समान नागरिक संहिता (UCC) और अनुच्छेद 44: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

परिचय एवं वर्तमान संदर्भ

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) भारत में विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले विभिन्न धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर सभी नागरिकों के लिए एक साझा कानूनी ढांचा लागू करने का प्रस्ताव है। 8 जुलाई 2026 के वर्तमान परिदृश्य में, यह विषय राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। उत्तराखंड राज्य द्वारा नागरिक संहिता को लागू किए जाने के बाद, अब कई अन्य राज्य भी अपने-अपने स्तर पर इसके प्रारूप तैयार करने की दिशा में सक्रिय हैं। इसके अतिरिक्त, विधि आयोग की हालिया सिफारिशों और न्यायपालिका द्वारा विभिन्न वादों में लैंगिक समता को प्राथमिकता दिए जाने के कारण इस विषय पर संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस एक बार फिर अत्यंत प्रासंगिक हो गई है।

‘बाध्यकारी कर्तव्य’ (binding duty) नहीं हैं, बल्कि ये मार्गदर्शक सिद्धांत हैं जिनका पालन करने का प्रयास राज्य को करना चाहिए। कथन 2 सही है क्योंकि गोवा में 1867 की पुर्तगाली नागरिक संहिता लागू है, जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होती है। कथन 3 सही है क्योंकि अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि भाग IV में दिए गए सिद्धांत किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे, फिर भी ये देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।

अभ्यास मुख्य परीक्षा प्रश्न (Practice Mains Descriptive Question)

प्रश्न: “समान नागरिक संहिता (UCC) का कार्यान्वयन भारत की धर्मनिरपेक्षता और बहु-सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के बीच एक संतुलन साधने की मांग करता है।” इस कथन के आलोक में, उन चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए जो भारत में एक समान कानून लागू करने के मार्ग में उत्पन्न होती हैं। (250 शब्द, 15 अंक)

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