सोनम वांगचुक अनशन और लद्दाख का संवैधानिक संघर्ष: एक विस्तृत विश्लेषण

हाल ही में लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा लद्दाख के पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और अन्य मांगों को लेकर किया जा रहा अनशन चर्चा का विषय बना हुआ है। स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जिसके बाद उनके आंदोलन को और व्यापक समर्थन मिल रहा है। उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने स्पष्ट किया है कि यदि सोनम वांगचुक 20 जुलाई को संसद तक मार्च में शामिल होने में असमर्थ रहे, तो वह उनका प्रतिनिधित्व करेंगी। यह घटनाक्रम न केवल लद्दाख की क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दर्शाता है, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों और जनजातीय अधिकारों से संबंधित जटिल मुद्दों को भी उजागर करता है।

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Relevance)

यह विषय संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (PSC) की मुख्य परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II: भारतीय संविधान—विशेषताएं, ऐतिहासिक आधार, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना। केंद्र-राज्य संबंध। विशिष्ट राज्यों के लिए विशेष प्रावधान।
  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III: पर्यावरणीय संरक्षण, सतत विकास और विकास के मुद्दे।

प्रमुख बिंदु और संरचनात्मक मुद्दे

सोनम वांगचुक का आंदोलन मुख्य रूप से तीन प्रमुख मांगों पर केंद्रित है, जो लद्दाख के भविष्य के लिए निर्णायक हैं:

  • पूर्ण राज्य का दर्जा: लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर एक केंद्र शासित प्रदेश (UT) बनाया गया था। स्थानीय निवासियों की मांग है कि उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा मिले ताकि वे अपनी शासन प्रक्रिया और नीतियों पर बेहतर नियंत्रण रख सकें।
  • संविधान की छठी अनुसूची: लद्दाख की अधिकांश आबादी जनजातीय है। छठी अनुसूची के माध्यम से ‘स्वायत्त जिला परिषदों’ (Autonomous District Councils) का गठन किया जा सकता है, जो स्थानीय जनजातीय संस्कृति, भूमि और संसाधनों की रक्षा करने का कानूनी अधिकार देती है।
  • लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व: स्थानीय निवासियों का तर्क है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद प्रशासनिक शक्तियां उपराज्यपाल (LG) के पास केंद्रित हो गई हैं, जिससे स्थानीय जनता की आवाज प्रभावी रूप से नहीं सुनी जा रही है।

संवैधानिक और कानूनी विश्लेषण

लद्दाख के मामले को समझने के लिए भारतीय संविधान के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण आवश्यक है:

छठी अनुसूची क्या है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 244(2) और अनुच्छेद 275(1) असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए ‘छठी अनुसूची’ का प्रावधान करते हैं। इसमें स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) की व्यवस्था है, जो कानून बनाने, न्याय प्रशासन करने और भूमि प्रबंधन में व्यापक स्वायत्तता प्रदान करती है। लद्दाख का तर्क है कि उनकी जनसांख्यिकीय संरचना (90% से अधिक जनजातीय) इस संवैधानिक सुरक्षा के लिए उपयुक्त है।

केंद्र शासित प्रदेश बनाम राज्य

संघवाद (Federalism) भारतीय संविधान का एक मूल ढांचा (Basic Structure) है। लद्दाख को UT बनाना केंद्र सरकार का एक प्रशासनिक निर्णय था, लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी राजनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौती मानते हैं। ‘असिमेट्रिक फेडरलिज्म’ (Asymmetric Federalism) के सिद्धांत के तहत भारत में विभिन्न राज्यों को उनकी विशेष आवश्यकताओं के आधार पर विशेष दर्जा दिया गया है, लद्दाख के आंदोलनकारी इसी सिद्धांत का हवाला देते हैं।

पर्यावरणीय और आर्थिक अंतर्संबंध

लद्दाख के आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) है। लद्दाख एक नाजुक पारिस्थितिक तंत्र (Fragile Ecosystem) वाला हिमालयी क्षेत्र है।

  • पर्यावरण चिंता: स्थानीय समुदायों को भय है कि पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची न होने पर, बड़े औद्योगिक निवेश और अनियंत्रित पर्यटन उनके ग्लेशियरों, जल स्रोतों और जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुँचाएंगे।
  • विकास का मॉडल: आंदोलनकारियों का मानना है कि छठी अनुसूची के तहत मिलने वाली स्थानीय शक्तियां ही यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि लद्दाख का विकास ‘स्थानीय पारिस्थितिक क्षमता’ (Carrying Capacity) के अनुरूप हो, न कि बाहरी हितों के अनुसार।

अभ्यास प्रश्न (Prelims MCQ)

प्रश्न: भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।
  2. इस अनुसूची के तहत गठित स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) के पास कानून बनाने की शक्ति नहीं है।
  3. यह अनुसूची जनजातीय आबादी की सांस्कृतिक और भूमि संबंधी सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक तंत्र प्रदान करती है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

A. केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1 और 3
D. 1, 2 और 3

उत्तर: C.

व्याख्या: कथन 2 गलत है क्योंकि छठी अनुसूची के तहत गठित स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) के पास विशिष्ट विषयों पर कानून बनाने (नियम और विनियम) की शक्ति होती है। अन्य दो कथन सही हैं।

मुख्य परीक्षा प्रश्न (Mains Descriptive Question)

प्रश्न: “केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा लद्दाख की विशिष्ट जनजातीय पहचान और पारिस्थितिक संवेदनशीलता की सुरक्षा के लिए अपर्याप्त है।” इस कथन के आलोक में, लद्दाख की मांग के संवैधानिक और विकासात्मक निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर के लिए मुख्य बिंदु (Model Answer Points):

  • भूमिका: 2019 के बाद लद्दाख की बदली प्रशासनिक स्थिति और स्थानीय समुदायों में उत्पन्न असुरक्षा की भावना का उल्लेख करें।
  • संवैधानिक निहितार्थ: छठी अनुसूची की आवश्यकता को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Democratic Decentralization) और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के संदर्भ में समझाएं।
  • विकास बनाम पर्यावरण: हिमालयी क्षेत्र में विकास के मॉडल में स्थानीय समुदाय की भागीदारी (Participation) क्यों आवश्यक है। ‘कैरिंग कैपेसिटी’ का संदर्भ दें।
  • संघवाद की चुनौतियाँ: केंद्र शासित प्रदेश की प्रशासनिक केंद्रीकृत व्यवस्था बनाम राज्य की स्वायत्तता के बीच संतुलन।
  • निष्कर्ष: इस मुद्दे का समाधान केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और संवैधानिक संवाद के माध्यम से ही निकाला जा सकता है, जो स्थानीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों के बीच संतुलन स्थापित करे।

यह अध्ययन नोट IAS EasyWay की दैनिक समसामयिकी पहल का एक हिस्सा है। ऐसे ही अधिक दैनिक समसामयिकी और अध्ययन सामग्री के लिए IAS EasyWay पर निरंतर आते रहें।

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