे चरम मौसम की घटनाएँ अधिक आम हो गई हैं, जिससे कृषि और जल प्रबंधन के लिए चुनौती बढ़ रही है।
  • अनिश्चितता: पूर्वानुमानों में बढ़ती अनिश्चितता किसानों के लिए फसल योजना बनाना कठिन बना रही है, जिससे उनकी आय और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है।

मुख्य पदों का विस्तृत विश्लेषण

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD):

  • परिचय: IMD भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत एक एजेंसी है। यह भारत में मौसम संबंधी अवलोकन, मौसम पूर्वानुमान और भूकंप विज्ञान के लिए जिम्मेदार प्रमुख एजेंसी है।
  • कार्य: इसका मुख्य कार्य मौसम की निगरानी करना, पूर्वानुमान जारी करना, समुद्री सेवाओं सहित विशेष मौसम सेवाओं को प्रदान करना और कृषि, विमानन, नौवहन आदि जैसे क्षेत्रों को सहायता प्रदान करना है। यह मानसून की प्रगति और वर्षा के अनुमान जारी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून:

  • तंत्र: यह भारत में वर्षा का प्राथमिक स्रोत है। यह जून से सितंबर तक होता है और गर्म हिंद महासागर से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर नमी से भरी हवाओं के प्रवाह के कारण होता है। यह भूमध्यरेखीय गर्त (ITCZ) के उत्तर की ओर खिसकने, तिब्बती पठार के गर्म होने और जेट स्ट्रीम के पैटर्न में बदलाव जैसे कारकों से प्रभावित होता है।
  • प्रारंभ और वापसी: दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर 1 जून को केरल में शुरू होता है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता है। इसकी वापसी सितंबर के मध्य से शुरू होती है।

अल नीनो (El Niño) और ला नीना (La Niña):

  • अल नीनो: यह प्रशांत महासागर में भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि को संदर्भित करता है। अल नीनो घटनाएँ आमतौर पर भारत में कमजोर मानसून और सूखे से जुड़ी होती हैं।
  • ला नीना: यह प्रशांत महासागर में भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य गिरावट को संदर्भित करता है। ला नीना घटनाएँ आमतौर पर भारत में मजबूत मानसून और अच्छी वर्षा से जुड़ी होती हैं।
  • वर्तमान स्थिति: वर्तमान में, प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान तटस्थ अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) स्थितियों को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि न तो अल नीनो और न ही ला नीना का कोई महत्वपूर्ण प्रभाव है।

दीर्घकालिक औसत (Long Period Average – LPA):

  • परिभाषा: LPA एक विशेष क्षेत्र या पूरे देश के लिए एक लंबी अवधि (आमतौर पर 50 वर्ष) में औसत वर्षा को संदर्भित करता है। यह मानसून की वर्षा को ‘सामान्य’, ‘सामान्य से अधिक’ या ‘सामान्य से कम’ के रूप में वर्गीकृत करने के लिए एक बेंचमार्क के रूप में कार्य करता है।
  • भारत के लिए LPA: पूरे देश के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) की LPA वर्षा 87 सेमी है। 96-104% LPA को ‘सामान्य’ वर्षा माना जाता है।

पर्यावरणीय और आर्थिक संबंध

आर्थिक संबंध:

  • कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा: अच्छा मानसून चावल, गेहूं, दालों और तिलहनों जैसे महत्वपूर्ण फसलों के उत्पादन को बढ़ाता है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। खराब मानसून फसल की पैदावार को कम कर सकता है, जिससे खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं और ग्रामीण संकट पैदा हो सकता है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था: मानसून ग्रामीण आय, रोजगार और मांग को सीधे प्रभावित करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग पैटर्न पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री प्रभावित होती है।
  • औद्योगिक क्षेत्र: मानसून औद्योगिक क्षेत्र को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। कृषि उत्पादन में वृद्धि से कृषि-आधारित उद्योगों को कच्चा माल मिलता है। जल विद्युत उत्पादन उद्योग को बिजली प्रदान करता है।
  • जीडीपी वृद्धि: कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक है। एक मजबूत मानसून देश की समग्र जीडीपी वृद्धि में योगदान देता है।

पर्यावरणीय संबंध:

  • जल चक्र: मानसून भारत के जल चक्र का एक अभिन्न अंग है, जो भूजल को रिचार्ज करता है, नदियों को फिर से भरता है और आर्द्रभूमि और अन्य पारिस्थितिक तंत्रों को बनाए रखता है।
  • जैव विविधता: वर्षा वन, घास के मैदान और अन्य प्राकृतिक आवास मानसून पर निर्भर करते हैं। एक स्वस्थ मानसून जैव विविधता के पोषण और विभिन्न प्रजातियों के जीवन चक्र को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • वनस्पति और मिट्टी: मानसून की वर्षा वनस्पति वृद्धि का समर्थन करती है, जिससे मिट्टी का कटाव कम होता है और मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। हालाँकि, अत्यधिक वर्षा भूस्खलन और मिट्टी के कटाव को भी बढ़ा सकती है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून पैटर्न में बदलाव आ रहा है। यह अनिश्चितता, चरम घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि और विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा के वितरण में परिवर्तन पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन और प्राकृतिक आवासों का नुकसान हो सकता है।

अभ्यास प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न: दक्षिण-पश्चिम मानसून के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) भारत में मौसम संबंधी अवलोकन और पूर्वानुमान के लिए जिम्मेदार प्रमुख एजेंसी है।
  2. अल नीनो घटनाएँ आमतौर पर भारत में मजबूत मानसून वर्षा और अच्छी फसल की पैदावार से जुड़ी होती हैं।
  3. दीर्घकालिक औसत (LPA) किसी विशेष क्षेत्र के लिए 50 वर्षों से अधिक की औसत वर्षा का प्रतिनिधित्व करता है और ‘सामान्य’ वर्षा को परिभाषित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

A) केवल 1 और 2

B) केवल 2 और 3

C) केवल 1 और 3

D) 1, 2 और 3

उत्तर: C

स्पष्टीकरण:

  • कथन 1 सही है: IMD भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत भारत में मौसम संबंधी अवलोकन और पूर्वानुमान के लिए जिम्मेदार प्रमुख एजेंसी है।
  • कथन 2 गलत है: अल नीनो घटनाएँ आमतौर पर भारत में कमजोर मानसून और सूखे से जुड़ी होती हैं, जबकि ला नीना मजबूत मानसून से जुड़ी होती है।
  • कथन 3 सही है: दीर्घकालिक औसत (LPA) किसी विशेष क्षेत्र के लिए 50 वर्षों से अधिक की औसत वर्षा का प्रतिनिधित्व करता है और ‘सामान्य’, ‘सामान्य से अधिक’ या ‘सामान्य से कम’ वर्षा को परिभाषित करने के लिए एक बेंचमार्क के रूप में उपयोग किया जाता है।

अभ्यास मुख्य परीक्षा वर्णनात्मक प्रश्न

प्रश्न: “भारतीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के महत्व पर चर्चा करें। बदलते जलवायु प्रतिरूपों के संदर्भ में, मानसून की परिवर्तनशीलता से निपटने के लिए भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और क्या उपाय किए जा सकते हैं?”

मॉडल उत्तर बिंदु:

परिचय: दक्षिण-पश्चिम मानसून को भारत की ‘जीवनरेखा’ बताते हुए, इसके आगमन और विस्तार के महत्व को संक्षेप में बताएं।

1. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून का महत्व:

  • कृषि आधार: लगभग 55% कृषि योग्य भूमि असिंचित है, खरीफ फसलों के लिए महत्वपूर्ण। ग्रामीण आय और कृषि जीडीपी में योगदान।
  • जल सुरक्षा: जलाशयों, भूजल और नदियों को रिचार्ज करना, पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण।
  • ऊर्जा उत्पादन: जलविद्युत परियोजनाओं के लिए आवश्यक पानी प्रदान करना।
  • खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति नियंत्रण: पर्याप्त उत्पादन खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखता है।
  • ग्रामीण मांग और समग्र आर्थिक वृद्धि: कृषि आय में वृद्धि से ग्रामीण उपभोग और औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।

2. भारतीय पर्यावरण के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून का महत्व:

  • पारिस्थितिक तंत्र का पोषण: वर्षावन, घास के मैदान और आर्द्रभूमि जैसे प्राकृतिक आवासों को बनाए रखना।
  • जैव विविधता का समर्थन: वनस्पतियों और जीवों की एक विस्तृत श्रृंखला के जीवन चक्र को बनाए रखना।
  • जल चक्र का संतुलन: जल निकायों और भूजल स्तर को भरना।
  • मिट्टी की उर्वरता और कटाव नियंत्रण: वनस्पति वृद्धि को बढ़ावा देना, जो मिट्टी के कटाव को कम करता है।

3. बदलते जलवायु प्रतिरूपों के संदर्भ में चुनौतियाँ:

  • अनियमित वर्षा: शुष्क अवधि के बाद तीव्र वर्षा, जिससे बाढ़ और सूखा दोनों।
  • चरम मौसम की घटनाएँ: क्लाउडबर्स्ट, लंबे समय तक शुष्क रहने और लू जैसी घटनाओं में वृद्धि।
  • स्थानिक और अस्थायी असमानता: देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा के पैटर्न में भारी भिन्नता।
  • कृषि पर प्रभाव: बुवाई में देरी, फसल क्षति, कीटों का प्रकोप, और किसानों की आय में कमी।
  • जल प्रबंधन की समस्या: जल निकायों के प्रबंधन और बाढ़-सूखा चक्र से निपटने में कठिनाई।
  • खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण संकट: फसल उत्पादन में कमी से खाद्य असुरक्षा और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक दबाव।

4. मानसून की परिवर्तनशीलता से निपटने के लिए संभावित उपाय:

  • जल संरक्षण और संचयन: वर्षा जल संचयन, चेक डैम, तालाबों का निर्माण, और भूजल रिचार्जिंग।
  • जलवायु-लचीली कृषि:
    • सूखा-प्रतिरोधी और बाढ़-सहिष्णु फसलों की किस्मों का विकास और उपयोग।
    • फसल विविधीकरण और अंतर-फसल।
    • सूक्ष्म-सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) तकनीकों को बढ़ावा देना।
    • कृषि वानिकी को प्रोत्साहित करना।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन:
    • IMD पूर्वानुमानों को बेहतर बनाना और किसानों तक समय पर जानकारी पहुंचाना।
    • बाढ़ और सूखा प्रबंधन योजनाओं को मजबूत करना।
    • कृषि बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाना (जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना)।
  • सतत जल प्रबंधन: नदियों को जोड़ना (विवादों का समाधान करके), कुशल जल वितरण प्रणाली, और जल उपयोग दक्षता में सुधार।
  • अनुसंधान और विकास: जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और शमन रणनीतियों पर अनुसंधान।
  • जागरूकता और क्षमता निर्माण: किसानों और स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और अनुकूलन रणनीतियों के बारे में शिक्षित करना।

निष्कर्ष:

भारतीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए मानसून की भूमिका को दोहराते हुए, जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इसकी बढ़ती अनिश्चितता पर जोर दें। एक समग्र और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें जिसमें तकनीकी नवाचार, नीतिगत हस्तक्षेप और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो ताकि भारत मानसून की परिवर्तनशीलता से प्रभावी ढंग से निपट सके और एक लचीला भविष्य सुनिश्चित कर सके।

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